the message
A message in its most general meaning is an object of communication. It is something which provides information or message; it can also be this information or message itself.
Friday, April 10, 2026
Tuesday, April 7, 2026
गांधीजी के उपवास और आमरण अनशन
महात्मा गांधी के शस्त्रागार में 'उपवास' सबसे अचूक और अंतिम हथियार था। जहाँ दुनिया सैन्य बल और कूटनीति को शक्ति का पर्याय मानती थी, वहीं गांधीजी ने स्वेच्छा से सहे गए कष्ट (Self-suffering) को परिवर्तन का माध्यम बनाया।
1. उपवास: जब बुद्धि हार जाए, तब हृदय बोले
सन 1947 में गांधीजी ने 'हरिजन' पत्रिका में स्पष्ट किया था कि उपवास कोई हठ नहीं, बल्कि अहिंसा के पुजारी का अंतिम अस्त्र है। जब मानवीय तर्क और चतुरता विफल हो जाती है, तब उपवास के माध्यम से व्यक्ति अपनी अंतरात्मा को ईश्वर के सम्मुख रखता है।
आध्यात्मिक पक्ष: यह बाहरी शोर को शांत कर भीतर की आवाज़ सुनने का माध्यम है।
सामाजिक प्रभाव: यह समाज की सोई हुई चेतना को झकझोरता है। जब लोग अपने प्रिय नेता को कष्ट में देखते हैं, तो उनके भीतर का नैतिक बोध जागृत होता है।
2. नैतिक अधिकार और साध्य-साधन की पवित्रता
गांधीजी का मानना था कि उपवास वही व्यक्ति कर सकता है जिसका व्यक्तिगत जीवन सुचिता (Purity) और अनुशासन से भरा हो।
"अहिंसा केवल वही प्रभावी बना सकता है, जिसके शब्दों और कर्मों में सामंजस्य हो।"
यदि जनता को व्यक्ति के चरित्र पर भरोसा नहीं है, तो उपवास केवल एक 'भूख हड़ताल' बनकर रह जाएगा। गांधीजी ने उपवास को कभी किसी व्यक्तिगत लाभ या ब्लैकमेल के लिए इस्तेमाल नहीं किया, बल्कि हमेशा मानवीय मूल्यों (जैसे सांप्रदायिक एकता) को स्थापित करने के लिए किया।
3. उपवास बनाम आमरण अनशन: एक सूक्ष्म अंतर
अक्सर लोग उपवास और आमरण अनशन को एक ही मान लेते हैं, लेकिन गांधीजी के दर्शन में इनमें स्पष्ट अंतर था:
उपवास (Fast)-
यह एक निश्चित अवधि (जैसे 1, 7, या 21 दिन) के लिए होता था। इसका उद्देश्य आत्मशुद्धि और प्रायश्चित होता था। इसमें वे जल, नींबू या सोडा जैसे न्यूनतम तत्वों की घोषणा पहले ही कर देते थे।
आमरण अनशन (Fast unto Death)-
यह तब किया जाता था जब स्थिति 'करो या मरो' की हो। इसका अर्थ था कि या तो हृदय परिवर्तन होगा या प्राण त्याग दिए जाएंगे। यह अंतिम विकल्प था जब बातचीत के सारे रास्ते बंद हो जाते थे।
4 जब उपवास ने इतिहास बदला
गांधीजी के उपवासों ने भारत की नियति को प्रभावित किया। उनके जीवन के कुछ प्रमुख उपवास इस प्रकार हैं:
1924 का दिल्ली उपवास: हिंदू-मुस्लिम एकता के लिए 21 दिनों का उपवास।
1932 का यरवदा अनशन: अछूतों के लिए अलग निर्वाचन मंडल (Separate Electoral College) के विरोध में 'आमरण अनशन'। इसके परिणामस्वरूप 'पूना पैक्ट' हुआ जिसने समाज को टूटने से बचाया।
1948 का अंतिम अनशन: स्वतंत्रता के बाद दिल्ली में भड़के सांप्रदायिक दंगों को शांत करने के लिए। 78 वर्ष की आयु में गांधीजी ने घोषणा की कि जब तक दिल्ली में सभी पक्ष सुरक्षित महसूस नहीं करेंगे, वे अन्न ग्रहण नहीं करेंगे। इस अनशन ने मानवता को दंगों की आग से बाहर निकाला।
5. उपवास की वैज्ञानिकता और मौन का संगम
गांधीजी के लिए उपवास केवल शारीरिक क्रिया नहीं थी। वे उपवास के दौरान अक्सर 'मौन' का पालन करते थे। उनका मानना था कि शरीर के कोलाहल को शांत किए बिना ईश्वर का आदेश प्राप्त नहीं किया जा सकता। वे उपवास की अवधि और शर्तें स्वयं तय नहीं करते थे, बल्कि अपनी 'भीतरी आवाज' (Inner Voice) के निर्देश पर चलते थे।
गांधीजी का उपवास किसी के विरुद्ध 'दबाव' डालने की युक्ति नहीं, बल्कि स्वयं को कष्ट देकर दूसरे के हृदय में प्रेम जगाने की कला थी। आज के युग में भी, यह हमें सिखाता है कि बड़े बदलाव के लिए भौतिक संसाधनों से अधिक नैतिक शक्ति और आत्म-नियंत्रण की आवश्यकता होती है।
Saturday, April 4, 2026
This artwork is a 17th-century Persian depiction of the planet Venus, also known in Islamic tradition as Zuhra.
