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जलियांवाला बाग



जलियांवाला बाग का वही संकरा प्रवेश द्वार, जहाँ से 13 अप्रैल 1919 को जनरल डायर अपने सैनिकों के साथ अंदर गया था। उस दिन बैसाखी के अवसर पर हज़ारों निहत्थे लोग एक शांतिपूर्ण सभा के लिए यहाँ एकत्र हुए थे। बिना किसी चेतावनी के जनरल डायर ने सैनिकों को भीड़ पर गोलियाँ चलाने का आदेश दे दिया। लोग जान बचाने के लिए इधर-उधर भागे, लेकिन संकरे रास्ते और ऊँची दीवारों के कारण बाहर नहीं निकल सके। कई लोग अपनी जान बचाने के लिए शहीदी कुएँ में कूद गए।
यह घटना भारत के स्वतंत्रता संग्राम के सबसे दर्दनाक और निर्णायक अध्यायों में से एक मानी जाती है। आज भी यह प्रवेश द्वार उस अमानवीय नरसंहार की मूक गवाही देता है।



लखनऊ में आज से शुरू हुई थी एक लंबी घेराबंदी ।



 लखनऊ की रेज़ीडेंसी बहुत लंबे वक़्त के लिए घिरने जा रही थी,इसका अंदाज़ किसी को नही था । अंग्रेज़ो के ख़िलाफ़ 1857 का बिगुल बज चुका था । उठना अब लखनऊ को था,तो वह 30 मई थी,जब लखनऊ में छावनियों में हमारे सिपाहियों ने बग़ावत का बिगुल बजा दिया । चौलक्खी कोठी और तारावली कोठी से लगाम कसने लगी । हुक्म जारी होने लगे कि इन बिरतानियों को लखनऊ से बाहर करो । सिपाही और अवाम जोश में बढ़ चली ।
एक जद्दोजहद शुरू हुई । बिरतानियों ने कभी नही सोचा था कि कोई उनके यूनियन जैक को भी ज़मींदोज़ करेगा । लखनऊ में बेगम हज़रत महल के नेतृत्व में बिरतानियों का परचम जो रेज़ीडेंसी पर लहरा रहा था,पत्थर मार मार कर ज़मीन पर गिरा दिया गया । लखनऊ में हर तरफ बेगम और मौलवी अहमदुल्ला शाह के सिपाहियों ने कब्ज़े शुरू कर दिये ।
अंग्रेज़ रेज़ीडेंसी में क़ैद हो गए । इस भयंकर गर्म दिनों में हमारे पुरखे सीमित संसाधनों से कम्पनी के लोगों से भिड़ गए । दुनिया ने देखा कि नवाबों ने जिस शहर को पलकों पर बैठाया था,वह आतिश बनकर बिरतानियों पर बरस पड़ा । कितने ही बिरतानी फौजी और अफ़सर हलाक़ हो गए । बिरतानी औरते और बच्चे,जिन्हें हमारे बुज़ुर्गों ने मारने से परहेज़ किया,वह रेज़ीडेंसी में क़ैद हो गए ।
1857 में आगे क्या हुआ,उसका अंजाम क्या रहा । ज़ाहिर है गद्दारों से भरे महल,नीव तो कमज़ोर करते ही है । मगर एक बात तो याद रखने वाली है । हमारे बुज़ुर्गों ने बिरतानियों को थाल में सजाकर सत्ता नही दी । बल्कि किसी थाल में उनके सर थे तो किसी में उनका खून,वह लड़े और बहुत शानदार लड़े ।
आज वही 30 मई है । जब लखनऊ ने बिरतानियों की चालों को समझकर उन्हें एक एक करके तोड़ना शुरू किया । लखनऊ की हर इमारत इस बात की गवाह है । लखनऊ का चप्पा चप्पा हमारे बुज़ुर्गों के पांव की निशानदेही करता है । कैसे वह जूझे,लड़े और जीते भी,जी हाँ वह जीते थे,महीनों बिरतानी क़ैद रहे । रेज़ीडेंसी की तबाही इसकी गवाह है ।
आज बेगम हज़रत महल,मौलवी अहमदुल्ला शाह,उदादेवी,नाना साहब,तात्या टोपे,मंगल पांडे और महान बादशाह बहादुर शाह ज़फ़र समेत हमारे हर बुज़ुर्ग को याद करने का दिन है । जिन्होंने गुलामी का तौक़ पहनने से इनकार किया और सर उठाकर लड़ पड़े । हर सिपाही,हर उसको नमन जिसने आज के रोज़ बजने वाले बिगुल में अपने कदम आगे बढ़ाए ।
30 मई लखनऊ में उस तारीख़ की शुरआत है, जिसने बिरतानियों को अंदर तक हिला दिया । छावनियों की बग़ावत ने उनके पांव के नीचे की ज़मीन खींच ली । आजका दिन उन सबको याद करने का दिन है...आज ही से लखनऊ ने 1857 के एक केंद्र बनने की तरफ अपने कदम बढ़ा दिए थे








मौलाना अबुल कलाम आज़ाद के तारीख़ी अल्फ़ाज़







ये तारीख़ी अल्फ़ाज़ हैं मौलाना अबुल कलाम आज़ाद के, जिसे उन्होंने 1947 में बकरीद के मौके पर दिल्ली की जामा मस्जिद में कहा था। उन्होंने आज़ादी मिलने पर मुसलमानों को उस वक़्त ख़िताब किया। लेकिन उनकी ये बातें पढ़कर ऐसा लगता है जैसे अभी के लिए ही कही गयी थीं।
उन्होंने कहा था की देखो ये मस्जिद की मीनारें तुमसे उचक कर सवाल कर रही हैं कि तुमने अपनी तारीख के सफ़हात को कहां गुम कर दिया है? अभी कल की बात है कि यही जमुना के किनारे तुम्हारे काफ़िलों ने वज़ू किया था, और आज तुम हो कि तुम्हें यहां रहते हुए खौफ़ महसूस होता है, हालांकि देल्ही तुम्हारे खून की सींची हुई है।

अज़ीज़ों! अपने अंदर एक बुनियादी तब्दीली पैदा करो, जिस तरह आज से कुछ अरसे पहले तुम्हारे जोश-ओ-ख़रोश बेजा थे, उसी तरह से आज ये तुम्हारा खौफ़ बेजा है, मुसलमान और बुज़दिली या मुसलमान और इश्तआल एक जगह जमा नहीं हो सकते। सच्चे मुसलमान को कोई ताक़त हिला नहीं सकती है। और न कोई खौफ़ डरा सकता है।

आओ अहद करो कि ये मुल्क हमारा है, हम इसी के लिए हैं और उसकी तक़दीर के बुनियादी फैसले हमारी आवाज़ के बगैर अधूरे ही रहेंगे।

आज तुम ज़लज़लों से डरते हो? कभी तुम ख़ुद एक ज़लज़ला थे, आज अंधेरे से कांपते हो, क्या याद नहीं रहा कि तुम्हारा वजूद ख़ुद एक उजाला था, ये बादलों के पानी की सील क्या है कि तुमने भीग जाने के डर से अपने पायंचे चढ़ा लिए हैं, वो तुम्हारे ही इस्लाफ़ थे जो समुंदरों में उतर गए थे, पहाड़ियों की छातियों को रौंद डाला था, आंधियां आईं तो उनसे कह दिया कि तुम्हारा रास्ता ये नहीं है, ये ईमान से भटकने की ही बात है जो शहंशाहों के गिरेबानों से खेलने वाले आज खुद अपने ही गिरेबान के तार बेच रहे हैं, और ख़ुदा से उस दर्जे तक गाफ़िल हो गये हैं कि जैसे उसपर कभी ईमान ही नहीं था।

अज़ीज़ों मेरे पास कोई नया नुस्ख़ा नहीं है। वही 1400 बरस पहले का नुस्ख़ा है, वो नुस्ख़ा जिसको इस क़ायनात के सबसे बड़े मोहसिन (मोहम्मद सल्ललाहु अलैहि वसल्लम) लेकर आये थे। और वो नुस्ख़ा है क़ुरान का ये ऐलान, 'बददिल न होना, और न गम करना, अगर तुम मोमिन (नेक, ईमानदार) हो, तो तुम ही ग़ालिब होगे'

देशाच्या भल्यासाठी, समाजाच्या भल्यासाठी, भारत विकसित करण्यासाठी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघावर बंदी का आवश्यक आहे?



