Monday, February 23, 2026

THE NEW ICON - SAVARKAR AND THE FACTS - ARUN SHOURIE



25 सितंबर 1990 को गुजरात के सोमनाथ से राम मंदिर के समर्थन में निकली आडवाणी की रथयात्रा को 'बौद्धिक ऑक्सीजन' देने वाले अरुण शौरी की नई किताब सावरकर के 'हिंदुत्व' का खौफनाक सच जो सवाल खड़े करता है की क्या बीजेपी का 'हिंदुत्व' भारत को भगवा अफगानिस्तान बनाने की साजिश है?
जिस अरुण शौरी ने 90 के दशक में अपनी धारदार लेखनी से आडवाणी की रथयात्रा को 'बौद्धिक ऑक्सीजन' दी थी, आज वही शौरी उस 'सांप्रदायिक विष-वृक्ष' की जड़ें खोद रहे हैं। उनकी नवीनतम खोजपूर्ण किताब सावरकर के उस कृत्रिम और थोपे गए 'वीरत्व' की धज्जियां उड़ाती है, जिसे संघ परिवार और बीजेपी ने दशकों से झूठ की खाद देकर पाला है। यह किताब केवल एक दस्तावेज नहीं, बल्कि उस वैचारिक अपराध का कबूलनामा है, जिसने भारत की उदारवादी जड़ों में नफरत का तेजाब डाला।
~ सावरकर का हिंदुत्व: शुद्ध रूप से घृणा का दर्शन।
~ अंग्रेजों के लिए 'जी-हुजूरी' करने वाले 'नायक' का पर्दाफाश।
~ हिटलर का महिमामंडन और गांधी से नफरत का खौफनाक चेहरा।
~ बीजेपी के पास अपने नायक नहीं, इसलिए सावरकर का सहारा।
~ भगवा अफगानिस्तान की ओर बढ़ते भारत का अलार्म।
★ अरुण शौरी ने अपनी किताब में सबूतों के साथ यह साबित किया है कि विनायक दामोदर सावरकर का पूरा वजूद ही 'अंग्रेजों की दया' पर टिका था। जिसे 'वीर' कहकर प्रचारित किया जाता है, वह असल में हिटलर की फासिस्ट विचारधारा का परम भक्त था। सावरकर ने न केवल हिटलर की प्रशंसा में कसीदे पढ़े, बल्कि मुंबई में तैनात एक जर्मन एजेंट के जरिए नाजी हुकूमत तक अपनी वफादारी का संदेश भिजवाया ताकि भारत में भी वैसा ही कत्लेआम और तानाशाही तंत्र स्थापित किया जा सके।
“झूठ इतना बोलो कि वो सच के करीब लगने लगे"
★ माफीवीर सावरकर ने गांधीजी के साथ लंदन में रहने और गहरी दोस्ती की जो फर्जी कहानियां गढ़वाईं, शौरी ने उनका पूरी तरह से पोस्टमार्टम कर दिया है। ऐतिहासिक तथ्य गवाह हैं कि सावरकर और गांधी कभी इंग्लैंड में साथ रहे ही नहीं। यह सब केवल गांधी के विराट व्यक्तित्व की छाया में खुद को खड़ा करने की एक घटिया कोशिश थी, जबकि सावरकर ने जीवन भर गांधीजी के लिए अपशब्दों और नफरत का ही इस्तेमाल किया।
★ माफीवीर सावरकर के 'समुद्र में छलांग' वाले जिस किस्से को इतिहास की किताबों में जबरन ठूंसा जा रहा है, वह किसी फिल्मी स्टंट से ज्यादा कुछ नहीं था। शौरी बताते हैं कि जब मालवाहक जहाज किनारे पर लगभग खड़ा था और जमीन की दूरी महज 8-10 फुट थी, तब सावरकर ने बाथरूम के बहाने भागने की एक नाकाम कोशिश की थी। इसे 'महासमुद्र में मीलों तैरने' की शौर्य गाथा बताना इतिहास के साथ किया गया सबसे बड़ा 'इंटेलेक्चुअल फ्रॉड' है।
