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जलियांवाला बाग



जलियांवाला बाग का वही संकरा प्रवेश द्वार, जहाँ से 13 अप्रैल 1919 को जनरल डायर अपने सैनिकों के साथ अंदर गया था। उस दिन बैसाखी के अवसर पर हज़ारों निहत्थे लोग एक शांतिपूर्ण सभा के लिए यहाँ एकत्र हुए थे। बिना किसी चेतावनी के जनरल डायर ने सैनिकों को भीड़ पर गोलियाँ चलाने का आदेश दे दिया। लोग जान बचाने के लिए इधर-उधर भागे, लेकिन संकरे रास्ते और ऊँची दीवारों के कारण बाहर नहीं निकल सके। कई लोग अपनी जान बचाने के लिए शहीदी कुएँ में कूद गए।
यह घटना भारत के स्वतंत्रता संग्राम के सबसे दर्दनाक और निर्णायक अध्यायों में से एक मानी जाती है। आज भी यह प्रवेश द्वार उस अमानवीय नरसंहार की मूक गवाही देता है।



लखनऊ में आज से शुरू हुई थी एक लंबी घेराबंदी ।



 लखनऊ की रेज़ीडेंसी बहुत लंबे वक़्त के लिए घिरने जा रही थी,इसका अंदाज़ किसी को नही था । अंग्रेज़ो के ख़िलाफ़ 1857 का बिगुल बज चुका था । उठना अब लखनऊ को था,तो वह 30 मई थी,जब लखनऊ में छावनियों में हमारे सिपाहियों ने बग़ावत का बिगुल बजा दिया । चौलक्खी कोठी और तारावली कोठी से लगाम कसने लगी । हुक्म जारी होने लगे कि इन बिरतानियों को लखनऊ से बाहर करो । सिपाही और अवाम जोश में बढ़ चली ।
एक जद्दोजहद शुरू हुई । बिरतानियों ने कभी नही सोचा था कि कोई उनके यूनियन जैक को भी ज़मींदोज़ करेगा । लखनऊ में बेगम हज़रत महल के नेतृत्व में बिरतानियों का परचम जो रेज़ीडेंसी पर लहरा रहा था,पत्थर मार मार कर ज़मीन पर गिरा दिया गया । लखनऊ में हर तरफ बेगम और मौलवी अहमदुल्ला शाह के सिपाहियों ने कब्ज़े शुरू कर दिये ।
अंग्रेज़ रेज़ीडेंसी में क़ैद हो गए । इस भयंकर गर्म दिनों में हमारे पुरखे सीमित संसाधनों से कम्पनी के लोगों से भिड़ गए । दुनिया ने देखा कि नवाबों ने जिस शहर को पलकों पर बैठाया था,वह आतिश बनकर बिरतानियों पर बरस पड़ा । कितने ही बिरतानी फौजी और अफ़सर हलाक़ हो गए । बिरतानी औरते और बच्चे,जिन्हें हमारे बुज़ुर्गों ने मारने से परहेज़ किया,वह रेज़ीडेंसी में क़ैद हो गए ।
1857 में आगे क्या हुआ,उसका अंजाम क्या रहा । ज़ाहिर है गद्दारों से भरे महल,नीव तो कमज़ोर करते ही है । मगर एक बात तो याद रखने वाली है । हमारे बुज़ुर्गों ने बिरतानियों को थाल में सजाकर सत्ता नही दी । बल्कि किसी थाल में उनके सर थे तो किसी में उनका खून,वह लड़े और बहुत शानदार लड़े ।
आज वही 30 मई है । जब लखनऊ ने बिरतानियों की चालों को समझकर उन्हें एक एक करके तोड़ना शुरू किया । लखनऊ की हर इमारत इस बात की गवाह है । लखनऊ का चप्पा चप्पा हमारे बुज़ुर्गों के पांव की निशानदेही करता है । कैसे वह जूझे,लड़े और जीते भी,जी हाँ वह जीते थे,महीनों बिरतानी क़ैद रहे । रेज़ीडेंसी की तबाही इसकी गवाह है ।
आज बेगम हज़रत महल,मौलवी अहमदुल्ला शाह,उदादेवी,नाना साहब,तात्या टोपे,मंगल पांडे और महान बादशाह बहादुर शाह ज़फ़र समेत हमारे हर बुज़ुर्ग को याद करने का दिन है । जिन्होंने गुलामी का तौक़ पहनने से इनकार किया और सर उठाकर लड़ पड़े । हर सिपाही,हर उसको नमन जिसने आज के रोज़ बजने वाले बिगुल में अपने कदम आगे बढ़ाए ।
30 मई लखनऊ में उस तारीख़ की शुरआत है, जिसने बिरतानियों को अंदर तक हिला दिया । छावनियों की बग़ावत ने उनके पांव के नीचे की ज़मीन खींच ली । आजका दिन उन सबको याद करने का दिन है...आज ही से लखनऊ ने 1857 के एक केंद्र बनने की तरफ अपने कदम बढ़ा दिए थे