कारण 1, लेख 1
संघात मुलांच्या मनात कमालीचा मुस्लिम द्वेष भरला जातो, तो स्पष्ट दिसतो.
लोकांना आपल्याकडे आकर्षित करून संघटित करण्यासाठी ह्युमन सायकोलॉजी प्रमाणे एखादा कॉमन शत्रू दाखवणे आवश्यक असते, हा संघटन मोठ्या कालावधीपर्यंत टिकवून ठेवण्यासाठी हा शत्रू कमजोर असायला हवा. अल्पसंख्यक असल्यामुळे मुसलमान यात अगदी फिट बसतात.
पण हा द्वेष न्यूरोसायन्स प्रमाणे मस्तिष्काच्या इतर सृजनशील कार्यांवर विपरीत परिणाम करतो आणि रचनात्मक क्षमता मोठ्या प्रमाणात नष्ट करतो.
तो कसा हे पुढे शेवटच्या भागात व्यवस्थित वैज्ञानिक भाषेत सांगतो...
... परंतु
संघ हा एका विशिष्ट जातीच्या लोकांनी बनवलेला आणि त्यांचाच बाहुल्य असलेला संघटन आहे, या जातीचा ज्ञान क्षेत्रात पूर्वापार असलेल्या एकाधिकारशाहीमुळे, शिक्षण क्षेत्रात जणू कब्जाच आहे आणि हा कब्जा पुढे अनेक वैज्ञानिक संस्था, क्षेत्र, पदांपर्यंत पोचतो.
भारताच्या या संस्थांचा इनोव्हेशन क्षेत्रात एकंदरीत परफॉर्मन्स चांगला नाही कारण सृजनशीलता नाही,
सृजनशीलता का नाही?
कारण द्वेषाने भरलेल्या मस्तिष्कात सृजनशीलता कमी असते.
एकंदरीत या सगळ्यांचा परिणाम वैज्ञानिक क्षेत्रात आपली खुंटलेली प्रगती अधोरेखित करते, याचे पुढचे परिणाम म्हणजे खुंटलेली आर्थिक परिस्थिती.
लहान वयात डोक्यात भिनलेला द्वेष काढून टाकणे जवळपास अशक्य आहे. त्यामुळे देशाची प्रगती व्हायची असेल तर या द्वेषाने भरलेल्या डोक्याच्या मनुष्यांना हटवून नवीन डोकी मोक्याच्या ठिकाणी आणणे अत्यावश्यक आहे.
उपाय
1. जातीय जनगणना करून, आरक्षणाच्या सीमा काढून टाकून ताज्या डोक्याच्या आदिवासी दलित ओबीसी लोकांना महत्वपूर्ण जागी प्रतिष्ठित करणे.
2. द्वेष पेरणाऱ्या संस्थांवर बंदी आणून द्वेषपूर्ण डोकी तयार करणाऱ्या कारखान्यांवर लगाम लावणे.
आता मस्तिष्कावर आणि मस्तिष्काच्या क्षमतेवर द्वेषाचा विपरीत परिणाम कसा होतो हे वैज्ञानिक भाषेत समजून घेऊ.
न्यूरोसायन्स सूचित करते की अत्यंत द्वेष (extreme hatred) मुळे सृजनशीलतेच्या विशिष्ट पैलूंवर (creativity) गुंतागुंतीचा आणि सामान्यतः हानिकारक परिणाम होण्याची शक्यता असते, परंतु एका विशिष्ट ध्येयावर ती केंद्रित होऊ शकते.
अत्यंत द्वेषाचे न्यूरोबायोलॉजी (मेंदूवरील परिणाम)
तीव्र द्वेषाचा अनुभव घेतल्याने मेंदूच्या विशिष्ट भागांमध्ये क्रिया वाढते, जे सामान्यतः तीव्र भावना, कृती आणि सामाजिक मूल्यांकनाशी जोडलेले आहेत:
• इन्सुला आणि पुटामेन (Insula and Putamen): या भागांमध्ये उच्च क्रियाशीलता दिसून येते, जी घृणा (disgust), सतर्कता (vigilance) आणि कारवाईसाठी तत्परतेशी जोडलेली आहे. विशेष म्हणजे, रोमँटिक प्रेमादरम्यानही हेच भाग सक्रिय होतात, ज्यामुळे तीव्र, उत्कट भावनांसाठी एक समान न्यूरल सर्किट सूचित होते.
• फ्रंटल पोल आणि प्रीमोटर कॉर्टेक्स (Frontal Pole and Premotor Cortex): या प्रदेशांमधील क्रिया कारवाईचे नियोजन आणि तयारीशी जोडलेली आहे. याचा अर्थ द्वेष केलेल्या लक्ष्याविरुद्ध कृती करण्यासाठी मेंदू जैविकरित्या सज्ज होत असतो.
• सहानुभूती सर्किट्सची निष्क्रियता (Deactivation of Empathy Circuits): तीव्र नकारात्मक सामाजिक भावना, विशेषतः ज्यांमध्ये इतरांचे मूल्य कमी करणे किंवा अमानवीकरण करणे (dehumanization) समाविष्ट असते, त्यामध्ये अनेकदा मेडियल प्रीफ्रंटल कॉर्टेक्स (mPFC) मध्ये क्रियाशीलता कमी होते. हा प्रदेश सामाजिक आकलन आणि सहानुभूतीसाठी महत्त्वाचा आहे.
सर्जनशीलता आणि आकलन क्षमतेवर परिणाम
सर्जनशीलता, विशेषत: नवीन कल्पनांची निर्मिती (डाइव्हर्जंट थिंकिंग), सामान्यतः आकलन लवचिकतेची (cognitive flexibility) स्थिती आणि एक सकारात्मक किंवा किंचित उत्तेजित भावनिक अवस्थेत चांगली होते.
• लवचिकतेत अडथळा (Impairment of Flexibility): द्वेषाशी संबंधित मेंदूची अवस्था केंद्रित सतर्कता, धोका आकलन आणि कठोर नकारात्मक मूल्यांकनाची असते. लक्ष्यावर तीव्र लक्ष केंद्रित करण्याची ही स्थिती जास्त संज्ञानात्मक संसाधने वापरते, ज्यामुळे डाइव्हर्जंट क्रिएटिव्हिटीसाठी आवश्यक असलेल्या विस्तृत, अन्वेषणात्मक विचार प्रक्रियांपासून संसाधने वळवली जातात.
• अमानवीकरणाचा फिल्टर: द्वेषाची न्यूरल यंत्रणा सहानुभूती कमी करते आणि लक्ष्याचे अवमूल्यन करते, ज्यामुळे एक संज्ञानात्मक फिल्टर तयार होतो जो अत्यंत प्रतिबंधात्मक असतो. हे नवीन उपायांवर किंवा पर्यायी दृष्टिकोनांवर विचार करण्याच्या क्षमतेला मर्यादित करते.
• अपवाद (कलात्मक सर्जनशीलता): विस्तृत संज्ञानात्मक लवचिकता (cognitive flexibility) जरी बाधित होत असली, तरी तीव्र-उत्तेजित नकारात्मक भावना (जसे की निराशा किंवा राग) कधीकधी कलात्मक किंवा अभिव्यक्त सर्जनशीलतेत (artistic or expressive creativity) परिवर्तित होऊ शकतात. या तीव्र नकारात्मक भावनांना कला किंवा संगीताद्वारे व्यक्त करण्याच्या कृतीमुळे मेंदूतील बक्षीस क्षेत्रांना (reward centers) उत्तेजित केले जाऊ शकते, ज्यामुळे सर्जनशील वर्तनाला बळ मिळते. या प्रकरणात, भावनिक तीव्रता एक शक्तिशाली प्रेरक शक्ती म्हणून कार्य करते, परंतु सर्जनशीलतेचा विषय द्वेषाच्या स्रोतावर अत्यंत केंद्रित असू शकतो.
थोडक्यात, अत्यंत द्वेष एक शक्तिशाली, केंद्रित आणि प्रतिबंधात्मक मेंदूची अवस्था तयार करतो, ज्यामुळे सामान्यीकृत सर्जनशीलता आणि आकलन लवचिकता कमी होऊ शकते, परंतु तीव्र भावनिक उत्तेजनाचा उपयोग करून तो तीव्र, केंद्रित कलात्मक किंवा अभिव्यक्त आउटपुटला चालना देऊ शकतो.

औरंग्याची औलाद...

 