◆ माफीवीर सावरकर की माफीनामे वाली हकीकत को दबाने के लिए संघियों ने यह झूठ फैलाया कि उन्होंने गांधीजी के कहने पर अंग्रेजों से दया की भीख मांगी थी। शौरी ने इस सफ़ेद झूठ की भी बखिया उधेड़ दी है। सच तो यह है कि जब क्रांतिकारी फांसी के फंदे चूम रहे थे, तब सावरकर अंग्रेजों को अपनी 'सेवाएं' देने के लिए दया याचिकाएं लिख रहे थे।
~ सावरकर का हिंदुत्व एकता नहीं, विभाजन का मंत्र है।
~ घृणा के बिना संगठन नहीं बन सकता ये सावरकर की सोच है।
~ हिंदुइज्म (उदारवाद) बनाम हिंदुत्व (विनाशकारी)।
~ बीजेपी की 'नायक-चोरी' वाली राजनीति बेनकाब।
~ इतिहास के पन्नों से हकीकत का खौफनाक सामना।
★ अरुण शौरी साफ़ चेतावनी देते हैं कि सावरकर का 'हिंदुत्व' भारतीय आत्मा को निगल जाएगा। यह विचारधारा समावेशी भारत को एक 'भगवा अफगानिस्तान' में तब्दील करने की क्षमता रखती है, जहाँ असहमति के लिए कोई जगह नहीं होगी। आरएसएस खुद सावरकर की अविश्वसनीयता से वाकिफ था, इसीलिए गोलवलकर ने उन्हें कभी अपने करीब नहीं फटकने दिया। लेकिन आज सत्ता के भूखे लोगों को गांधी के कद को छोटा करने के लिए सावरकर जैसे विवादास्पद चेहरे की जरूरत पड़ रही है।
◆ "बर्बाद-ए-गुलिस्तां करने को बस एक ही उल्लू काफी था, यहाँ हर शाख पे उल्लू बैठा है..." शौरी की यह किताब उन लोगों की आंखों में मिर्च की तरह लगेगी जो सावरकर को पूजते हैं। अब बीजेपी अपनी आईटी सेल के उन 'भाड़े के टट्टू' और 'दिहाड़ी वाले दलित चिंतकों' को मैदान में उतारेगी जो यह तर्क देंगे कि शौरी ने तो अंबेडकर की भी आलोचना की थी। लेकिन वे सावरकर के इन दस्तावेजी सच का सामना कभी नहीं कर पाएंगे।
★ सावरकर के लिए हिंदुत्व का मतलब सिर्फ और सिर्फ 'अन्य' के प्रति नफरत था। उन्होंने साफ कहा था कि बिना किसी साझा दुश्मन या घृणा के हिंदुओं को एकजुट नहीं किया जा सकता। क्या हम ऐसी जहरीली बुनियाद पर एक आधुनिक राष्ट्र का निर्माण करना चाहते हैं? शौरी की यह किताब हर उस भारतीय को पढ़नी चाहिए जो अपनी आने वाली नस्लों को नफरत की आग से बचाना चाहता है।
~ तथ्यों की मार से तिलमिलाएगी सत्ता।
~ झूठ के गुब्बारे की हवा निकल गई।
~ भारत की आत्मा बनाम सावरकर का फासीवाद।
~ कमेंट में बताएं, क्या सावरकर वाकई 'वीर' थे?
"The truth is like a lion; you don’t have to defend it. Let it loose; it will defend itself."
शौरी ने सच का शेर खुला छोड़ दिया है अब देखते हैं कितने 'शूरवीर' इसके सामने टिक पाते हैं।
इस पोस्ट को इतना शेयर करें कि झूठ की दीवारें ढह जाएं। आपके हिसाब से भारत का असली नायक कौन है, सत्य के साथ खड़ा गांधी या माफीनामों वाला सावरकर? अपनी राय नीचे जरूर लिखें। 