سیاره زهره
The image illustrates a unique blend of cultural influences, where astrological figures from the Persian world are represented as multi-armed deities, a style clearly inspired by Indian iconography.
Key Features of the Illustration
The Figure: A four-armed representation of Venus (Zuhra) seated on a chariot and dressed in a sari.
The Chariot: She is shown riding a distinctive chariot with multiple wheels, being pulled by what appear to be turtles.
Symbolism: In Islamic legend, Zuhra is considered the “Supernal Minstrel,” often associated with music, love, and beauty. Traditional astrology also links Venus to aesthetics, luxuries, and femininity.
While similar in style to Indian miniature painting “Watercolour Gouache” paintings of deities like Surya (the sun god), this specific work is part of a series of Persian astrological art that depicts planets with these characteristic multi-armed forms.
Thursday, March 26, 2026
“दस चेहरे” का रहस्य
बाहर मूर्ति, अंदर पूरा मन
जब हम ऐसी मूर्ति देखते हैं जिसमें एक नहीं… बल्कि कई चेहरे होते हैं—तो पहला सवाल उठता है:
क्या यह सिर्फ कला है… या इसके पीछे कोई गहरी सच्चाई छुपी है?
बौद्ध दृष्टि से यह “दस चेहरे” कोई अलौकिक शक्ति का प्रदर्शन नहीं है,
बल्कि यह मानव मन का नक्शा (map) है।
1. मन एक नहीं, अनेक है
हम सोचते हैं—“मैं एक हूँ”
लेकिन सच यह है कि हमारे अंदर कई “मैं” रहते हैं।
एक चेहरा गुस्से का
एक चेहरा प्रेम का
एक चेहरा डर का
एक चेहरा अहंकार का
एक चेहरा करुणा का
यही “दस चेहरे” हैं—हमारे भीतर के अलग-अलग रूप।
जब परिस्थिति बदलती है… चेहरा बदल जाता है।
कभी हम बहुत अच्छे लगते हैं… कभी खुद से ही अजनबी।
2. हर दिशा में जागरूकता
मूर्ति में चेहरे चारों तरफ होते हैं—आगे, पीछे, ऊपर…
इसका मतलब है:
जागरूकता सिर्फ सामने नहीं, हर दिशा में होनी चाहिए।
हम दूसरों को देखते हैं… लेकिन खुद को नहीं
हम बाहर को समझते हैं… लेकिन भीतर को नहीं
“दस चेहरे” हमें याद दिलाते हैं—
अपने हर रूप को देखो… बिना भागे, बिना दबाए।
3. सब चेहरे बदलते हैं — पर एक साक्षी स्थिर है
ध्यान से देखो—
इन सारे चेहरों के नीचे एक शांत चेहरा होता है।
वही असली “तुम” हो।
गुस्सा आता है… चला जाता है
खुशी आती है… चली जाती है
दुख आता है… चला जाता है
लेकिन जो इन सबको देख रहा है—
वह हमेशा वही रहता है।
बौद्ध धर्म इसी को कहता है—
“साक्षी भाव” (awareness)
4. दस चेहरे = दस दिशाएँ + पूर्ण जागरूकता
प्रतीकात्मक रूप से “दस” का मतलब है—
पूर्णता (totality)
चार दिशाएँ + चार कोने + ऊपर + नीचे = 10
यानी
हर दिशा में जागो, हर स्थिति में जागो।
5. संदेश क्या है?