'औरंग्याच्या औलादी' अशी गरळ ओकणे आता सध्याच्या धर्मांधतेने बरबटलेल्या वातावरणात सर्वसामान्यपणे नित्याचेच झाले आहे. औरंगजेबाला शिव्या घालणे म्हणजे कट्टर हिंदुत्वाचे प्रमाणपत्र मिळवणे इतके गरजेचे झाले आहे.
पुरोगामी, परिवर्तनवादी, सुधारणावादी विचारांच्या कार्यकर्त्यांना हिणवण्यासाठी 'औरंग्याची औलाद' हा शब्दप्रयोग जणु काय शिवीसारखा अंमलात आणला जात आहे. 'औरंग्याच्या औलादी' या शब्दांमध्ये औरंगजेबाविषयी इतका तिरस्कार, घृणा, विखार भरलेला आहे कि तो 'शहेनशाह औरंगजेब' एकेकाळचा अफगाणिस्तान ते बंगालचा अनभिषिक्त सम्राट होता हे विसरुन तो गल्लीतला टपोरी मवाली असल्याच्या अविर्भावात त्याला धिक्कारले जात आहे. ज्यांना वस्तीतल्या गुंडाची गचांडी धरताना चड्डी पिवळी होईल अशी भिती वाटते तेसुद्धा औरंगजेबाची अवहेलना करुन मर्दुमकीचा आव आणतात त्याविषयी न बोललेले बरे...
औरंगजेब हा त्याकाळातील एक सामर्थ्यवान बादशाह होता त्यामुळे त्याकाळात लोकशाही नसल्याने व निवडणूका होत नसल्याने आपले राज्य वाचवण्यासाठी व वाढवण्यासाठी ज्या काही डावपेच, उपाययोजना करायच्या त्या त्याने केल्या असतील. त्यापैकी काहीवेळा त्याला यश मिळाले असेल वा काहीवेळा अपयश आले असेल हा त्याच्या राजकारणाचा भाग म्हणून मान्य करताना आपल्याला हेही मान्य करावे लागेल की ब्रिटिशांना भारतात पाय रोवण्यासाठी औरंगजेबाच्या मृत्युनंतरही पन्नास वर्षे वाट पहावी लागली होती.
सध्याच्या काळात औरंगजेबाचा तिरस्कार करणारे लोक सत्तेवर असताना, अब्जो रुपये कर्ज घेऊन व देशाची साधनसंपत्ती कवडीमोल भावात बेचिराख करुन, ढोंगी राष्ट्रभक्तीचा आव आणणारे हरामखोर लोक सत्ताधाऱ्यांच्या डोळ्यांदेखत परागंदा होत असताना, राज्यकर्ते डोळ्यावर झापडे लावुन बघ्याची भुमिका घेत आहेत.
औरंगजेबाने आपल्या राष्ट्राची लुट करुन ती संपत्ती भारताच्या बाहेर कधी पाठवली नव्हती. ज्या औरंगजेबाच्या आईचे स्मारक म्हणजे 'ताजमहाल' व बायकोचे स्मारक 'बिबीका मकबरा' यांसारख्या वास्तुकलेचा आदर्श नमुना मानल्या जाणाऱ्या भव्य इमारती आहेत. त्याठिकाणी औरंगजेबाच्या स्मृतिप्रीत्यर्थ बांधलेल्या कबरीवर साधे छतही नाही. विशेष म्हणजे त्याचीच अशी इच्छा होती की त्याची कबर अत्यंत साधी असावी, व त्याने स्वकष्टाने कमावलेल्या पैशातून म्हणजेच त्याने विणलेल्या टोप्या, त्याने त्याच्या हस्ताक्षरात लिहिलेले कुराण विकुन जमा केलेल्या रकमेतूनच ती बांधली जावी. ती इतकी साधी बांधली गेली होती की त्या स्मारकावरचे संगमरवर नंतरच्या काळात ब्रिटिशांनी लावले आहे.
'औरंगजेबाच्या औलादी', 'औरंग्याची औलाद' असा बेंबीच्या देठापासून कंठशोष करणाऱ्या महामुर्खांना हे तरी माहिती आहे का, की ज्याला तथाकथित स्वातंत्र्यवीर सावरकर '१८५७ चे स्वातंत्र्यसमर' म्हणून गौरवतात त्या उठावाचे नेतृत्व त्या औरंग्याच्या औलादीनेच केले होते. आपल्या एकविस शहजाद्यांचा मृत्यू आपल्या डोळ्यासमोर होताना पाहून देखील त्याने ब्रिटिशांजवळ माफी मागितली नव्हती. आपल्या मुलांचे शीर कापुन समोर ठेवलेले पाहून देखील तो शरण गेला नाही. ती औरंग्याची औलाद कोण होती. हे माहित आहे का...? तर त्यासाठीच हा लेखन प्रपंच...
ती 'औरंग्याची औलाद' होती बहादुरशाह जफर. औरंगजेबाच्या वंशावळीतला शेवटचा मुघल शासक. ब्रिटीशांनी संस्थाने खालसा केल्यानंतर व दत्तक विधान नामंजूर केल्यानंतर संस्थानिकांनी आणि पळपुट्या बाजीरावाच्या दत्तक मुलाने म्हणजे धोंडोपंत म्हणजेच दुसऱ्या नानासाहेब पेशव्याने आपल्या अस्तित्वासाठी जो उठाव केला त्याला १८५७ चा राष्ट्रीय उठाव म्हणून गौरविले जाते. प्रत्यक्षात या उठावाचा आणि स्वातंत्र्यसंग्रामाचा काडीमात्र संबंध नाही. महात्मा जोतिबा फुल्यांनी तर याला 'भटपांड्यांचे बंड' अथवा 'चपातीचे बंड' असेही संबोधले होते. तर या संस्थानिकांच्या बंडाचे सरसेनापती तसेच पेशव्यांचे नेते होते आपण ज्यांना द्वेषबुद्धीने 'औरंगजेबाची औलाद' म्हणतो त्यापैकीच एक औलाद म्हणजे औरंगजेबाचे खापरपणतू, शेवटचे वयोवृद्ध मुघल सम्राट बहादुरशाह जफर.
या बहादुरशाह जफर यांची कहाणी अतिशय हृदयद्रावक आहे. एका बाजूला टिपु सुलतान ब्रिटिशांच्या विरोधात लढत असताना ब्रिटिशांना मदत करणारे पेशवे कुठे आणि स्वतःच्या मुलांची कत्तल करून त्यांचे शिर धडावेगळे करून समोर मांडले असतानादेखील ताठ मानेने ब्रिटिशांना शरण न जाणारे बहादुरशाह कुठे...
बहादूरशाह जफर हे भारताचे १९ वे व शेवटचे मोगल सम्राट, तसेच तिमुरी घराण्यातील अखेरचे राज्यकर्ते होते. त्याचे संपूर्ण नाव अबू जफर सिराजुद्दिन मुहम्मद बहादुरशाह. ते दुसरा बहादुरशाह म्हणूनही विख्यात आहेत. मोगल सम्राट दुसरा अकबरशाह व त्याची हिंदू रजपूत पत्नी लालबाई या दाम्पत्याच्या पोटी २४ ऑगस्ट १७७५ रोजी त्यांचा जन्म झाला. वडिलांच्या मृत्यूनंतर १८ सप्टेंबर १८३७ मध्ये बहादुरशाह दिल्लीच्या सिंहासनावर विराजमान झाले. ते उत्तम राज्यकर्ता होते. त्यांनी अनेक सुधारणा करुन लोककल्याणकारी प्रशासन राबविले. प्रजाजनांसाठी महत्त्वपूर्ण काढलेल्या आदेशांमध्ये गोहत्याबंदीचा महत्त्वपूर्ण आदेशही होता. धर्मनिरपेक्ष भावनेने राज्यकारभार करण्यात भारताच्या इतिहासातील त्यांचे स्थान मोठे आहे. उत्तम राजकीय नेता, कवी व गझलकार म्हणून त्यांची ख्याती होती.
भारतामध्ये १८५७ चा उठाव सुरू झाल्यानंतर मेरठमधून सैनिक ११ मे १८५७ रोजी सकाळी सात वाजता दिल्लीच्या लाल किल्ल्यावर पोहोचले. इंग्रज अधिकारी जेम्स डग्लसचा भारतीय सैनिकांनी पराभव केला. १२ मे १८५७ रोजी लाल किल्ल्यामध्ये बहादुरशाह व भारतीय सैनिकांनी विजयोत्सव मोठ्या धामधुमीत साजरा केला. बंडवाल्यांनी बहादुरशाहलाच भारताचा सम्राट व स्वातंत्र्ययुद्धाचा नेता म्हणून घोषित केले. नानासाहेब पेशवे यांनी स्वातंत्र्ययुद्धाचा नेता म्हणून भेटवस्तू पाठवून आपला पाठिंबा दर्शविला. मंगल पांडे, तात्या टोपे, झांशीची राणी, पंजाबच्या रणजितसिंह राजाची पत्नी यांनीही त्यांना पाठिंबा दिला. इंग्रजांनी भारतातील संस्थाने खालसा केल्याने, तनखे रद्द केल्याने सर्वत्र असंतोष पसरला होता. संस्थानांची अवस्था अत्यंत बिकट झाली होती. बहादुरशाहवर इंग्रजांचा प्रभाव होता. ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनीच्या हातामध्ये सर्व सत्ता होती. जाहीरनामे मात्र बहादुरशाहच्या नावे प्रसारित होत असत. पुढे पुढे कंपनी सरकार व भारतीय सैनिक यांमधील संघर्ष वाढत गेला.
बहादुरशाह ज्या वेळेस ब्रिटिशांच्या विरोधात लढत होते, तेव्हा त्यांचे वय ८२ वर्षांचे होते. १८५७ च्या उठावामध्ये सामील होण्यासाठी त्याने जयपूर, उदयपूर, जोधपूर, इंदूर, ग्वाल्हेर या संस्थानिकांना पत्रे पाठवून आपण सर्व भारतीय एकत्र येऊन परकीय इंग्रजांना भारतातून हाकलून देऊया, असे कळवले; परंतु रजपूत संस्थानिकांनी त्याकडे दुर्लक्ष केले. या राजपूत संस्थानिकांप्रमाणे जीहुजूरी करुन बहादुरशाह आपले संस्थान, हवेल्या, गढ्या वाचवू शकले असते परंतु त्यांनी तसे केले नाही. ब्रिटीशांशी निकराने लढत देऊन त्यांनी आपल्या बहादुरीची पराकाष्ठा केली. बहादुरशाहने भारतीय क्रांतिकारकांच्या मदतीने इंग्रजांचा पराभव करून दिल्ली व इतर भागांतील इंग्रजांना हाकलून दिले. नंतर मात्र शक्तिशाली इंग्रजांपुढे त्याचे काहीच चालले नाही. इंग्रजांनी हा उठाव निर्घृणपणे चिरडून टाकला. बहादुरशाहचा पराभव झाला. तरीही भारतीय जनता बहादुरशाहनाच भारताचा सम्राट मानत होती. उठाव सुरू असतानाच ते आपली तीन मुले व नातवंडांसह दिल्लीच्या हुमायूनच्या मकबऱ्यामध्ये आश्रयास गेले. मिर्झा इलाही बख्तच्या विश्वासघाताने इंग्रज सैन्याने मेजर हडसनच्या नेतृत्वाखाली १४ सप्टेंबर १८५७ ला बहादुरशाहना पकडले. पुत्र मिर्झा मुघल, मिर्झा खिज्र सुलतान आणि नातू अबू बख्त यांना पकडून ठार करण्यात आले. इतर २१ शाहजाद्यांना पकडून फाशी देण्यात आले. बहादुरशाहवर जानेवारी १८५८ मध्ये यूरोपियन लोकांची कत्तल केल्याच्या आरोप ठेवून त्यांना आजन्म कारावासाची शिक्षा दिली गेली (२९ मार्च १८५८). त्यांना रंगून (म्यानमार) येथे कैदेत ठेवले गेले. पाच वर्षांनी त्यांचे निधन झाले, तेथेच त्यांचे दफन करण्यात आले. त्यांच्या मृत्यूबरोबरच औरंजेबाच्या नामधारी मोगल सम्राटाचा कालखंड इतिहासजमा झाला. त्याची आठवण म्हणून भारतात विविध ठिकाणी स्मारके उभारलेली आहेत.
बहादुरशाह यांची शेवटची इच्छा शेवटचा श्वास भारतातच घ्यावा, तसेच दफनही भारतभूमीतच व्हावे अशी होती. परंतु तसे झाले नाही. बहादुरशाहने उर्दूमध्ये अनेक कविता, गझला केल्या. विशेषतः क्रांतीच्या काळामध्ये अनेक कविता व गझला लिहिल्या. त्यांच्या कालखंडामध्ये उर्दू शायरी बहराला आली. प्रेम व रहस्य या विषयांवर त्यांनी अनेक कविता केल्या. ब्रिटिशांनी दिलेल्या त्रासाबद्दलही त्यांनी काही लेखन केले. त्यांच्या बऱ्याच कविता व गझला १८५७ च्या उठावामध्ये नष्ट झाल्या. त्यांच्या उर्वरित गझला कुल्लियात–ए–जफर या नावाने विख्यात आहे. त्यांनी आपल्या कारकिर्दीमध्ये दिल्ली येथे बांधलेली ‘जफर महलʼ ही मोगल कालखंडातील शेवटची वास्तू होय. ते सूफी धर्माचे सच्चे अनुयायी होते.
१८५७ चा उठाव मोडून इंग्रजांनी दिल्ली पुन्हा ताब्यात घेतली. या उठावाचे नामधारी प्रमुख होते 'औरंग्याची औलाद' दिल्लीश्वर सम्राट बहादूर शाह जफर...
दिल्ली काबीज केली हे दाखवून देण्यासाठी बादशाहाला पकडणं इंग्रजांसाठी महत्त्वाचं होतं. यासाठी कॅप्टन विल्यम हॉडसनवर जबाबदारी सोपवण्यात आली. हॉडसनच्या नेतृत्वाखाली १०० सैनिक बादशाहाला पकडण्यासाठी रवाना झाले.