अस्वीकरण: उपरोक्त पोस्ट अरुण शौरी की पुस्तक में वर्णित शोध, ऐतिहासिक संदर्भों और सार्वजनिक विमर्श पर आधारित है। इसका उद्देश्य किसी की भावनाओं को आहत करना नहीं बल्कि ऐतिहासिक तथ्यों पर चर्चा करना है। पाठक स्वयं तथ्यों और दस्तावेजों की पड़ताल करने के लिए स्वतंत्र हैं।



Saturday, February 7, 2026

खान अब्दुल गफ्फार खान



ऐ पठानों, तुम्हारे घर उजाड़ दिए गए हैं उठो इसको फिर से पुनर्निर्माण करो, और याद रखो तुम पठान हो। ये खान अब्दुल गफ्फार खान की एक इंक़लाबी तकरीर का हिस्सा है।
आज के दिन ही, 6 फरवरी 1890 ई. के दिन हिंदुस्तान के एक अज़ीम इंकलाबी शख्सियत खान अब्दुल गफ्फार खान की अखंड भारत के खैबर पख्तूनख्वा के एक टाउन उतमन्जाइ (Utmānzai) में पैदाइश हुयी थी। खान ने अपनी आधी से ज़्यादा ज़िंदगी जेल में गुज़ार दी शायद ही कोई इतने लम्बे वक़्त तक जेल में रहा होगा। खान एकलौते पाकिस्तानी नागरिक है जिनको भारत रत्न से सम्मानित किया गया है।
खान की जब वफ़ात हुई तो पाकिस्तानी जनरल ज़ियाउल हक़ के रोकने के बावजूद राजीव गांधी उनको खिराज-ए-अकीदत देने पहुंचे थे।
साल 1932 का दौर था हजारों की तादाद में पठान अंग्रेजों के ज़ुल्म के खिलाफ पेशावर की सड़कों पर उतर गए किस्साखानी बाजार में इतनी भीड़ देखकर अंग्रेज भाग गए दो दिन बाद जब अंग्रेज गढ़वाल रेजिमेंट लेकर वापस पेशावर पहुंचे तो भीड़ वैसी ही अंग्रज़ों के विरोध में जमी हुई थी अपनी जगह से हिली तक नहीं।
अंग्रेजों ने गढ़वाल रेजिमेंट को भीड़ पर गोलियां चलाने का ऑर्डर दे दिया। गढ़वाल रेजिमेंट ने बन्दूक लोड करके देखा तो सबसे पहली लाइन में पठानों के छोटे छोटे मासूम बच्चे खड़े हुए थे और उनके बीच खड़ा था उनका लीडर खान अब्दुल ग़फ़्फ़ार खान और उनके पीछे उनकी हज़ारों की फौज जिसका नाम था "ख़ुदाई ख़िदमतगार"।
अंग्रेजों ने कहा बादशाह खान हथियार तो पठानों का ज़ेवर होते है तुम्हारे ज़ेवर कहां है? खान अब्दुल ग़फ़्फ़ार खान ने कहा हमने महात्मा गांधी से वादा के चलते अपने ज़ेवर उतार कर फेंक दिए वरना तुम यहां से सही सलामत नहीं जाते हथियार तो छोड़ो हम हांथ भी नही उठाएंगे।
गढ़वाल रेजिमेंट ने बन्दूक लोड तो कर ली लेकिन सामने खड़े बेगुनाह लोगो पर गोलियां चलाने से इंकार कर दिया कहा हम एक और जलियांवाला बाग नही देख सकते हम निहत्थों पर गोली नही चलाएंगे। उसके बाद अंग्रेजों ने खुद मशीन गन उठाई और गोलियों की बौछार कर दी इधर बन्दूक से गोलियां निकलती रहीं उधर एक एक करके बेगुनाहों की लाशें गिरती गयीं। थोड़ी ही देर में किस्साखानी बाजार लाशों से पट गया। गढ़वाल रेजिमेंट के सभी सैनकों को सस्पेंड कर उम्रक़ैद की सजा दे दी गई।