यह मूर्ति हमें डराने के लिए नहीं है…
बल्कि जगाने के लिए है।
यह कहती है:
तुम एक सीमित व्यक्ति नहीं हो
तुम अनेक अनुभवों का संगम हो
लेकिन तुम्हारा असली स्वरूप इन सबसे परे है
सबसे गहरी बात
“जब तक तुम अपने चेहरों से चिपके हो—तुम बिखरे हुए हो…
जब तुम उन्हें देख लेते हो—तुम एक हो जाते हो।”
निष्कर्ष
“दस चेहरे” किसी देवता की ताकत नहीं…
बल्कि इंसान की संभावना दिखाते हैं।
अगर तुम अपने अंदर के हर चेहरे को पहचान लो…
तो तुम भी उसी शांति तक पहुँच सकते हो…
जिसे हम “बुद्ध” कहते हैं।
“तुम्हारे अंदर भी दस चेहरे हैं…
लेकिन तुम उनमें से कोई नहीं हो—
तुम वो हो, जो सबको देख रहा है।”
ध्यान से देखो—
इन सारे चेहरों के नीचे एक शांत चेहरा होता है।
वही असली “तुम” हो।
गुस्सा आता है… चला जाता है
खुशी आती है… चली जाती है
दुख आता है… चला जाता है
लेकिन जो इन सबको देख रहा है—
वह हमेशा वही रहता है।
बौद्ध धर्म इसी को कहता है—
“साक्षी भाव” (awareness)
4. दस चेहरे = दस दिशाएँ + पूर्ण जागरूकता
प्रतीकात्मक रूप से “दस” का मतलब है—
पूर्णता (totality)
चार दिशाएँ + चार कोने + ऊपर + नीचे = 10
यानी
हर दिशा में जागो, हर स्थिति में जागो।
5. संदेश क्या है?
यह मूर्ति हमें डराने के लिए नहीं है…
बल्कि जगाने के लिए है।
यह कहती है:
तुम एक सीमित व्यक्ति नहीं हो
तुम अनेक अनुभवों का संगम हो
लेकिन तुम्हारा असली स्वरूप इन सबसे परे है
सबसे गहरी बात
“जब तक तुम अपने चेहरों से चिपके हो—तुम बिखरे हुए हो…
जब तुम उन्हें देख लेते हो—तुम एक हो जाते हो।”
निष्कर्ष
“दस चेहरे” किसी देवता की ताकत नहीं…
बल्कि इंसान की संभावना दिखाते हैं।
अगर तुम अपने अंदर के हर चेहरे को पहचान लो…
तो तुम भी उसी शांति तक पहुँच सकते हो…
जिसे हम “बुद्ध” कहते हैं।
“तुम्हारे अंदर भी दस चेहरे हैं…
लेकिन तुम उनमें से कोई नहीं हो—
तुम वो हो, जो सबको देख रहा है।”
Monday, March 23, 2026
सातवाहनकालीन चौल: प्राचीन महाराष्ट्राच्या आंतरराष्ट्रीय सागरी व्यापाराचे प्रवेशद्वार
महाराष्ट्राच्या प्रदीर्घ आणि वैभवशाली इतिहासातील एक अत्यंत सुवर्णपान म्हणजे सातवाहन साम्राज्याचा काळ. इसवी सन पूर्व दुसऱ्या शतकापासून ते इसवी सनाच्या तिसऱ्या शतकापर्यंत चाललेल्या या प्रदीर्घ कालखंडात महाराष्ट्राने केवळ राजकीय आणि सांस्कृतिकच नव्हे, तर आर्थिक क्षेत्रातही मोठी भरारी घेतली होती. या अभूतपूर्व आर्थिक भरभराटीचे एक प्रमुख केंद्र म्हणजे कोकण किनारपट्टीवरील 'चौल' हे प्राचीन बंदर आणि गाव. आजच्या रायगड जिल्ह्यातील अलिबाग तालुक्यात अरबी समुद्राच्या किनाऱ्यावर कुंडलिका नदीच्या मुखाशी वसलेले चौल हे आज जरी एक शांत आणि छोटेसे गाव वाटत असले, तरी दोन हजार वर्षांपूर्वी, म्हणजेच सातवाहन काळात ते एक जागतिक दर्जाचे आणि गजबजलेले आंतरराष्ट्रीय बंदर होते. सातवाहन राजांनी दख्खनच्या पठारावर जी स्थिर आणि प्रबळ सत्ता निर्माण केली होती, तिचा थेट फायदा कोकणातील बंदरांच्या विकासाला झाला, ज्यामध्ये चौल हे एक अत्यंत अग्रगणी आणि महत्त्वाचे नाव होते.