बादशहाने हुमायूनच्या कबरीत आश्रय घेतला होता. हॉडसन जेव्हा हुमायूनच्या कबरीकडे निघाला तेव्हा वाटेत एकाही बंडखोराने त्याच्यावर किंवा त्याच्या सैन्यावर गोळीबार केला नाही. हुमायूनच्या कबरीच्या आसपासचे लोक आपल्याशी कसे वागतील याविषयी हॉडसनला काळजी होतीच. पण जीव महत्त्वाचा म्हणून तो कबरीजवळ लपून बसला.
१८५७ च्या बंडावर 'दि सीज ऑफ दिल्ली' हे पुस्तक लिहिणारे अमरपाल सिंग सांगतात, "बादशाहाने आत्मसमर्पण करावं यासाठी आणि महाराणी झीनत महलला भेटण्यासाठी हॉडसनने आपल्या दोन प्रतिनिधींना पाठवलं. हे दोन प्रतिनिधी म्हणजे मौलवी रजब अली आणि मिर्झा इलाही बक्श होते."
पण बादशाह काही आत्मसमर्पण करायला तयार नव्हता. त्याला मनवण्यात दोन तास उलटून गेले होते. हॉडसनला वाटलं की आत गेलेल्या मौलवी रजब अली आणि मिर्झा इलाही बक्श यांची हत्या करण्यात आली असेल. पण तेवढ्यात हे दोघे बाहेर आले आणि बादशाह आत्मसमर्पण करायला तयार आहे असं सांगितलं. पण बादशाहाने हॉडसनसमोर एक अट ठेवली. जनरल आर्कडेल विल्सनने जीवनदान देण्याचं वचन दिलं होतं ते तुम्ही पाळाल याची खात्री जोपर्यंत आपल्याला मिळत नाही तोपर्यंत आत्मसमर्पण करणार नाही असं बादशाहाने सांगितलं.
बादशाहाच्या या अटीवर इंग्रजांच्या तंबूत चर्चा सुरू झाली. त्यांना कळेना की, बादशाहाला हे वचन नेमकं दिलं कोणी?
पण, बंडखोरांपैकी कोणी जर आत्मसमर्पण करत असेल तर त्यांच्यासाठी कोणत्याही अटी शर्थी ठेवल्या जाणार नाहीत असे आदेश गव्हर्नर जनरलने आधीचं दिले होते.
उठाव मोडून काढण्यासाठी इंग्रज दिल्लीत शिरले तेव्हा बादशाहाने किल्ल्याच्या आत असलेल्या महालात राहायचा निर्णय घेतला.
इंग्रजांनी किल्ल्यापासून शंभर यार्डावर असलेला बंडखोरांचा तळ ताब्यात घेतल्याच्या बातम्या १६ सप्टेंबर १८५७ रोजी आल्या होत्या. पण ते किल्ल्यात येऊ शकत नव्हते कारण त्यांच्याकडे पुरेसं सैन्यबळ नव्हतं.
जुन्या किल्ल्यात आश्रय घ्यावा म्हणून बादशाहाने १९ सप्टेंबर रोजी आपलं कुटुंब आणि हुजूऱ्यांसह महाल सोडला. बादशाहाने महाल सोडलाय आणि तो हुमायूनच्या कबरीकडे निघालाय अशी बातमी इंग्रजांना त्यांच्या गुप्तहेरांकरवी समजली होती. एकीकडं इंग्रज बंडखोरांना फासावर लटकवत होते आणि तेच दुसरीकडे बादशाहाला मात्र जीवदान द्यायला तयार होते. असं का?
यावर अमरपाल सिंग यांनी लिहिलंय की , 'एक तर बहादूरशाहा वयोवृद्ध झाला होता. आणि बंडखोरांचा तो नामधारी प्रमुख होता. इंग्रजांनी जरी दिल्ली काबीज केली असली तरी दिल्लीचं उत्तर टोक इंग्रजांच्या हाती लागलं नव्हतं. तिथे युद्ध सुरूच होतं. अशात जर बादशाहाला मारलं तर बंडखोरांच्या भावना आणखीनच पेटतील अशी भीती इंग्रजांना होती. त्यामुळे बादशाह शरण येत असेल तर त्याला जीवनदान द्यायचं असं विल्सनने आधीच ठरवलं होतं.'
'ट्वेल्व्ह इयर्स ऑफ द सोल्जर लाइफ इन इंडिया' या आपल्या पुस्तकात विल्यम हडसन लिहितो की, 'हुमायूनच्या कबरीतून सर्वांत आधी कोण बाहेर आलं असेल तर ती महाराणी झीनत महल. तिच्या पाठोपाठ आला, बादशाह बहादूर शाह जफर.'
हडसनने पुढं येऊन बादशाहाला आपली हत्यारे खाली ठेवायला सांगितली.
यावर बादशाहाने त्याला विचारलं की, 'तूच हडसन आहेस का? मला जे वचन दिलं होतं ते तू पुन्हा एकदा सर्वांसमक्ष सांगशील का?'
कॅप्टन हडसन उत्तरला की, 'होय! मीच कॅप्टन हडसन आहे. आणि मला हे सांगायला आनंद होतोय की तुम्ही आत्मसमर्पण केल्यास महाराणी झीनतसह तुम्हाला आणि तुमच्या मुलांना जीवनदान दिलं जाईल. मात्र तुम्हाला वाचवण्याचा प्रयत्न झाल्यास मी याठिकाणी तुम्हाला कुत्र्याला गोळ्या घालून ठार करतात तसं ठार करीन.'
हे ऐकून वृद्ध बादशाहाने आपली शस्त्रास्त्र हॉडसनकडे सुपूर्द केली. बादशाहा शहरात आल्यावर त्याला बेगम समरूच्या घरात नजरकैदेत ठेवण्यात आलं होतं. त्याच्यावर पाळत ठेवण्यासाठी एचएम ६१ च्या ५० सैनिकांची निवड करण्यात आली होती.
बहादूरशाहाची जबाबदारी कॅप्टन चार्ल्स ग्रिफिथ नावाच्या इंग्रज अधिकाऱ्यावर होती. हा इंग्रज अधिकारी आपल्या 'द नॅरेटिव्ह ऑफ द सीज ऑफ दिल्ली' या पुस्तकात लिहितो की, 'मुघल घराण्याचा शेवटचा वंशज व्हरांड्यात ठेवलेल्या लाकडी बाजल्यावर मांडी घालून बसला होता. त्याची कमरेपर्यंत रुळणारी दाढी सोडली तर आज त्याच्या सेवेत भव्यदिव्य असं काहीच नव्हतं.'
वयाची ८० ओलांडलेला हा बादशाह उंचीला जेमतेमच होता. त्याने अंगात सफेद रंगाचा झब्बा घातला होता आणि त्याच रंगांची टोपी डोक्यावर होती. मोरपिसाऱ्याच्या पंख्याने दोन सेवक त्याला वारा घालत होते. त्याच्या तोंडातून एकही शब्द फुटत नव्हता. त्याच्या नजरा जमिनीवर खिळल्या होत्या. बादशाहापासून तीन फुटावरच एक इंग्रज अधिकारी बसला होता. त्याच्या शेजारी दोन बंदूकधारी शिपाई तैनात होते. यदाकदाचित बादशहाला वाचवायचा प्रयत्न झालाच तर आहे त्या ठिकाणी बादशाहाला गोळ्या घालाव्यात असे आदेश त्यांना देण्यात आले होते.
राजपुत्रांची ओळख पटवण्यासाठी हडसन राजघराण्यातल्या लोकांना सोबत घेऊन गेला होता. बादशाहाला तर पकडलं, पण आता त्याच्या राजपुत्रांचं काय करावं हे विल्सनला समजेना. राजपुत्र हुमायूनची कबर असलेल्या वास्तूत लपून बसले होते. ते पळून जायच्या आत त्यांना ताब्यात घ्यायला हवं असं कॅप्टन हडसनचं मत होतं. या राजपुत्रांसोबत बंडखोरांचा नेता मिर्झा मुघल, मिर्झा खिज़्र सुलतान आणि मिर्झा मुघलचा मुलगा मिर्झा अबू बकरही होते.
कॅप्टन हडसनने जनरल विल्सनची परवानगी घेऊन १०० सैनिकांची एक फौज उभारली. ही फौज राजपुत्रांच्या अटकेसाठी तयार करण्यात आली होती. लेफ्टनंट मॅक्डोव्हेलसुद्धा या फौजेच्या मदतीला आले होते. घोड्यांवर स्वार झालेली ही फौज धिम्या पावलांनी हुमायूनच्या कबरीजवळ आली. राजपुत्रांची ओळख पटावी म्हणून हडसनने राजघराण्यातील एक सदस्य आणि बादशहाच्या पुतण्याला सोबतीला घेतलं होतं. बादशाहाचा हा पुतण्या राजपुत्रांनी हत्यारे म्यान करावी म्हणून इंग्रजांच्या वतीने शिष्टाई करायला गेला होता. तो जर यात यशस्वी झाला तर त्याला जीवदान दिलं जाईल असं आश्वासन हडसनने त्याला दिलं होतं.
हडसनने याआधी कधीच राजपुत्रांना पाहिले नव्हते. त्यामुळे राजपुत्रांची ओळख पटवण्याची जबाबदारी सुद्धा या बादशहाच्या पुतण्यावर येऊन पडली होती. हुमायूनच्या कबरीपासून अवघ्या अर्ध्या मैलावर हडसनने तळ ठोकला होता. त्याने बादशाहाचा पुतण्या आणि मुख्य गुप्तचर अधिकारी रजब अलीला निरोप घेऊन राजपुत्रांकडे पाठवलं. राजपुत्रांनी बिनशर्त शरणागती स्वीकारावी अन्यथा परिणामांना सामोरं जावं असा तो निरोप होता.
हडसन याविषयी आपल्या पुस्तकात लिहितो की, 'राजपुत्रांना आत्मसमर्पण करण्यासाठी राजी करणं अवघड होतं आणि यासाठी बरीच मेहनत घ्यावी लागली.
अर्धा तास उलटून गेल्यावर राजपुत्रांनी हडसनसाठी एक संदेश पाठवला. 'हडसन आम्हाला जीवनदान देण्याचे वचन देणार असेल तर आम्ही आत्मसमर्पण करू' असा संदेश राजपुत्रांनी पाठवला होता. हडसनने मात्र 'असं वचन देणार नाही' हा पवित्रा घेत बिनशर्त आत्मसमर्पण करण्याचा मुद्दा रेटला. यानंतर हडसनने राजपुत्रांना आणण्यासाठी दहा सैनिकांची एक तुकडी पाठवली.
इंग्रज अधिकारी मॅक्डोव्हेल लिहितो की, 'तिन्ही राजपुत्र बैल ओढत असलेल्या एका रथातून बाहेर आले. रथाच्या दोन्ही बाजूला पाच पाच शिपाई होते. आणि त्यांच्या मागोमाग दोन-तीन हजार लोकांचा जमाव येत होता.' 'राजपुत्रांना पाहताच मी आणि हडसन घोड्यांना टाच देऊन पुढच्या दिशेने गेलो. त्या तिघांनीही हडसन समोर माना झुकवल्या. हडसननेही मान लवून उत्तर दिलं आणि रथ पुढे आणायला सांगितलं. जमावही मागोमाग येण्याच्या प्रयत्नात होता, मात्र हडसनने हाताचा इशारा करून जमावाला तिथेच थांबण्याचा इशारा दिला. आता जमाव आणि रथामध्ये अंतर होतं.'
हडसनने सिगारेट शिलगावत निवांत असल्याचा आव आणला.
बादशहाचे घोडे, हत्ती, शस्त्र, रथ अशा गोष्टी कबरीत बऱ्याच दिवसांपासून पडून होत्या. राजपुत्र बाहेर आले तेव्हा या गोष्टीही बाहेर आणण्यात आल्या. कबरीतून बाहेर आल्यानंतर राजपुत्रांनी पुन्हा एकदा विचारले की त्यांना जीवदान मिळणार आहे का?
यावर हडसन लिहितो, 'आणि मी म्हटलं 'अजिबात नाही' लागलीच त्यांना शहराच्या दिशेने रवाना केलं, सोबतीला माझे सैनिक होते. आता राजपुत्रांनी समर्पण केलंच आहे तर कबरीत आत जाऊन बघू असे मी मनाशी म्हटलं. आत जाऊन पाहतो तर काय, तिथं ५०० तलवारी लपवून ठेवल्या होत्या. तिथं बंदुका, घोडे, बैल, रथ आदी गोष्टीही होत्या.'
इथं आणखीन काही काळ थांबणं म्हणजे मृत्यूला आमंत्रण दिल्यासारखं आहे, आपण इथून निघुया असा इशारा मॅक्डोव्हेलने दिला. मला मात्र याचा फरक पडत नाही या अविर्भावात मी सिगरेटचे झुरके घेतंच राहिलो.' थोडा वेळ निघून गेल्यावर हडसन आणि मॅक्डोव्हेलला त्यांचे सैनिक रस्त्यात भेटले. हे तेच सैनिक होते जे राजपुत्रांना शहराच्या दिशेने घेऊन जात होते.
हडसन आणि मॅक्डोव्हेल दोघेही आपल्या पुस्तकात लिहितात की, ते शहराच्या दिशेने जात असताना त्यांना काहीतरी विपरीत घटणार असल्याचा अंदाज आला होता.
अमरपाल सिंग लिहीतात, दिल्लीपासून अवघ्या पाच मैलांवर असताना हडसनने मॅक्डोव्हेलला विचारलं, या राजपुत्रांचं काय करायचं? यावर मॅक्डोव्हेल म्हणाला की, "मला वाटतंय त्यांना इथंच ठार मारलं पाहिजे. हडसनने या तिन्ही राजपुत्रांना रथातून उतरायला सांगितलं आणि कपडे काढण्याचे आदेश दिले." कपडे काढल्यावर पुन्हा त्यांना रथात बसायला सांगितलं. त्यांच्या अंगावर असलेले दागिने, रत्नजडीत तलवारी काढून घेण्यात आल्या. हॉडसनने रथाच्या दोन्ही बाजूला पाच पाच सैनिक तैनात केले. मग हडसन आपल्या घोड्यावरून खाली उतरला आणि त्याने त्याच्या कोल्ट रिवॉल्वरमधून राजपुत्रांवर प्रत्येकी दोन गोळ्या झाडल्या. या राजपुत्रांचा जागीच मृत्यू झाला.