THE NEW ICON - SAVARKAR AND THE FACTS - ARUN SHOURIE



25 सितंबर 1990 को गुजरात के सोमनाथ से राम मंदिर के समर्थन में निकली आडवाणी की रथयात्रा को 'बौद्धिक ऑक्सीजन' देने वाले अरुण शौरी की नई किताब सावरकर के 'हिंदुत्व' का खौफनाक सच जो सवाल खड़े करता है की क्या बीजेपी का 'हिंदुत्व' भारत को भगवा अफगानिस्तान बनाने की साजिश है?
जिस अरुण शौरी ने 90 के दशक में अपनी धारदार लेखनी से आडवाणी की रथयात्रा को 'बौद्धिक ऑक्सीजन' दी थी, आज वही शौरी उस 'सांप्रदायिक विष-वृक्ष' की जड़ें खोद रहे हैं। उनकी नवीनतम खोजपूर्ण किताब सावरकर के उस कृत्रिम और थोपे गए 'वीरत्व' की धज्जियां उड़ाती है, जिसे संघ परिवार और बीजेपी ने दशकों से झूठ की खाद देकर पाला है। यह किताब केवल एक दस्तावेज नहीं, बल्कि उस वैचारिक अपराध का कबूलनामा है, जिसने भारत की उदारवादी जड़ों में नफरत का तेजाब डाला।
~ सावरकर का हिंदुत्व: शुद्ध रूप से घृणा का दर्शन।
~ अंग्रेजों के लिए 'जी-हुजूरी' करने वाले 'नायक' का पर्दाफाश।
~ हिटलर का महिमामंडन और गांधी से नफरत का खौफनाक चेहरा।
~ बीजेपी के पास अपने नायक नहीं, इसलिए सावरकर का सहारा।
~ भगवा अफगानिस्तान की ओर बढ़ते भारत का अलार्म।
★ अरुण शौरी ने अपनी किताब में सबूतों के साथ यह साबित किया है कि विनायक दामोदर सावरकर का पूरा वजूद ही 'अंग्रेजों की दया' पर टिका था। जिसे 'वीर' कहकर प्रचारित किया जाता है, वह असल में हिटलर की फासिस्ट विचारधारा का परम भक्त था। सावरकर ने न केवल हिटलर की प्रशंसा में कसीदे पढ़े, बल्कि मुंबई में तैनात एक जर्मन एजेंट के जरिए नाजी हुकूमत तक अपनी वफादारी का संदेश भिजवाया ताकि भारत में भी वैसा ही कत्लेआम और तानाशाही तंत्र स्थापित किया जा सके।
“झूठ इतना बोलो कि वो सच के करीब लगने लगे"
★ माफीवीर सावरकर ने गांधीजी के साथ लंदन में रहने और गहरी दोस्ती की जो फर्जी कहानियां गढ़वाईं, शौरी ने उनका पूरी तरह से पोस्टमार्टम कर दिया है। ऐतिहासिक तथ्य गवाह हैं कि सावरकर और गांधी कभी इंग्लैंड में साथ रहे ही नहीं। यह सब केवल गांधी के विराट व्यक्तित्व की छाया में खुद को खड़ा करने की एक घटिया कोशिश थी, जबकि सावरकर ने जीवन भर गांधीजी के लिए अपशब्दों और नफरत का ही इस्तेमाल किया।
★ माफीवीर सावरकर के 'समुद्र में छलांग' वाले जिस किस्से को इतिहास की किताबों में जबरन ठूंसा जा रहा है, वह किसी फिल्मी स्टंट से ज्यादा कुछ नहीं था। शौरी बताते हैं कि जब मालवाहक जहाज किनारे पर लगभग खड़ा था और जमीन की दूरी महज 8-10 फुट थी, तब सावरकर ने बाथरूम के बहाने भागने की एक नाकाम कोशिश की थी। इसे 'महासमुद्र में मीलों तैरने' की शौर्य गाथा बताना इतिहास के साथ किया गया सबसे बड़ा 'इंटेलेक्चुअल फ्रॉड' है।