Wednesday, January 14, 2026

मौलाना अबुल कलाम आज़ाद के तारीख़ी अल्फ़ाज़







ये तारीख़ी अल्फ़ाज़ हैं मौलाना अबुल कलाम आज़ाद के, जिसे उन्होंने 1947 में बकरीद के मौके पर दिल्ली की जामा मस्जिद में कहा था। उन्होंने आज़ादी मिलने पर मुसलमानों को उस वक़्त ख़िताब किया। लेकिन उनकी ये बातें पढ़कर ऐसा लगता है जैसे अभी के लिए ही कही गयी थीं।
उन्होंने कहा था की देखो ये मस्जिद की मीनारें तुमसे उचक कर सवाल कर रही हैं कि तुमने अपनी तारीख के सफ़हात को कहां गुम कर दिया है? अभी कल की बात है कि यही जमुना के किनारे तुम्हारे काफ़िलों ने वज़ू किया था, और आज तुम हो कि तुम्हें यहां रहते हुए खौफ़ महसूस होता है, हालांकि देल्ही तुम्हारे खून की सींची हुई है।

अज़ीज़ों! अपने अंदर एक बुनियादी तब्दीली पैदा करो, जिस तरह आज से कुछ अरसे पहले तुम्हारे जोश-ओ-ख़रोश बेजा थे, उसी तरह से आज ये तुम्हारा खौफ़ बेजा है, मुसलमान और बुज़दिली या मुसलमान और इश्तआल एक जगह जमा नहीं हो सकते। सच्चे मुसलमान को कोई ताक़त हिला नहीं सकती है। और न कोई खौफ़ डरा सकता है।

आओ अहद करो कि ये मुल्क हमारा है, हम इसी के लिए हैं और उसकी तक़दीर के बुनियादी फैसले हमारी आवाज़ के बगैर अधूरे ही रहेंगे।

आज तुम ज़लज़लों से डरते हो? कभी तुम ख़ुद एक ज़लज़ला थे, आज अंधेरे से कांपते हो, क्या याद नहीं रहा कि तुम्हारा वजूद ख़ुद एक उजाला था, ये बादलों के पानी की सील क्या है कि तुमने भीग जाने के डर से अपने पायंचे चढ़ा लिए हैं, वो तुम्हारे ही इस्लाफ़ थे जो समुंदरों में उतर गए थे, पहाड़ियों की छातियों को रौंद डाला था, आंधियां आईं तो उनसे कह दिया कि तुम्हारा रास्ता ये नहीं है, ये ईमान से भटकने की ही बात है जो शहंशाहों के गिरेबानों से खेलने वाले आज खुद अपने ही गिरेबान के तार बेच रहे हैं, और ख़ुदा से उस दर्जे तक गाफ़िल हो गये हैं कि जैसे उसपर कभी ईमान ही नहीं था।

अज़ीज़ों मेरे पास कोई नया नुस्ख़ा नहीं है। वही 1400 बरस पहले का नुस्ख़ा है, वो नुस्ख़ा जिसको इस क़ायनात के सबसे बड़े मोहसिन (मोहम्मद सल्ललाहु अलैहि वसल्लम) लेकर आये थे। और वो नुस्ख़ा है क़ुरान का ये ऐलान, 'बददिल न होना, और न गम करना, अगर तुम मोमिन (नेक, ईमानदार) हो, तो तुम ही ग़ालिब होगे'

Saturday, December 13, 2025

THE SHAH JAHAN DAGGER (KARD)NORTH INDIA, HILT 1620-1630




With carved jade hilt and watered-steel blade
11 5/8 ins. (29.7 cm.) long; hilt 4 3/8 ins. (11.1 cm.) long

Shah Jahan’s regnal name is divided into various parts. Shihab ud-Din mean "Star of the Faith", Sahib al-Quiran ud-Thani means "Second Lord of the Happy Conjunction of Jupiter and Venus". Shah Jahan means "King of the World", alluding to his pride in his Timurid roots and his ambitions. More epithets showed his secular and religious duties. He was also Khalifat Panahi ("Refuge of the Caliphate"), but Zill-i Allahi, or the "Shadow of God on Earth"

You can read صاحب قران ثانى (Second Lord of the Happy Conjunction of Jupiter and Venus) written at the base of the blade. Sold for USD 3,375,000.

Courtesy: Christie’s, London.