चौल या गावाला प्राचीन काळी अनेक वेगवेगळ्या नावांनी ओळखले जायचे. 'चेंबूल', 'चेमुल', 'चंपावती', आणि 'चिमुल' अशी याची काही जुनी नावे तत्कालीन साहित्यात आणि ब्राह्मी शिलालेखांमध्ये आढळतात. या बंदराची कीर्ती केवळ भारतभरच नव्हे, तर सातासमुद्रापार युरोप आणि आफ्रिका खंडांपर्यंत पसरलेली होती. ग्रीक आणि रोमन भूगोलातज्ज्ञांच्या आणि प्रवाशांच्या नोंदींमध्ये चौलचा वारंवार अत्यंत सन्मानाने उल्लेख आलेला आहे. 'पेरिप्लस ऑफ द एरिथ्रीयन सी' या पहिल्या शतकातील एका अज्ञात ग्रीक खलाशाने लिहिलेल्या प्राचीन ग्रंथात या बंदराचा उल्लेख 'सिम्युल्ला' (Symulla) असा करण्यात आला आहे. त्या ग्रंथानुसार हे बंदर तत्कालीन जागतिक व्यापारातील एक अत्यंत महत्त्वाचे केंद्र होते. जगप्रसिद्ध ग्रीक खगोलशास्त्रज्ञ आणि भूगोलतज्ज्ञ टॉलेमी याने देखील आपल्या दुसऱ्या शतकातील ग्रंथात चौलचे वर्णन एक अत्यंत मोठे आणि व्यापारीदृष्ट्या महत्त्वाचे शहर म्हणून केले आहे. यावरून सातवाहन काळात चौलने जागतिक व्यापार नकाशावर मिळवलेले अढळ स्थान स्पष्ट होते.
सातवाहन काळातील चौल हे केवळ एक गाव नव्हते, तर ते एक अतिशय गजबजलेले आणि श्रीमंत महानगर असावे. येथील बंदरात दररोज अनेक मोठी जहाजे नांगरलेली असायची. रोमन साम्राज्य, इजिप्त, ग्रीस आणि आखाती देशांमधील व्यापारी आपली भव्य जहाजे घेऊन या बंदरात मोठ्या संख्येने येत असत. भारताच्या अंतर्गत भागातून, विशेषतः दख्खनच्या पठारावरून मोठ्या प्रमाणावर माल बैलगाड्यांच्या आणि गाढवांच्या तांड्यांवर लादून सह्याद्रीचे कठीण घाट ओलांडून चौल बंदरात आणला जात असे. येथून प्रामुख्याने उच्च प्रतीचे सुती कापड, मलमल, मसाल्याचे पदार्थ, विविध प्रकारची मौल्यवान लाकडे, हस्तिदंताच्या कलाकुसरीच्या वस्तू, आणि नीलमणी व गोमेद यांसारखी मौल्यवान रत्ने परदेशात निर्यात केली जात असत. याच्या मोबदल्यात परदेशी व्यापारी आपल्यासोबत रोमन सोन्या-चांदीची नाणी, उत्तम प्रतीचे मद्य (वाईन), विविध धातू, काचेच्या वस्तू आणि सुगंधी द्रव्ये घेऊन येत. या अफाट व्यापारामुळे चौलचे व्यापारी आणि स्थानिक नागरिक अत्यंत श्रीमंत आणि वैभवसंपन्न झाले होते. सातवाहन राजांच्या तिजोरीत जकात आणि करांच्या माध्यमातून येणारा मोठा महसूल याच बंदरातून येत असे.