हडसनने राजपुत्रांना रथातून खाली उतरायला सांगितलं होतं तेव्हा ते तिघेही मोठ्या आत्मविश्वासाने रथातून खाली उतरले. कारण त्यांना वाटत होतं की, हडसन एकट्याच्या बळावर आम्हाला मारायचं धाडस करणार नाही. त्यासाठी त्याला विल्सनची परवानगी घ्यावीच लागेल. हडसनने पुढे त्यांना कपडे काढायला लावले, तेव्हाही त्यांचा असाच समज झाला की, दिल्लीच्या रस्त्यावरून उघडी धिंड काढून याला आपला अपमान करायचा आहे. म्हणून त्यांनी कोणतेही आढेवेढे न घेता आपले कपडेही उतरवले. तिथून जवळच बादशाहाचा एक किन्नर आणि इसम उभा होता. त्या दोघांनीही तिथून पळ काढण्याचा प्रयत्न केला. मात्र मॅक्डोव्हेल आणि त्याच्या सैनिकांनी पाठलाग करून त्यांना ठार मारलं.
या सर्व घटनाक्रमविषयी मॅक्डोव्हेल लिहितो, 'जवळपास ४ वाजत आले होते. हॉडसनने त्या तिघांचे मृतदेह एका रथात ठेऊन शहरात प्रवेश केला. त्या तिघांचे मृतदेह शहरातील एका उंच ठिकाणावर लोकांना दिसतील अशा पद्धतीने ठेवण्यात आले. गुप्तांग सोडलं तर त्यांच्या अंगावर कपड्याची एक चिंधी सुद्धा नव्हती. २४ सप्टेंबरपर्यंत मृतदेह त्याच ठिकाणी पडून होते. बरोबर चार महिन्यांपूर्वी आमच्या स्त्रियांची याच पद्धतीने याच ठिकाणी हत्या करण्यात आली होती.'
या घटनेनंतर हडसनने आपल्या भावाला पत्र लिहिलं होतं. त्या पत्रात तो म्हणतो, 'तिथं जमलेल्या लोकांना मी म्हणालो, हे तेच लोक आहेत ज्यांनी आमच्या निःशस्त्र महिला-मुलांची हत्या केली. आम्ही त्यांना त्यांच्या गुन्ह्याची शिक्षा दिली आहे.'
'मी त्या तिघांवरही गोळ्या झाडल्या. त्यांचे मृतदेह चांदणी चौकातल्या कोतवालीच्या समोर लोकांना दिसतील अशा पद्धतीने टाकण्याचे आदेश दिले. मी क्रूर नाहीये पण या लोकांना मारून मला पराकोटीचा आनंद मिळालाय.'
रेव्हरंड जॉन रॉटन यांच्या 'द चॅपलेन्स नॅरेटिव्ह ऑफ द सीज ऑफ दिल्ली' पुस्तकात लिहिल्याप्रमाणे, 'थोरला राजपुत्र अंगापिंडाने मजबूत होता. दुसरा त्याहून थोडा लहान होता, तर तिसरा राजपुत्र वीस वर्षांचा असावा.'
या तिघांचे मृतदेह ज्या ठिकाणी फेकले होते तिथे कोक रायफलचा एक गार्ड तैनात करण्यात आला होता. तीन दिवस ते मृतदेह कोतवालीच्या बाहेर तसेच पडून होते. त्यांची विटंबना करून शेवटी त्यांचा दफनविधी करण्यात आला. या सगळ्यामागे सुडाची भावना होती. कारण तीन महिन्यांपूर्वी अशाच पद्धतीने इंग्रज महिला मुलांच्या हत्या करून त्यांचे मृतदेह उघड्यावर फेकण्यात आले होते. लोकांनी त्यांची ही अवस्था बघावी अशी बंडखोरांची इच्छा होती.
२७ सप्टेंबरला ब्रिगेडियर शॉवर्स आपल्या सैनिकांसह उरलेल्या राजपुत्रांच्या शोधात निघाले. त्याच दिवशी राजपुत्र मिर्झा बख्तावर शाह, मिर्झा मेंडू आणि मिर्झा जवान बख्त शॉवर्सच्या हाती लागले.
ऑक्टोबर महिना सुरू झाल्या झाल्या आणखीन दोन राजपुत्र इंग्रजांच्या हाती लागले. त्यांनाही गोळ्या घालून ठार करण्यात आलं. या दोघा राजपुत्रांनी बंडखोरांच्या एका टोळीचं नेतृत्व केलं होतं. त्याचबरोबर अनेक इंग्रजांचे खून केल्याचा आरोप त्यांच्यावर लावण्यात आला होता.
दरम्यानच्या काळात एक विचित्र घटना घडली. या दोन्ही राजपुत्रांना देहदंडाची शिक्षा झाली तेव्हा ६० रायफल तुकडीतील काही सैनिकांनी आणि काही गोरखा सैनिकांनी त्यांच्यावर गोळ्या झाडल्या. मात्र यातली कोणतीही गोळी राजपुत्रांचा जीव घेऊ शकली नाही, ते फक्त जखमी झाले. शेवटी एका प्रोव्होस्ट सार्जंटने राजपुत्रांच्या मस्तकात गोळ्या झाडल्या आणि त्यांना ठार केलं.
कर्नल ईएल ओमनी त्यांच्या डायरीत लिहितात की, 'गोरखा सैनिकांनी जाणूनबुजून राजपुत्रांच्या शरीराच्या खालच्या भागावर गोळ्या झाडल्या होत्या. राजपुत्रांना वेदनादायक मृत्यू यावा या उद्देशाने त्यांनी ही कृती केली होती.' या राजपुत्रांना अस्वच्छ कपडे घालण्याची सक्ती करण्यात आली होती मात्र त्यांनी धैर्याने आपल्या मृत्यूला कवटाळलं.
बहादूरशहा जफरचे दोन पुत्र मिर्झा अब्दुल्ला आणि मिर्झा क्वैश इंग्रजांच्या तावडीतून निसटले.
उर्दू लेखक अर्श तैमुरी यांनी विसाव्या शतकाच्या सुरुवातीला 'किला-ए-मुल्ला की झलकीस' हे पुस्तक लिहिलं. यात दिल्लीत सांगितल्या जाणाऱ्या लोककथाच लिहिण्यात आल्यात. या पुस्तकात म्हटल्याप्रमाणे, या दोन राजपुत्रांना हुमायूनच्या कबरीत ठेवलं होतं. तिथंच एक शीख रिसालदार होता.' त्या रिसालदाराला राजपुत्रांची दया आली. त्याने या दोघांना इथं कशासाठी उभे आहात असं विचारलं. यावर ते राजपुत्र म्हणाले की, साहेबांनी इथं उभं राहायला सांगितलंय.
तो शीख त्यांना म्हणाला की, स्वतःवर थोडी तरी दया दाखवा. तो इंग्रज जेव्हा परत येईल तेव्हा नक्कीच तुमचा जीव घेईल. त्यापेक्षा इथून पळा, श्वास घेण्यासाठी सुद्धा थांबू नका. असं बोलून तो शीख पाठमोरा फिरला.
हे दोन्ही राजपुत्र वेगवेगळ्या दिशेने धावायला लागले. यातला मीर क्वाएश साधूचा वेष धारण करून उदयपूरला पोहोचला. तिथल्या महाराजांनी दोन रुपये पगारावर त्याला ठेऊन घेतलं. हॉडसनने क्वाएशला शोधण्यासाठी आकाश पातळ एक केलं पण तो काही हॉडसनला सापडला नाही.
बहादूर शाह जफरचा दुसरा मुलगा अब्दुल्ला टोंक संस्थानात पळून गेला. तिथं त्याला गरिबीत आयुष्य काढावं लागलं पण तो शेवटपर्यंत इंग्रजांच्या हाती लागला नाही. बहादूरशहाच्या इतर मुलांना एकतर फाशी देण्यात आली तर अर्ध्यांना काळ्या पाण्याची शिक्षा भोगायला पाठवून दिलं. काही राजपुत्रांना आग्र्याला तर काहींना कानपूर आणि अलाहाबादच्या तुरुंगात डांबून ठेवण्यात आलं. त्यांचे एवढे हाल करण्यात आले की दोन एक वर्षात हे राजपुत्र मरण पावले.
इंग्रजांनी बहादूर शाह जफरला वचन दिलं होतं की ते त्याला मारणार नाहीत, त्यांनी हे वचन पाळलं. बादशाहाला त्यांनी दिल्लीपासून दूर बर्माला पाठवलं. याच ठिकाणी ७ नोव्हेंबर १८६२या दिवशी दिल्लीच्या बादशहाने अखेरचा श्वास घेतला. बहादूर शहा जफर यांच्या मृत्यूनंतर त्यांचा देह रंगून जवळील “श्वेडागोन पगोडा” येथे दफन करण्यात आला. यानंतर काही वर्षांनी त्याठिकाणी त्यांची दर्गा बनविण्यात आली.
बहादूर शहा जफर यांना लोक एक सुफी संत मानत असतं. त्यामुळेच आजसुद्धा सर्व धर्मांचे लोक त्यांच्या स्मारकावर श्रद्धापुर्वक फुल अर्पण करतात.
बहादूर शहा यांच्या कारकिर्दीत उर्दू शायरीचा मोठ्या प्रमाणात विकास झाला होता. मुगल शासक बहादूर शहा जफर स्वत: एक प्रख्यात शायर आणि कवि होते. त्यांच्या उर्दू शायरी आणि त्यांचं भारताप्रती असलेलं प्रेम याकरता देशात आजसुद्धा त्याचं नाव घेतलं जातं. बहादूर शहा जफर यांनी साहित्यिक क्षेत्रांत देखील आपले योगदान दिले आहे. ते एक राजनेता आणि कवि असण्याबरोबर संगीतकार तसंच, सौंदर्यानुरागी व्यक्ती होते. तसंच त्यांना सुफी संताची उपाधी सुद्धा देण्यात आली होती.
सन १८५७ साली झालेल्या स्वातंत्र्याच्या पहिल्या उठावाच्या वेळेला त्यांनी दिलेल्या योगदाना बद्दल सन १९५९ साली त्यांच्या नावाने “ऑल इंडिया बहादूर शहा जफर एकेडमी” ची स्थापना करण्यात आली. याशिवाय, दिल्ली शहरातील एका रस्त्याच्या मार्गाला बहादूर शहा जफर यांचे नाव देण्यात आले आहे. इतकेच नाही तर भारतातील अंतिम मुगल शासक म्हणून त्यांच्या जीवनावर आधारित काही हिंदी-उर्दू चित्रपट बनविण्यात आले आहेत.
बहादूर शहा जफर यांच्या दरबारातील दोन मुख्य शायर मोहम्मद गालिब आणि जौक यांना शायर लोक आजसुद्धा आदर्श मानतात. बहादूर शहा जफर स्वत:ला एक महान शायर मानत असत. त्यांच्या अधिकतर गजल या विशेष करून जीवनातील वास्तव आणि प्रेमावर आधारित आहेत.
त्यांनी आयुष्यातील शेवटच्या दिवसात रंगून येथे पुष्कळ गजल लिहिल्या होत्या. त्यांनी लिहिलेल्या शायरीबद्दल विशेष सांगायचं म्हणजे, कैदेत असताना बहाद्दूरशाह यांना गजल लिहिण्याकरता लेखणी देण्यात आली नव्हती. शायरीची आवड असलेल्या बहादूरशाह जफर यांनी तुरुंगात जळालेल्या आगपेटीच्या काड्यांच्या साह्याने भिंतीवर गजल लिहिल्या.
बहादूर शहा जफर हे फार काही महत्वकांक्षी राजे नव्हते.
परंतु, स्वभावाने ते खूपच दयाळू आणि दानशूर व्यक्ती होते. त्यांनी आपल्या जीवनात दुसऱ्या कुठल्या धर्माची कधीच अवहेलना केली नाही. सर्वच धर्मांचा त्यांनी आदर केला होता.
त्यांनी लिहिलेली एक गजल अत्यंत सुप्रसिद्ध आहे. आपल्या आयुष्यातील शोकांतिका व शेवटच्या दिवसांतील अगतिकता त्यांच्या या रचनेमध्ये दिसुन येते. एका सत्ताधीश सम्राटाची शेवटच्या क्षणी झालेली दैन्यावस्था त्यांच्या रचनेतुन आपल्याला खुप काही शिकवून आणि धडा देऊन जाते...
लगता नहीं है जी मेरा उजड़े दयार में,
किस की बनी है आलम-ए-नापायदार में.
बुलबुल को बागबां से न सैयाद से गिला,
किस्मत में कैद लिखी थी फसल-ए-बहार में.
कह दो इन हसरतों से कहीं और जा बसें,
इतनी जगह कहां है दिल-ए-दाग़दार में.
एक शाख गुल पे बैठ के बुलबुल है शादमान,
कांटे बिछा दिए हैं दिल-ए-लाल-ए-ज़ार में.
उम्र-ए-दराज़ मांग के लाए थे चार दिन,
दो आरज़ू में कट गए, दो इन्तेज़ार में.
दिन ज़िन्दगी खत्म हुए शाम हो गई,
फैला के पांव सोएंगे कुंज-ए-मज़ार में.
कितना है बदनसीब 'ज़फर' दफ्न के लिए,
दो गज़ ज़मीन भी न मिली कू-ए-यार में.
- बाळासाहेब कदम

