25 सितंबर 1990 को गुजरात के सोमनाथ से राम मंदिर के समर्थन में निकली आडवाणी की रथयात्रा को 'बौद्धिक ऑक्सीजन' देने वाले अरुण शौरी की नई किताब सावरकर के 'हिंदुत्व' का खौफनाक सच जो सवाल खड़े करता है की क्या बीजेपी का 'हिंदुत्व' भारत को भगवा अफगानिस्तान बनाने की साजिश है?
जिस अरुण शौरी ने 90 के दशक में अपनी धारदार लेखनी से आडवाणी की रथयात्रा को 'बौद्धिक ऑक्सीजन' दी थी, आज वही शौरी उस 'सांप्रदायिक विष-वृक्ष' की जड़ें खोद रहे हैं। उनकी नवीनतम खोजपूर्ण किताब सावरकर के उस कृत्रिम और थोपे गए 'वीरत्व' की धज्जियां उड़ाती है, जिसे संघ परिवार और बीजेपी ने दशकों से झूठ की खाद देकर पाला है। यह किताब केवल एक दस्तावेज नहीं, बल्कि उस वैचारिक अपराध का कबूलनामा है, जिसने भारत की उदारवादी जड़ों में नफरत का तेजाब डाला।
~ सावरकर का हिंदुत्व: शुद्ध रूप से घृणा का दर्शन।
~ अंग्रेजों के लिए 'जी-हुजूरी' करने वाले 'नायक' का पर्दाफाश।
~ हिटलर का महिमामंडन और गांधी से नफरत का खौफनाक चेहरा।
~ बीजेपी के पास अपने नायक नहीं, इसलिए सावरकर का सहारा।
~ भगवा अफगानिस्तान की ओर बढ़ते भारत का अलार्म।
★ अरुण शौरी ने अपनी किताब में सबूतों के साथ यह साबित किया है कि विनायक दामोदर सावरकर का पूरा वजूद ही 'अंग्रेजों की दया' पर टिका था। जिसे 'वीर' कहकर प्रचारित किया जाता है, वह असल में हिटलर की फासिस्ट विचारधारा का परम भक्त था। सावरकर ने न केवल हिटलर की प्रशंसा में कसीदे पढ़े, बल्कि मुंबई में तैनात एक जर्मन एजेंट के जरिए नाजी हुकूमत तक अपनी वफादारी का संदेश भिजवाया ताकि भारत में भी वैसा ही कत्लेआम और तानाशाही तंत्र स्थापित किया जा सके।
“झूठ इतना बोलो कि वो सच के करीब लगने लगे"
★ माफीवीर सावरकर ने गांधीजी के साथ लंदन में रहने और गहरी दोस्ती की जो फर्जी कहानियां गढ़वाईं, शौरी ने उनका पूरी तरह से पोस्टमार्टम कर दिया है। ऐतिहासिक तथ्य गवाह हैं कि सावरकर और गांधी कभी इंग्लैंड में साथ रहे ही नहीं। यह सब केवल गांधी के विराट व्यक्तित्व की छाया में खुद को खड़ा करने की एक घटिया कोशिश थी, जबकि सावरकर ने जीवन भर गांधीजी के लिए अपशब्दों और नफरत का ही इस्तेमाल किया।
★ माफीवीर सावरकर के 'समुद्र में छलांग' वाले जिस किस्से को इतिहास की किताबों में जबरन ठूंसा जा रहा है, वह किसी फिल्मी स्टंट से ज्यादा कुछ नहीं था। शौरी बताते हैं कि जब मालवाहक जहाज किनारे पर लगभग खड़ा था और जमीन की दूरी महज 8-10 फुट थी, तब सावरकर ने बाथरूम के बहाने भागने की एक नाकाम कोशिश की थी। इसे 'महासमुद्र में मीलों तैरने' की शौर्य गाथा बताना इतिहास के साथ किया गया सबसे बड़ा 'इंटेलेक्चुअल फ्रॉड' है।
