Saturday, April 30, 2022

गावातल हरवलेले अंगण(खळा)





मी शोधतेय हरवलेले अंगण
मला वाटतं शोधत असाल तुम्ही पण !
कुणी शोधून देईल का विचारलंही
जर नसेल तर कसे शोधणार आपण !
आधी कसं मोठं अंगण होत घरासमोर
शेणानं सावरलेलं छान दिसत असे दिवसभर
स्वागत करीत असे ते येणा-या जाणा-यांचे
तेच अंगण होते प्रतिक आमच्या श्रीमंतीचे !
आता कुठं हरवले हो हे अंगण
सावरायचं ही विसरले सारे जण
अंगणासाठी आम्ही जागा कुठं सोडली
एक एक इंच जागा घरासाठी व्यापली !
आली आता शहरात फ्लॅट संस्कृती
अंगण गेलं म्हणून आली असेल विकृती
चार इंच जागेत काढतात खोटी रांगोळी
गावाच्या अंगणात काढत होतो किती मोठी !
आता शोध करू नका अंगणाचा
शोध करू नका हरवलेल्या मनाचा
अंगण होते तोपर्यंत होता आनंद दारात
सावरलेल्या अंगणातुन तो येत असे घरात !






आदिवासी




मैं धरती का पहला इंसान,
मैं किसी ॠषि की अवैध संतान नहीं हूँ!!
मुझे रामायण महाभारत की बोघकथाओं से कोई ताल्लुक नहीं।
मैं ही भारतभूमि का पहला पूर्वज हूँ!!
ना में आस्तिक हूँ,
ना में नास्तिक हूँ,
मैं वास्तविक हूँ!!
ना मैं गंवार हूं,
ना मैं अनपढ़ हूँ,
मैं आदिवासी हूं!!
प्रकृति की भाषा समझने वाला,
प्रकृति के नियम समझने वाला,
मैं अकेला इंसानी समूह हूँ!!
ना ही धर्म परिवर्तन के डर से पहाड़ों में छिपा हुआ हूं,
ना राज के डर से जंगल की शरण लिए हूं,
निस्वार्थ अपने दम पर आज़ादी बरकरार रख पाया हूँ,
ना मैंने मुगल _अंग्रेजों की चमचागिरी_गुलामगीरी की थी,
ना बहन बेटियों के उपहार देकर संरक्षण पाने का इतिहास हैं,
अरावली _विंध्याचल _सातपुड़ा से जंगल महल तक की पहाड़ियों पर मेरे पूर्वजों के निशान जिंदा हैं!!
मैं जन्म से ही स्वतंत्र रहने वाला इंसान हूँ,
मैं आदिवासी हूँ!!
ना मैं ब्राह्मण (पुजारी)
ना मैं क्षत्रिय (रक्षा)
ना मैं वैश्य (व्यवसाय)
ना मैं शूद्र (सेवक)
मैं एकमात्र ही चारों गुण रखने वाला आदिवासी हूँ,
मैं आदिवासी हूँ!!
ना मैं ईसाई हूँ,
ना मैं हिन्दू हूं,
ना मैं मुस्लिम हूं,
मैं प्रकृति मूलक आदिवासी हूं!!
ना मैं पाप-पुण्य, भाग्य_पुनर्जन्म का विश्वासी हूं,
ना पाखंड, कर्मकांड, अंधविश्वास का प्रचारक हूं,
ना मैं स्वर्ग-नर्क का अभिलाषी हूं,
मैं तो प्रकृति पुत्र हूँ,
मैं आदिवासी हूँ!


गोंडी संस्कृति संरक्षण संघ

Thursday, April 28, 2022



बिहार मे सबसे पहले क्रांति की शुरुवात 12 जून 1857 को होती है, जब देवघर ज़िले के रोहिणी नामक जगह पर अमानत अली, सलामत अली और शेख़ हारून बग़ावत कर अंग्रेज़ अफ़सर को मार देते हैं और इस जुर्म के लिए इन्हे 16 जून 1857 को आम के पेड़ पर लटकाकर फांसी दे दी जाती है. और इस तरह बिहार मे क्रांति की शुरुआत होती है… न दबाया ज़ेर ए ज़मीं उन्हें

न दिया किसी ने कफ़न उन्हें
न हुआ नसीब वतन उन्हें
न कहीं निशाने मज़ार है।



29 जून 2019 को देवघर जाना हुआ; मक़सद यही था के इन शहीदों के निशानात ढूंडा जाए; जानकारी इकट्ठी करने के बाद एक चीज़ जान कर अच्छा लगा के इन शहीदों को शहर ने याद रखा है, तीनो शहीदों की याद में शहर के बीच में एक स्मारक है! साथ ही रोहिणी में भी एक शहीद स्मारक है, और जेसीडिह - देवघर रोड पर एक द्वार इन शहीदों के नाम पर है!

Tuesday, April 26, 2022

मलिक अंबर


 अहमदनगरच्या निजामाचे प्रधानपद आणि लष्करप्रमुख असणाऱ्या मलिक अंबरने चिकलठाणा येथे झालेल्या लढाईत मुघलांचा पराभव केला.

त्यावेळेस मलिक अंबराला ही जागा अत्यंत आवडली. त्याने इथल्या खडकी गावाचा विकास करायचा ठरवलं आणि आजच्या औरंगाबाद शहराचा पहिला व्यवस्थित पाया घातला गेला. मलिक अंबराने शहरात रस्ते, पूल आणि कालव्याद्वारे (नहर) पाणीयोजना सुरू केली. त्याने नौखंडासारखे राजवाडेही बांधले. पोर्तुगीजांसाठी (त्याचा जंजिऱ्यांमुळे पोर्तुगीजांशी संबंध होता) चर्चही बांधले.