अल्लामा फज़ले हक खैराबादी ( 1797 - 1861 )




अल्लामा फज़ले हक खैराबादी ( 1797 - 1861 ) वे प्रथम स्वतंत्रता-संग्राम 1857 की क्रांति के क्रांतिकारी एवं तर्कशास्त्री, उर्दू, अरबी व फारसी के प्रसिद्ध शायर थे।
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हक का जन्म 1797 ई• में उत्तर प्रदेश के ज़िला सीतापुर के खैराबाद में हुआ था। उन्होंने शिक्षा दीक्षा धार्मिक रीति रिवाज़ो से प्राप्त की।
शिक्षा समापन के बाद वह खैराबाद में अध्यापन कार्य करने लगे और फिर 1816 ई• में उन्नीस साल की उम्र में दिल्ली ब्रिटिश सरकार में नौकरी करने लगे।
लेकिन एक ऐसा समय आया जब उन्होंने अंग्रेजों की नौकरी नहीं करने का मन बना लिया और 1831 में सरकारी नौकरी छोड़ दी। नौकरी छोड़ना के बाद वह दिल्ली के मुगल दरबार में कामकाज देखने लगें और शायरों की महफिल से वाबस्ता होने लगे।
1857 के दौर में जब ईस्ट इंडिया कंपनी के ज़ुल्मों की हद हो गई और हिन्दुस्तान के राजा महाराजा तथा नवाबों की रियासतों को हड़पना चाहा तो सभी राजा महाराजाओं तथा नवाबों और मौलवियों द्वारा अंग्रेजों को देश से बाहर निकालने का प्रयास किया गया और ज़बरदस्त विद्रोह की योजना बनाई गई। जिसका नेतृत्व क्रांति के महानायक मुगल सम्राट बहादुर शाह ज़फर द्वारा किया गया और अल्लामा फज़ले हक़ खैराबादी ने उनके साथ मिलकर अहम भूमिका निभाई।
अल्लामा फज़ले हक द्वारा अंग्रेजों के खिलाफ जेहाद का फतवा देकर मुस्लिम समुदाय से अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोह में शामिल होने की अपील की। जिसका लाभ मुगल सम्राट और अन्य विद्रोही नेताओं को मिला।
मौलाना द्वारा फतवा जारी करने के बाद से ही अंग्रेजी प्रशासन द्वारा उनकी तलाश शुरू कर दी गई। क्रांति असफल हो जाने के बाद मौलाना बचते बचाते दिल्ली से खैराबाद तशरीफ ले आये। खैराबाद में अंग्रेजों को भनक लग गई। 30 जनवरी 1859 को उन्हें खैराबाद से गिरफ्तार कर लिया गया।
खैराबाद से उन्हें लखनऊ सेशन कोर्ट लाया गया और वहां उन पर मुकदमा चलाया गया। इस मुकदमें की पैरवी के लिए उन्होंने कोई वकील नियुक्त नहीं किया बल्कि मुकदमे की पैरवी उन्होंने खुद की। मौलाना पर अंग्रेजों के खिलाफ जेहाद का फतवा देने और लोगों को विद्रोह के लिए उकसाने, भड़काने के संगीन आरोप लगाये गये।
मुकदमे की सुनवाई के दौरान उन्होंने अपने जुर्म को कुबूल किया पर झूठ नहीं बोला और कहा -- हॉ वह फतवा सही है, वह मेरा लिखा हुआ था और आज भी मैं इस फतवे पर कायम हूं।
आरोपो को कुबूल करने के बाद उन्हें काले पानी की सज़ा सुनाई गई और सारी ज़ायदाद ज़ब्त करने का आदेश दिया गया। अंडमान-निकोबार ( सेलूलर जेल ) में ही 20 अगस्त 1861 में उनका देहांत हो गया। थे