◆ माफीवीर सावरकर की माफीनामे वाली हकीकत को दबाने के लिए संघियों ने यह झूठ फैलाया कि उन्होंने गांधीजी के कहने पर अंग्रेजों से दया की भीख मांगी थी। शौरी ने इस सफ़ेद झूठ की भी बखिया उधेड़ दी है। सच तो यह है कि जब क्रांतिकारी फांसी के फंदे चूम रहे थे, तब सावरकर अंग्रेजों को अपनी 'सेवाएं' देने के लिए दया याचिकाएं लिख रहे थे।
~ सावरकर का हिंदुत्व एकता नहीं, विभाजन का मंत्र है।
~ घृणा के बिना संगठन नहीं बन सकता ये सावरकर की सोच है।
~ हिंदुइज्म (उदारवाद) बनाम हिंदुत्व (विनाशकारी)।
~ बीजेपी की 'नायक-चोरी' वाली राजनीति बेनकाब।
~ इतिहास के पन्नों से हकीकत का खौफनाक सामना।
★ अरुण शौरी साफ़ चेतावनी देते हैं कि सावरकर का 'हिंदुत्व' भारतीय आत्मा को निगल जाएगा। यह विचारधारा समावेशी भारत को एक 'भगवा अफगानिस्तान' में तब्दील करने की क्षमता रखती है, जहाँ असहमति के लिए कोई जगह नहीं होगी। आरएसएस खुद सावरकर की अविश्वसनीयता से वाकिफ था, इसीलिए गोलवलकर ने उन्हें कभी अपने करीब नहीं फटकने दिया। लेकिन आज सत्ता के भूखे लोगों को गांधी के कद को छोटा करने के लिए सावरकर जैसे विवादास्पद चेहरे की जरूरत पड़ रही है।
◆ "बर्बाद-ए-गुलिस्तां करने को बस एक ही उल्लू काफी था, यहाँ हर शाख पे उल्लू बैठा है..." शौरी की यह किताब उन लोगों की आंखों में मिर्च की तरह लगेगी जो सावरकर को पूजते हैं। अब बीजेपी अपनी आईटी सेल के उन 'भाड़े के टट्टू' और 'दिहाड़ी वाले दलित चिंतकों' को मैदान में उतारेगी जो यह तर्क देंगे कि शौरी ने तो अंबेडकर की भी आलोचना की थी। लेकिन वे सावरकर के इन दस्तावेजी सच का सामना कभी नहीं कर पाएंगे।
★ सावरकर के लिए हिंदुत्व का मतलब सिर्फ और सिर्फ 'अन्य' के प्रति नफरत था। उन्होंने साफ कहा था कि बिना किसी साझा दुश्मन या घृणा के हिंदुओं को एकजुट नहीं किया जा सकता। क्या हम ऐसी जहरीली बुनियाद पर एक आधुनिक राष्ट्र का निर्माण करना चाहते हैं? शौरी की यह किताब हर उस भारतीय को पढ़नी चाहिए जो अपनी आने वाली नस्लों को नफरत की आग से बचाना चाहता है।
~ तथ्यों की मार से तिलमिलाएगी सत्ता।
~ झूठ के गुब्बारे की हवा निकल गई।
~ भारत की आत्मा बनाम सावरकर का फासीवाद।
~ कमेंट में बताएं, क्या सावरकर वाकई 'वीर' थे?
"The truth is like a lion; you don’t have to defend it. Let it loose; it will defend itself."
शौरी ने सच का शेर खुला छोड़ दिया है अब देखते हैं कितने 'शूरवीर' इसके सामने टिक पाते हैं।
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अस्वीकरण: उपरोक्त पोस्ट अरुण शौरी की पुस्तक में वर्णित शोध, ऐतिहासिक संदर्भों और सार्वजनिक विमर्श पर आधारित है। इसका उद्देश्य किसी की भावनाओं को आहत करना नहीं बल्कि ऐतिहासिक तथ्यों पर चर्चा करना है। पाठक स्वयं तथ्यों और दस्तावेजों की पड़ताल करने के लिए स्वतंत्र हैं।