Friday, December 12, 2025

Jawaharlal Nehru Barrister-at-law, London, 1912



After studying at Harrow and completing a degree in Natural Sciences at Trinity College, Cambridge, Nehru undertook his legal training in London, following the path of his father, Motilal Nehru, one of India’s leading lawyers. In 1912, he was formally called to the Bar, marking his official entry into the legal profession.
However, soon after returning to India, Nehru found little interest in practising law. Instead, from 1912 onward, he gradually immersed himself in the Indian national movement— a commitment that would shape his entire life and eventually lead him to become the first Prime Minister of independent India.




Monday, December 1, 2025

अजमेर में मौजूद ख़्वाजा मोईनउद्दीन चिश्ती का आस्ताना 1893 में कुछ ऐसा दिखता था।

 


प्रोफेसर एम.एस. नरसिम्हन टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ फंडामेंटल रिसर्च (TIFR) में जवाहरलाल नेहरू को पहला भारतीय डिजिटल कंप्यूटर के बारे में बताते हुए।

 


औरंगज़ेब आलमगीर — ख़्वाजा गरीब नवाज़ की चौखट पर हाज़िरी




वो लम्हा जब मुग़ल बादशाह औरंगज़ेब ने झुककर ख़्वाजा गरीब नवाज़ की चौखट को सलाम किया — इतिहास भी सन्न रह गया! 
भारतीय इतिहास में मुग़ल बादशाह औरंगज़ेब आलमगीर का ज़िक्र हमेशा ताक़त, हुकूमत और जंगों के साथ किया जाता है।
लेकिन इतिहास में एक ऐसा लम्हा भी दर्ज है, जिसने दुनिया को बताया कि बादशाहत बड़ी ज़रूर है, मगर दरगाहों के दर पर सब बराबर हैं। 
साल 1679 से 1681 के बीच राजस्थान में फौजी मुहिम के दौरान
औरंगज़ेब आलमगीर ने अजमेर शरीफ़ में ख़्वाजा गरीब नवाज़ मोइनुद्दीन चिश्ती रहमतुल्लाह अलैह की दरगाह पर हाज़िरी दी।
यह सिर्फ़ एक यात्रा नहीं थी —
अहद, अकीदत और तस्लीम का इज़हार था।
वो ऐतिहासिक क्षण
बादशाह अपने कुछ चुनिंदा दरबारियों और अपने दो बेटों बहादुर शाह और आज़म शाह के साथ दरगाह शरीफ़ पहुँचे।
कहते हैं कि उस वक़्त दरगाह का माहौल ऐसा था कि
ताज और तख़्त की चमक भी सूफियाओं के नूर के सामने फीकी पड़ गई।  मोहब्बत और अकीदत का सबूत
हाज़िरी के दौरान औरंगज़ेब की ओर से दरगाह के ख़ादिमों को
बेशुमार अतिया (दान/नज़राना) दिया गया।
दान चाहे छोटा हो या बड़ा —
मक़सद हमेशा एक ही होता है: अकीदत का इज़हार।
यह वाक़िया सिर्फ़ एक बादशाह का दरगाह जाना नहीं था,
बल्कि इस बात का सुबूत भी था कि
अलिया-ए-अल्लाह की चौखट पर हर शक्स बराबर है — चाहे वो ताजपोश बादशाह ही क्यों न हो। 
 सोचने वाली बात
इतिहास लड़ाइयों और फ़तहों से नहीं —
दिलों के झुकने से भी लिखा जाता है।
आज भी जब कोई श्रद्धालु अजमेर शरीफ़ पहुँचता है,
तो वह उसी अकीदत और मोहब्बत की रवायत को आगे बढ़ाता है
जो सदियों पहले बादशाहों ने निभाई।





Monday, November 10, 2025

कलकत्ता की टीपू सुल्तान मस्जिद का निर्माण टीपू सुल्तान के बेटे शहज़ादे ग़ुलाम मुहम्मद अनवर शाह ने अपने वालिद टीपू सुल्तान की याद में 1842 में करवाया था।


 

गांधी मरत नाही ही समस्या आजही कायम आहे.