Khuda Baksh Khan







A Bibliophile, a collector of rare manuscripts; initially established a Private Library in 1880. Which later in the year 1891 opened for public. He acquired 1400 rare manuscripts from his father Mohammad Bakhsh; and later added 2600 to make it one of the rarest collection of Persian, Arabic and Urdu manuscripts in the world. The library was declared an institution of National importance by the Government of India in 1969.
Impressed with his rich collection, at one occasion The British Library offered him very handsome amount to buy his collection. Which he refused by saying that “I am a poor man. The money that has been offered is a Princely fortune. But how can I ever part for money with that to which my father and I have dedicated our lives.”
He later said about book collection; “The art of collection is one that soars above and defies the provisions of the penal code.
There are three classes of blind men- those who are bereft of sight; those who (lend) valuable books even to a friend; and those who return such volumes, once they have passed into their possession”
Below is a real photograph of Khuda Bakhsh Khan
(Founder of Khuda Bakhsh Oriental Public Library - Patna Bihar, India.)


@History of Indian subcontinent

मौलवी अलाउद्दीन हैदर





मौलवी अलाउद्दीन हैदर स्वतंत्रता-संग्राम 1857 के क्रांतिकारी थे।


हैदर का जन्म 1824 ई• में तेलंगाना राज्य के नलगोंडा ज़िले में हुआ था।
उन्होंने इसलामी तौर तरीकों से शिक्षा ग्रहण की।
शिक्षा की समाप्ति के पश्चात वह हैदराबाद की मक्का मस्जिद के इमाम बन गए।
1857 के गदर के दौरान ब्रिटिश प्रशासन द्वारा ज़मीदार चेदा खान को गिरफ्तार कर हैदराबाद रेजीडेंसी भवन में बंद कर दिया गया। जिससे हैदराबाद की जनता उग्र हो गयी।
#तुर्रम_खां एवं मौलवी अलाउद्दीन मिलकर हैदराबाद रेजीडेंसी भवन पर हमला करने की योजना बनाने लगे। जिसको उन्होंने तय समय पर अंजाम दिया गया।
17 जुलाई 1857 को नमाज़ के बाद मौलवी अलाउद्दीन ने अपने दोस्त तुर्रम खां एवं अन्य लोगों के साथ मिलकर हैदराबाद रेजीडेंसी भवन पर धावा बोल दिया।
हमले के जुर्म में मौलवी अलाउद्दीन को गिरफ्तार कर अंडमान निकोबार ( सेलुलर जेल ) काले पानी की सज़ा सुनाई गई।
वह लगभग 30 वर्षों तक सेलुलर जेल में रहे और वही पर उनकी मृत्यु हो गई।
#MuslimFreedomfighterOfIndia,
#MuslimFreedomFightera

The first freedom struggle of India








The first freedom struggle of India, launched in 1857, has essentially become synonymous with figures like Mangal Pandey, Nana Saheb, Tatya Tope, Rani Laxmibai, and Veer Kunwar Singh.
However, being a widespread movement of massive proportions, many of its heroes have been lost in oblivion. One such prominent leader of the 1857 Mutiny was Maulavi Liyaquat Ali, hailing from Allahabad, UP.
During the Revolt, Maulavi Liyaquat Ali led the movement in Allahabad and managed to keep the British forces at bay from June 6, 1857 to June 16, 1857.
Maulavi Liyaquat Ali was an eminent Islamic scholar, and was also highly respected. After being fired from his job, he returned to his village, visiting Delhi, Bhopal, and Tonk and met Sayyid Ahmad Shaheedi who was waging a guerrilla war against British.
This probably pushed the Maulavi towards armed struggle. In his village, he opened a madrasa for children. Meanwhile, he began organising local peasants in their struggle against the persecution of the Company Bahadur and his loyal native rulers, especially in rural areas. Popular with small zamindars, talukdars and common people in Allahabad, Mirzapur and Pratapgarh, he soon emerged as a local hero in Rohilkhand, Awadh and Kanpur.
His influence soon extended to the Panda community, the Pragwal Brahmins, and Muslim majority villages also.
As a result of his efforts, the people of Allahabad were at the forefront in 1857.