चौलच्या या विलक्षण भरभराटीमागे त्याची नैसर्गिक भौगोलिक रचना आणि सातवाहन राजांचे दूरदर्शी धोरण हे प्रमुख कारण होते. कुंडलिका नदीच्या मुखाशी असल्याने येथे जहाजांना नांगरण्यासाठी नैसर्गिक आणि वादळांपासून सुरक्षित अशी खाडी उपलब्ध होती. या बंदराचा थेट संबंध सातवाहनांची राजधानी असलेल्या 'प्रतिष्ठान' (आजचे पैठण), आणि 'जुन्नर', 'तेर', 'नेवासे' यांसारख्या मोठ्या व्यापारी व प्रशासकीय शहरांशी होता. दख्खनच्या पठारावरील हा कच्चा आणि पक्का माल नाणेघाट, बोरघाट, आणि ताम्हिणीसारख्या प्राचीन घाटवाटांमधून खाली कोकणात आणला जायचा आणि तिथून तो खुशकीच्या मार्गाने किंवा खाडीच्या मार्गाने चौलला पोहोचायचा. सातवाहन राजांनी या व्यापारी मार्गांवर प्रवाशांच्या आणि व्यापाऱ्यांच्या सुरक्षेसाठी भक्कम बंदोबस्त ठेवला होता, ज्यामुळे व्यापार करणे अधिक सुरक्षित आणि फायदेशीर झाले होते. सातवाहनांच्या काही नाण्यांवर दोन शिडांच्या जहाजांचे चित्र आढळते, यावरून चौल सारख्या बंदरांवरून चालणाऱ्या सागरी व्यापाराचे महत्त्व त्यांनी किती जाणले होते हे दिसून येते.
कोणत्याही भागात जेव्हा व्यापारातून मोठी संपत्ती निर्माण होते, तेव्हा त्याचा थेट सकारात्मक प्रभाव तिथल्या सांस्कृतिक आणि धार्मिक जीवनावर पडतो. सातवाहनकालीन चौल याला अपवाद नव्हते. येथील श्रीमंत व्यापाऱ्यांनी, ज्यांना तत्कालीन भाषेत 'सार्थवाह' किंवा 'श्रेष्ठी' म्हटले जायचे, त्यांनी तत्कालीन प्रचलित असलेल्या बौद्ध धर्माच्या प्रसारासाठी आणि बौद्ध भिक्खूंसाठी सढळ हाताने दान दिले. कान्हेरी, कुडा, महाड आणि कर्ले यांसारख्या पश्चिम महाराष्ट्रातील आणि कोकणातील अनेक बौद्ध लेण्यांमध्ये जे प्राचीन ब्राह्मी शिलालेख आढळतात, त्यामध्ये चौल (चेमुल) येथील व्यापाऱ्यांनी दिलेल्या दानांचे स्पष्ट उल्लेख आहेत. मुंबईजवळील कान्हेरी लेण्यांमधील एका शिलालेखात 'चेमुल' येथील एका सुवर्णकाराने (सोनाराने) आणि त्याच्या कुटुंबाने लेण्यासाठी मोठे दान दिल्याची नोंद आहे. यावरून तत्कालीन चौल गावातील लोकांची आर्थिक सुबत्ता, तेथील प्रगत कारागिरी आणि त्यांची सामाजिक व धार्मिक बांधिलकी दिसून येते. या व्यापाऱ्यांनी लेण्यांमध्ये पाण्याची टाकी खोदणे, विश्रामगृहे बांधणे आणि प्रवाशांच्या निवासाची व्यवस्था करणे यांसारखी अनेक समाजोपयोगी कामे स्वखर्चाने केली होती.
सातवाहन काळातील चौल गावातील सामाजिक जीवनही अत्यंत प्रगत आणि बहुसांस्कृतिक असावे. जगभरातील व्यापारी येथे येत असल्याने वेगवेगळ्या भाषा, संस्कृती आणि चालीरीती यांचा अनोखा संगम येथे पाहायला मिळत असावा. रोमन आणि ग्रीक व्यापाऱ्यांच्या दीर्घकालीन वास्तव्यामुळे त्यांच्या जीवनशैलीचा आणि कलाकुसरीचा काहीसा प्रभाव स्थानिक समाजावरही पडला असण्याची शक्यता नाकारता येत नाही. इथले बाजारपेठांचे रस्ते नेहमीच गजबजलेले असायचे, जिथे विविध देशांतील नाण्यांचा आणि वस्तूंचा मुक्त विनिमय चालत असे. जहाज बांधणीचा आणि डागडुजीचा एक मोठा उद्योग चौलमध्ये त्याकाळी विकसित झाला होता, ज्यामध्ये स्थानिक कोळी आणि आगरी समाजातील कसलेल्या दर्यावर्दींची मोठी भूमिका होती.