ब्रिटीश पंतप्रधान चर्चिल गांधीजींना पाण्यात पहायचा. एकवीस दिवसांच्या उपोषणा दरम्यान गांधी नक्कीच मरून जातील असा त्याला विश्वास होता. नवव्या दिवसानंतर गांधी जिवंत आहेत म्हणल्यावर त्यानं भारतात व्हाईसरॉयला तार केली की गांधी पाण्यातून ग्लुकोज घेतात का याची खातरजमा करा. व्हाईसरॉयनं रिपोर्ट दिला की तसं अजिबात काहीच गांधी करत नाहीत.
विशेष म्हणजे इकडे गांधी उपोषणात असतांनाच चर्चिलही ॲडमिट होते आणि त्याकाळी अशक्य समजला जाणारा न्युमोनियानं ग्रस्त होते पण तरीही 'म्हातारा मरण्याची कोणतीही शक्यता आता दिसत नाही' अशा तारा भारतात इंग्रज प्रशासनाला करत होता.
गांधीजींना राजानं बकिंगहॅम पॅलेसमध्ये चहापानासाठी बोलवलं. गांधीजी पंचा नेसून जाणार म्हणल्यावर चर्चिलनं मुक्ताफळं उधळली. निर्धाराप्रमाणे गांधीजी पंचा नेसून गेले. बकिंगहॅम पॅलेस बाहेर ब्रिटीश माध्यमांनी गर्दी केली होती. पत्रकारानं विचारलं 'श्रीमान गांधी, या अशा दरिद्री वेषात तुम्ही राजाला भेटणार? तुमच्याकडे यापेक्षा अधिक कपडे नाहीत'?
गांधी त्यांचं जगप्रसिद्ध हास्य चेहर्‍यावर आणून मिश्कीलपणे म्हणाले 'मला आणि राजाला दोघांनाही पुरतील एवढे कपडे राजानं घातलेले आहेत!'
वरवर बघता एक विनोद पण अंतर्यामी शोषणाची सल सांगणारं हे वाक्य.
पहिल्यांदा ब्रिटीश पार्लमेंट आतून पाहिली तेव्हा तिच्याकडे रोखून पाहणारा कमरेवर हात ठेवलेला चर्चिलचा पुतळा पाहिला. पार्लमेंट स्ट्रीटवर आपला म्हातारा कणखरपणा दाखवत पुतळ्यातून उभा आहे.
मनात विचार आला की चर्चिलचा पुतळा तर दुसरं महायुद्ध जिंकलं म्हणून उभारला पण आमचा म्हातारा तर युद्धविरोधी, एकही युद्ध न लढता प्रेमानं जग जिंकणारा, त्याचाही पुतळा उभारला आहे. युद्धापेक्षा प्रेम श्रेष्ठ असल्याचा हा पुरावा.
बाकी ज्यानं आपलं साम्राज्य उधळून लावलं त्याचाही पुतळा आपल्या संसदेच्या आवारात लावणाऱ्या ब्रिटीशांच्या गुणग्राहकता आणि खिलाडू वृत्तीचीही दाद दिली पाहिजे.
आणि हो, गांधी मरत नाही ही समस्या आजही कायम आहे.



माहुली किल्ल्याचे सन १८२० मधील चित्र. यामध्ये किल्ल्याखाली असलेली छावणी दिसून येईल..


 