या खडकी शहरावर जहांगिर बादशहाने 1616 साली हल्ला केला आणि पुढची 20 वर्षे खडकी उभं राहाणार नाही अशी तजविज केली.

पण मलिक अंबराने 1621 साली पुन्हा खडकी उभं केलं. त्यानंतर खडकीवर पुन्हा हल्ला झाला मलिक अंबराने पुन्हा खडकी दुरुस्त केलं. पण 1626 साली मलिक अंबराचा मृत्यू झाला.

Tuesday, April 19, 2022

Fatima Al Fihri





or Fatima bint Muhammad Al-Fihriya Al-Qurashiya was an Arab woman who is credited with founding the oldest existing, continually operating, and first degree-awarding university in the world, The University of Al-Qarawiyyin at Fez in Morocco. She is also known as "Ummul Banīn".
Fatima used the money she inherited from her father to purchase a mosque that was built around 845 AD under the supervision of King Yahya ibn Muhammad. She then rebuilt it and bought the surrounding land, doubling its size. the construction project was supervised by Fatima herself. Established in the year 859, the University of al-Qarawiyyin was the first degree-granting educational institute in the world (as recognized by UNESCO and Guinness World Records). Students from all over the world traveled to study a wide range of subjects, ranging from natural sciences to languages to astronomy, and Fatima herself studied there too. it was considered one of the greatest centers of education at that time.




Wednesday, April 6, 2022

Arabic language







हमारा ज़ाती तजुर्बा है कि अरबी ज़बान सीखने से इल्म में बरकत होती है.
इसकी सब से बड़ी वजह ये है कि क़ुरआन ए करीम अरबी में है और फिर मुस्लिम स्काॅलर्स ने क़ुरआन की तफ़्सीर हर नुक़्ता ए नज़र मसलन साइंस, लॉजिक, फलसफा वगैरा से की. इन तफ़सीरों से जहां क़ुरआन के समझने समझाने में आसानी हुई वहीं अरबी ज़बान का दामन वसी से वसी-तर होता गया और दुनिया ज़माने के उलूम अरबी ज़बान में दाखिल होकर इकट्ठे हो गए इसलिए पढ़ने की जगह को अरबी में kulliyah कहते थे. इंग्लिश का कॉलेज अरबी के kulliyah से बना है क्यूंकि यहां कुल यानी तमाम उलूम जमा हो जाते हैं.
दूसरी वजह अरबी की ग्रामर है. अरबी की ग्रामर बहुत ज़्यादा फैली हुई है. इतनी बारीक ग्रामर शायद ही दुनिया की किसी ज़बान की हो. ग्रामर के दो हिस्से हैं पहला सर्फ और दूसरा नह्व. सर्फ में लफ्ज़ के बनाने के बारे में पढ़ाया जाता है जबकि नह्व में जुमले. क्यूंकि ज़बान सीखना बारीक इल्म में से आता है इसलिए बच्चे का ज़हन तेज़ होता जाता है.
इसीलिए अपने बच्चों को अरबी ज़रूर पढ़ाएं ताकि वो इल्म और दीन की खिदमत कर सकें और सब से बड़ी बात बा क़ौल अल्लामा इकबाल कि अरबी हमारे आक़ा ओ मौला सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की ज़बान है.

Monday, April 4, 2022


 

Ashfaqulla Khan







Remembering Martyr #AshfaqullaKhan as a legend for the very famous Kakori train robbery. He was a missionary with clear thinking, courage, and patriotism who stood against the British empire in India for India’s struggle for Independence.
Ashfaqulla Khan was inspired by patriotic personality of Pandit Ram Prasad Bismil. In 1924, under the guidance and leadership of Ram Prasad Bismil, Ashfaqulla Khan and his companions decided to establish their separate revolutionary organisation to fight against British rule in India. The Hindustan Republican Association (HRA) was formed in 1924 that focussed on the armed revolutions against the British Raj in India.
Ashfaqulla Khan and Ram Prasad Bismil worked and lived together during the struggle for India’s freedom despite their different religions.
A night before hanging Ashfaqulla Khan recited these lines written by him to Ram Prasad Bismil.

“किये थे काम हमने भी जो कुछ भी हमसे बन पाए,
ये बातें तब की हैं आज़ाद थे और था शबाब अपना;
मगर अब तो जो कुछ भी हैं उम्मीदें बस वो तुमसे हैं,
जबां तुम हो, लबे-बाम आ चुका है आफताब अपना।
जाऊंगा खाली हाथ मगर ये दर्द साथ ही जायेगा,
जाने किस दिन हिन्दोस्तान आज़ाद वतन कहलायेगा? बिस्मिल हिन्दू हैं कहते हैं “फिर आऊंगा, फिर आऊंगा,फिर आकर के ऐ भारत मां तुझको आज़ाद कराऊंगा”।
जी करता है मैं भी कह दूँ पर मजहब से बंध जाता हूँ,
मैं मुसलमान हूं पुनर्जन्म की बात नहीं कर पाता हूं;
हां खुदा अगर मिल गया कहीं अपनी झोली फैला दूंगा,
और जन्नत के बदले उससे एक पुनर्जन्म ही माँगूंगा।”

Such were our legends, great freedom fighters. 
To honour the sacrifices of Shaheed Ashfaqulla Khan in India’s struggle for independence, the government of Uttar Pradesh declared the construction of a 121-acre zoological garden named after Khan in January 2020. The cost of the project was Rs. 234 crores, which was granted by the state government.