ऐ पठानों, तुम्हारे घर उजाड़ दिए गए हैं उठो इसको फिर से पुनर्निर्माण करो, और याद रखो तुम पठान हो। ये खान अब्दुल गफ्फार खान की एक इंक़लाबी तकरीर का हिस्सा है।
आज के दिन ही, 6 फरवरी 1890 ई. के दिन हिंदुस्तान के एक अज़ीम इंकलाबी शख्सियत खान अब्दुल गफ्फार खान की अखंड भारत के खैबर पख्तूनख्वा के एक टाउन उतमन्जाइ (Utmānzai) में पैदाइश हुयी थी। खान ने अपनी आधी से ज़्यादा ज़िंदगी जेल में गुज़ार दी शायद ही कोई इतने लम्बे वक़्त तक जेल में रहा होगा। खान एकलौते पाकिस्तानी नागरिक है जिनको भारत रत्न से सम्मानित किया गया है।
खान की जब वफ़ात हुई तो पाकिस्तानी जनरल ज़ियाउल हक़ के रोकने के बावजूद राजीव गांधी उनको खिराज-ए-अकीदत देने पहुंचे थे।
साल 1932 का दौर था हजारों की तादाद में पठान अंग्रेजों के ज़ुल्म के खिलाफ पेशावर की सड़कों पर उतर गए किस्साखानी बाजार में इतनी भीड़ देखकर अंग्रेज भाग गए दो दिन बाद जब अंग्रेज गढ़वाल रेजिमेंट लेकर वापस पेशावर पहुंचे तो भीड़ वैसी ही अंग्रज़ों के विरोध में जमी हुई थी अपनी जगह से हिली तक नहीं।
अंग्रेजों ने गढ़वाल रेजिमेंट को भीड़ पर गोलियां चलाने का ऑर्डर दे दिया। गढ़वाल रेजिमेंट ने बन्दूक लोड करके देखा तो सबसे पहली लाइन में पठानों के छोटे छोटे मासूम बच्चे खड़े हुए थे और उनके बीच खड़ा था उनका लीडर खान अब्दुल ग़फ़्फ़ार खान और उनके पीछे उनकी हज़ारों की फौज जिसका नाम था "ख़ुदाई ख़िदमतगार"।
अंग्रेजों ने कहा बादशाह खान हथियार तो पठानों का ज़ेवर होते है तुम्हारे ज़ेवर कहां है? खान अब्दुल ग़फ़्फ़ार खान ने कहा हमने महात्मा गांधी से वादा के चलते अपने ज़ेवर उतार कर फेंक दिए वरना तुम यहां से सही सलामत नहीं जाते हथियार तो छोड़ो हम हांथ भी नही उठाएंगे।
गढ़वाल रेजिमेंट ने बन्दूक लोड तो कर ली लेकिन सामने खड़े बेगुनाह लोगो पर गोलियां चलाने से इंकार कर दिया कहा हम एक और जलियांवाला बाग नही देख सकते हम निहत्थों पर गोली नही चलाएंगे। उसके बाद अंग्रेजों ने खुद मशीन गन उठाई और गोलियों की बौछार कर दी इधर बन्दूक से गोलियां निकलती रहीं उधर एक एक करके बेगुनाहों की लाशें गिरती गयीं। थोड़ी ही देर में किस्साखानी बाजार लाशों से पट गया। गढ़वाल रेजिमेंट के सभी सैनकों को सस्पेंड कर उम्रक़ैद की सजा दे दी गई।