काळाच्या ओघात सातवाहन साम्राज्याचा अस्त झाला आणि नंतरच्या काळात शिलाहार, यादव, बहमनी आणि शेवटी पोर्तुगीज अशा अनेक राजवटी चौलने पाहिल्या. प्रत्येक राजवटीत चौलचे व्यापारी महत्त्व टिकून राहिले. परंतु चौलच्या या प्रदीर्घ आंतरराष्ट्रीय ओळखीचा आणि वैभवशाली सागरी व्यापारी परंपरेचा खरा आणि भक्कम पाया सातवाहन काळातच रचला गेला होता. आज चौलमध्ये फेरफटका मारताना जरी आपल्याला त्या प्राचीन बंदराच्या खाणाखुणा थेट नजरेस पडत नसल्या, तरी इतिहासकारांच्या आणि पुरातत्त्वशास्त्रज्ञांच्या उत्खननात सापडलेली सातवाहनकालीन नाणी, परदेशी खापरी (अॅम्फोरा), आणि विटांचे अवशेष हे सर्व आपल्याला त्या दोन हजार वर्षांपूर्वीच्या 'सिम्युल्ला'च्या सुवर्णकाळाची साक्ष देतात. प्राचीन महाराष्ट्राच्या अफाट सागरी सामर्थ्याचे आणि सातवाहनांच्या जागतिक आर्थिक दूरदृष्टीचे चौल हे एक अत्यंत अभिमानास्पद आणि कधीही न विसरता येणारे असे ऐतिहासिक स्मारक आहे.
संदर्भ ग्रंथ, लेख आणि संकेतस्थळांची सूची:
१. प्राचीन महाराष्ट्राचा इतिहास - लेखक डॉ. श. गो. कोलारकर. या ग्रंथामध्ये प्राचीन महाराष्ट्रातील बंदरे, सागरी मार्ग आणि सातवाहनांच्या अर्थव्यवस्थेवर सविस्तर प्रकाश टाकण्यात आला आहे.
२. सातवाहन आणि पश्चिमी क्षत्रप यांचा इतिहास आणि कोरीव लेख - लेखक डॉ. वासुदेव विष्णू मिराशी. कान्हेरी आणि इतर लेण्यांमधील शिलालेखांमध्ये आलेले चौल (चेमुल) गावाचे आणि व्यापाऱ्यांचे संदर्भ या ग्रंथात स्पष्टपणे वाचायला मिळतात.
३. महाराष्ट्राचा इतिहास: प्राचीन काळ (खंड १) - संपादक डॉ. अ. रा. कुलकर्णी आणि डॉ. ग. ह. खरे. या ग्रंथात सातवाहनकालीन व्यापार आणि रोमन साम्राज्यासोबतच्या व्यापारी संबंधांची विस्तृत माहिती दिलेली आहे.
४. द पेरिप्लस ऑफ द एरिथ्रीयन सी (The Periplus of the Erythraean Sea) हा पहिल्या शतकातील प्राचीन ग्रीक दस्तऐवज, ज्यामध्ये 'सिम्युल्ला' या नावाने चौल बंदराचे भौगोलिक आणि व्यापारी महत्त्व अत्यंत अचूकपणे वर्णन केले आहे.
५. महाराष्ट्र शासनाच्या दर्शनिका विभागाची (गॅझेटिअर) अधिकृत वेबसाईट. या वेबसाईटवरील कुलाबा (रायगड) जिल्ह्याच्या दर्शनिकेमध्ये प्राचीन इतिहासाच्या अंतर्गत चौल (चंपावती/चेमुल) गावाचा सविस्तर ऐतिहासिक संदर्भ आणि माहिती उपलब्ध आहे.
Panoramic view of Mecca painted by Muhammad Abdullah of Delhi (India) cartographer circa 1845.
Panoramic view of Mecca painted by Muhammad Abdullah of Delhi (India) cartographer circa 1845. According to Sir Richard Burton a British Traveller, scholar and employee of East India Company travelled Holy Cities in disguise, He mentioned in his book “Personal Narrative of a Pilgrimage to El-Medinah and Meccah” about presence of some Indian painters and cartographers lived in Mecca and they earned decent money.
Wednesday, March 11, 2026
Masjid-I-Ala, Srirangapatna—1922.
Masjid-I-Ala, Srirangapatna—1922. Built in 1786–87 by Tipu Sultan, one of the most notable rulers and anti-colonial figures in Indian history. The mosque stands inside the Srirangapatna Fort, close to his palace, and is today recognised as a Monument of National Importance, maintained by the Archaeological Survey of India.
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