महात्मा गांधी ने खिलाफत आंदोलन



महात्मा गांधी ने खिलाफत आंदोलनाला पाठिंबा दिला होता आंदोलनात सहभागी झालेले डॉ.केशव बळीराम हेडगेवार यांनी भडकाऊ भाषण केल्याप्रकरणी एक वर्षाची शिक्षा झाली होती
मुहम्मद पैगंबराच्या मृत्यूनंतर जगातील सर्व मुस्लिम धर्माचा खलिफा असल्याचे मानले जाते. खिलाफत ही धार्मिक राजकीय इस्लामिक संज्ञा आहे. पहिल्या महायुद्धानंतर तुर्कस्तानचे सुलतान खलिफा वर ब्रिटिशांनी लादलेल्या अटीविरुद्ध भारतीय मुसलमानाने ही चळवळ सुरू केली या चळवळीने महात्मा गांधीजींच्या असहकार चळवळीला पाठिंबा दिला.
काँग्रेस पक्षाचे मध्य प्रदेश प्रायव्हसीचे प्रदेश सचिव डॉ. केशव बळीराम हेडगेवार 1921 ते 1922 खिलाफत चळवळीच्या बाजूने ब्रिटिशाविरुद्ध आंदोलन करीत असताना हेडगेवार यांनी अत्यंत भडकाऊ भाषण केल्याप्रकरणी ब्रिटिश सरकारने राजद्रोहाच्या आरोपाखाली एक वर्षासाठी तुरुंगात टाकले.
संघ शाखेवर मुस्लिम द्वेषाचे पाठांतर करून घेतल्या जाते. त्यामुळे डॉ.हेडगेवारानी स्वातंत्र्यपूर्व काळातील महात्मा गांधींनी पुकारलेल्या खिलाफत चळवळीमध्ये भाग घेतला होता हे संघ स्वयंसेवक सांगू शकत नाहीत.
ब्रिटिश तुरुंगातील कैद्यांना भूक आजार कठोर परिश्रमामुळे कमकुवत झालेले असत .जेलमध्ये असलेले निकृष्ट दर्जाचे अन्न कोंदट वातावरणामुळे तुरुंगातील कायद्यांना टी.बी. सारख्या आजार जडले जात असत. तुरुंगातील हालअपेष्टामुळे भारतीय कैदी तुरुंगातून बाहेर पडल्यावर त्याची तब्येत ही कमजोर आणि एखाद्या आजाराने जडलेली असायची.
ब्रिटिश जेलर सर जाठर हा अत्यंत कठोर आणि उग्र स्वभावाचा म्हणून ओळखला जात होता .हेडगेवार यांनी त्यांच्याशी सौहार्दपुर्ण संबंध निर्माण केले. इतर कायद्याचे जेलमधील हाल अपेष्टामुळे वजन कमी झालेले असायचे मात्र हेडगेवार यांची वजन 11 किलोने वाढलेले होते.
1925 ला डॉक्टर केशव बळीराम हेडगेवार यांनी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघाची स्थापना केली
हेडगेवार यांनी आपल्या संघ कार्यकर्त्याला स्वातंत्र्य आंदोलनापासून दूर राहण्यास सांगितले स्वतः मात्र सहभागी झाले ते आरएसएस चे प्रमुख म्हणून नाही तर प्रमुख पद दुसऱ्याला देऊन केवळ हेडगेवार म्हणून आंदोलनात भाग घेऊन जेलमध्ये गेले.
हेडगेवार यांचा दुसऱ्यांदा जेलमध्ये जाण्याचा उद्देश हा होता की काँग्रेसचे कार्यकर्ते हे आपल्या आरएसएस मध्ये सहभागी करून घेण्याचा त्यांचा उद्देश होता. एकही काँग्रेस कार्यकर्ता हेडगेवार यांच्या नादाला लागला नाही.
दोन ऑक्टोबर 2025 रोजी आर एस एस ला 100 वर्षे झाले पंतप्रधान मोदी आणि मुख्यमंत्री फडणवीस यांनी आरएसएस आणि हेडगेवार वर लेख लिहिले कुणाच्याही लेखांमध्ये हेडगेवार यांनी खिलाफत चळवळीत भाग घेतला हे लिहू शकले नाही.
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघाचा मुख्य गाभा हा इतर धर्मियांचा द्वेष करणे हा आहे. मुस्लिम द्वेषातून आर एस एस भाजप सत्य पर्यंत पोहोचलेले आहेत .त्यामुळे त्यांचा खरा इतिहास ते कधीही स्वतःहून सांगणार नाहीत.
जय हिंद जय भारत जय संविधान जय काँग्रेस .
हरिभाऊ सोळंके.
सादोळा ता माजलगाव जि बीड




Monday, November 3, 2025

A new study suggests that - in the year 2032 - Earth will encounter a thick part of the #Taurid #meteor swarm. The cometary debris in the swarm - potential Taurid meteors, aka Halloween fireballs - could bring an increased risk of airbursts, or explosions in Earth's atmosphere, in both 2032 and 2036.

Read more, here: 
https://earthsky.org/.../halloween-fireballs-airburst.../