Ashfaqulla Khan







Remembering Martyr #AshfaqullaKhan as a legend for the very famous Kakori train robbery. He was a missionary with clear thinking, courage, and patriotism who stood against the British empire in India for India’s struggle for Independence.
Ashfaqulla Khan was inspired by patriotic personality of Pandit Ram Prasad Bismil. In 1924, under the guidance and leadership of Ram Prasad Bismil, Ashfaqulla Khan and his companions decided to establish their separate revolutionary organisation to fight against British rule in India. The Hindustan Republican Association (HRA) was formed in 1924 that focussed on the armed revolutions against the British Raj in India.
Ashfaqulla Khan and Ram Prasad Bismil worked and lived together during the struggle for India’s freedom despite their different religions.
A night before hanging Ashfaqulla Khan recited these lines written by him to Ram Prasad Bismil.

“किये थे काम हमने भी जो कुछ भी हमसे बन पाए,
ये बातें तब की हैं आज़ाद थे और था शबाब अपना;
मगर अब तो जो कुछ भी हैं उम्मीदें बस वो तुमसे हैं,
जबां तुम हो, लबे-बाम आ चुका है आफताब अपना।
जाऊंगा खाली हाथ मगर ये दर्द साथ ही जायेगा,
जाने किस दिन हिन्दोस्तान आज़ाद वतन कहलायेगा? बिस्मिल हिन्दू हैं कहते हैं “फिर आऊंगा, फिर आऊंगा,फिर आकर के ऐ भारत मां तुझको आज़ाद कराऊंगा”।
जी करता है मैं भी कह दूँ पर मजहब से बंध जाता हूँ,
मैं मुसलमान हूं पुनर्जन्म की बात नहीं कर पाता हूं;
हां खुदा अगर मिल गया कहीं अपनी झोली फैला दूंगा,
और जन्नत के बदले उससे एक पुनर्जन्म ही माँगूंगा।”

Such were our legends, great freedom fighters. 
To honour the sacrifices of Shaheed Ashfaqulla Khan in India’s struggle for independence, the government of Uttar Pradesh declared the construction of a 121-acre zoological garden named after Khan in January 2020. The cost of the project was Rs. 234 crores, which was granted by the state government.
M A Jinnah with his close industrialist friend Ram Kishan Dalmia. Jinnah sold his bunglow 10 - Aurangzeb Road New Delhi to him, he got the bunglow washed with ganga jal ! He had 17 children from 6 wives.Dalmia was the name of his his ancestral village in Haryana.

He was the owner of a big textile industry named Sutlej Textile Mills in Okara which he owned till 1965, He used to visit it quite frequently till then. It was nationalized as enemy property during the 1965 war and was unfortunately destroyed within 10-12 years. It was a huge unit that employed around 6000 workers and was a model industry that looked after its employees very generously.




हम आजाद हैं...


भारत में सेवा करने वाले ब्रिटिश अधिकारियों को इंग्लैंड लौटने पर सार्वजनिक पद/जिम्मेदारी नहीं दी जाती थी। तर्क यह था कि उन्होंने एक गुलाम राष्ट्र पर शासन किया है जिस जी वजह से उनके दृष्टिकोण और व्यवहार में फर्क आ गया होगा। अगर उनको यहां ऐसी जिम्मेदारी दी जाए, तो वह आजाद ब्रिटिश नागरिकों के साथ भी उसी तरह से ही व्यवहार करेंगे।
इस बात को समझने के लिए नीचे दिया गया वाक्य जरूर पढ़ें
एक ब्रिटिश महिला जिसका पति ब्रिटिश शासन के दौरान पाकिस्तान और भारत में एक सिविल सेवा अधिकारी था। महिला ने अपने जीवन के कई साल भारत के विभिन्न हिस्सों में बिताए। अपनी वापसी पर उन्होंने अपने संस्मरणों पर आधारित एक सुंदर पुस्तक लिखी।
महिला ने लिखा कि जब मेरे पति एक जिले के डिप्टी कमिश्नर थे तो मेरा बेटा करीब चार साल का था और मेरी बेटी एक साल की थी। डिप्टी कलेक्टर को मिलने वाली कई एकड़ में बनी एक हवेली में रहते थे। सैकड़ों लोग डीसी के घर और परिवार की सेवा में लगे रहते थे। हर दिन पार्टियां होती थीं, जिले के बड़े जमींदार हमें अपने शिकार कार्यक्रमों में आमंत्रित करने में गर्व महसूस करते थे, और हम जिसके पास जाते थे, वह इसे सम्मान मानता था। हमारी शान और शौकत ऐसी थी कि ब्रिटेन में महारानी और शाही परिवार भी मुश्किल से मिलती होगी।
ट्रेन यात्रा के दौरान डिप्टी कमिश्नर के परिवार के लिए नवाबी ठाट से लैस एक आलीशान कंपार्टमेंट आरक्षित किया जाता था। जब हम ट्रेन में चढ़ते तो सफेद कपड़े वाला ड्राइवर दोनों हाथ बांधकर हमारे सामने खड़ा हो जाता। और यात्रा शुरू करने की अनुमति मांगता। अनुमति मिलने के बाद ही ट्रेन चलने लगती।
एक बार जब हम यात्रा के लिए ट्रेन में सवार हुए, तो परंपरा के अनुसार, ड्राइवर आया और अनुमति मांगी। इससे पहले कि मैं कुछ बोल पाती, मेरे बेटे का किसी कारण से मूड खराब था। उसने ड्राइवर को गाड़ी न चलाने को कहा। ड्राइवर ने हुक्म बजा लाते हुए हुए कहा, जो हुक्म छोटे सरकार। कुछ देर बाद स्टेशन मास्टर समेत पूरा स्टाफ इकट्ठा हो गया और मेरे चार साल के बेटे से भीख मांगने लगा, लेकिन उसने ट्रेन को चलाने से मना कर दिया. आखिरकार, बड़ी मुश्किल से, मैंने अपने बेटे को कई चॉकलेट के वादे पर ट्रेन चलाने के लिए राजी किया, और यात्रा शुरू हुई।
कुछ महीने बाद, वह महिला अपने दोस्तों और रिश्तेदारों से मिलने यूके लौट आई। वह जहाज से लंदन पहुंचे, उनकी रिहाइश वेल्स में एक काउंटी मेथी जिसके लिए उन्हें ट्रेन से यात्रा करनी थी। वह महिला स्टेशन पर एक बेंच पर अपनी बेटी और बेटे को बैठाकर टिकट लेने चली गई।लंबी कतार के कारण बहुत देर हो चुकी थी, जिससे उस महिला का बेटा बहुत परेशान हो गया था। जब वह ट्रेन में चढ़े तो आलीशान कंपाउंड की जगह फर्स्ट क्लास की सीटें देखकर उस बच्चे को फिर गुस्सा आ गया। ट्रेन ने समय पर यात्रा शुरू की तो वह बच्चा लगातार चीखने-चिल्लाने लगा। "वह ज़ोर से कह रहा था, यह कैसा उल्लू का पट्ठा ड्राइवर है है। उसने हमारी अनुमति के बिना ट्रेन चलाना शुरू कर दी है। मैं पापा को बोल कर इसे जूते लगवा लूंगा।" महिला को बच्चे को यह समझाना मुश्किल हो रहा था कि "यह उसके पिता का जिला नहीं है, यह एक स्वतंत्र देश है। यहां डिप्टी कमिश्नर जैसा तीसरे दर्जे का सरकारी अफसर तो क्या प्रधान मंत्री और राजा को भी यह अख्तियार नहीं है कि वह लोगों को उनके अहंकार को संतुष्ट करने के लिए अपमानित कर सके
आज यह स्पष्ट है कि हमने अंग्रेजों को खदेड़ दिया है। लेकिन हमने गुलामी को अभी तक देश बदर नहीं किया। आज भी कई डिप्टी कमिश्नर, एसपी, मंत्री, सलाहकार और राजनेता अपने अहंकार को संतुष्ट करने के लिए आम लोगों को घंटों सड़कों पर परेशान करते हैं। इस गुलामी से छुटकारा पाने का एक ही तरीका है कि सभी पूर्वाग्रहों और विश्वासों को एक तरफ रख दिया जाए और सभी प्रोटोकॉल लेने वालों का विरोध किया जाए।
नहीं तो 15 अगस्त को झंडा फहराकर और मोमबत्तियां जलाकर लोग खुद को धोखा देते हैं के हम आजाद हैं...
प्रोटोकॉल को ना कहें।