◆ माफीवीर सावरकर की माफीनामे वाली हकीकत को दबाने के लिए संघियों ने यह झूठ फैलाया कि उन्होंने गांधीजी के कहने पर अंग्रेजों से दया की भीख मांगी थी। शौरी ने इस सफ़ेद झूठ की भी बखिया उधेड़ दी है। सच तो यह है कि जब क्रांतिकारी फांसी के फंदे चूम रहे थे, तब सावरकर अंग्रेजों को अपनी 'सेवाएं' देने के लिए दया याचिकाएं लिख रहे थे।
~ सावरकर का हिंदुत्व एकता नहीं, विभाजन का मंत्र है।
~ घृणा के बिना संगठन नहीं बन सकता ये सावरकर की सोच है।
~ हिंदुइज्म (उदारवाद) बनाम हिंदुत्व (विनाशकारी)।
~ बीजेपी की 'नायक-चोरी' वाली राजनीति बेनकाब।
~ इतिहास के पन्नों से हकीकत का खौफनाक सामना।
★ अरुण शौरी साफ़ चेतावनी देते हैं कि सावरकर का 'हिंदुत्व' भारतीय आत्मा को निगल जाएगा। यह विचारधारा समावेशी भारत को एक 'भगवा अफगानिस्तान' में तब्दील करने की क्षमता रखती है, जहाँ असहमति के लिए कोई जगह नहीं होगी। आरएसएस खुद सावरकर की अविश्वसनीयता से वाकिफ था, इसीलिए गोलवलकर ने उन्हें कभी अपने करीब नहीं फटकने दिया। लेकिन आज सत्ता के भूखे लोगों को गांधी के कद को छोटा करने के लिए सावरकर जैसे विवादास्पद चेहरे की जरूरत पड़ रही है।
◆ "बर्बाद-ए-गुलिस्तां करने को बस एक ही उल्लू काफी था, यहाँ हर शाख पे उल्लू बैठा है..." शौरी की यह किताब उन लोगों की आंखों में मिर्च की तरह लगेगी जो सावरकर को पूजते हैं। अब बीजेपी अपनी आईटी सेल के उन 'भाड़े के टट्टू' और 'दिहाड़ी वाले दलित चिंतकों' को मैदान में उतारेगी जो यह तर्क देंगे कि शौरी ने तो अंबेडकर की भी आलोचना की थी। लेकिन वे सावरकर के इन दस्तावेजी सच का सामना कभी नहीं कर पाएंगे।
★ सावरकर के लिए हिंदुत्व का मतलब सिर्फ और सिर्फ 'अन्य' के प्रति नफरत था। उन्होंने साफ कहा था कि बिना किसी साझा दुश्मन या घृणा के हिंदुओं को एकजुट नहीं किया जा सकता। क्या हम ऐसी जहरीली बुनियाद पर एक आधुनिक राष्ट्र का निर्माण करना चाहते हैं? शौरी की यह किताब हर उस भारतीय को पढ़नी चाहिए जो अपनी आने वाली नस्लों को नफरत की आग से बचाना चाहता है।
~ तथ्यों की मार से तिलमिलाएगी सत्ता।
~ झूठ के गुब्बारे की हवा निकल गई।
~ भारत की आत्मा बनाम सावरकर का फासीवाद।
~ कमेंट में बताएं, क्या सावरकर वाकई 'वीर' थे?
"The truth is like a lion; you don’t have to defend it. Let it loose; it will defend itself."
शौरी ने सच का शेर खुला छोड़ दिया है अब देखते हैं कितने 'शूरवीर' इसके सामने टिक पाते हैं।
इस पोस्ट को इतना शेयर करें कि झूठ की दीवारें ढह जाएं। आपके हिसाब से भारत का असली नायक कौन है, सत्य के साथ खड़ा गांधी या माफीनामों वाला सावरकर? अपनी राय नीचे जरूर लिखें। 

अस्वीकरण: उपरोक्त पोस्ट अरुण शौरी की पुस्तक में वर्णित शोध, ऐतिहासिक संदर्भों और सार्वजनिक विमर्श पर आधारित है। इसका उद्देश्य किसी की भावनाओं को आहत करना नहीं बल्कि ऐतिहासिक तथ्यों पर चर्चा करना है। पाठक स्वयं तथ्यों और दस्तावेजों की पड़ताल करने के लिए स्वतंत्र हैं।



Jawaharlal Nehru Barrister-at-law, London, 1912



After studying at Harrow and completing a degree in Natural Sciences at Trinity College, Cambridge, Nehru undertook his legal training in London, following the path of his father, Motilal Nehru, one of India’s leading lawyers. In 1912, he was formally called to the Bar, marking his official entry into the legal profession.
However, soon after returning to India, Nehru found little interest in practising law. Instead, from 1912 onward, he gradually immersed himself in the Indian national movement— a commitment that would shape his entire life and eventually lead him to become the first Prime Minister of independent India.




महात्मा गांधी ने खिलाफत आंदोलन



महात्मा गांधी ने खिलाफत आंदोलनाला पाठिंबा दिला होता आंदोलनात सहभागी झालेले डॉ.केशव बळीराम हेडगेवार यांनी भडकाऊ भाषण केल्याप्रकरणी एक वर्षाची शिक्षा झाली होती
मुहम्मद पैगंबराच्या मृत्यूनंतर जगातील सर्व मुस्लिम धर्माचा खलिफा असल्याचे मानले जाते. खिलाफत ही धार्मिक राजकीय इस्लामिक संज्ञा आहे. पहिल्या महायुद्धानंतर तुर्कस्तानचे सुलतान खलिफा वर ब्रिटिशांनी लादलेल्या अटीविरुद्ध भारतीय मुसलमानाने ही चळवळ सुरू केली या चळवळीने महात्मा गांधीजींच्या असहकार चळवळीला पाठिंबा दिला.
काँग्रेस पक्षाचे मध्य प्रदेश प्रायव्हसीचे प्रदेश सचिव डॉ. केशव बळीराम हेडगेवार 1921 ते 1922 खिलाफत चळवळीच्या बाजूने ब्रिटिशाविरुद्ध आंदोलन करीत असताना हेडगेवार यांनी अत्यंत भडकाऊ भाषण केल्याप्रकरणी ब्रिटिश सरकारने राजद्रोहाच्या आरोपाखाली एक वर्षासाठी तुरुंगात टाकले.
संघ शाखेवर मुस्लिम द्वेषाचे पाठांतर करून घेतल्या जाते. त्यामुळे डॉ.हेडगेवारानी स्वातंत्र्यपूर्व काळातील महात्मा गांधींनी पुकारलेल्या खिलाफत चळवळीमध्ये भाग घेतला होता हे संघ स्वयंसेवक सांगू शकत नाहीत.
ब्रिटिश तुरुंगातील कैद्यांना भूक आजार कठोर परिश्रमामुळे कमकुवत झालेले असत .जेलमध्ये असलेले निकृष्ट दर्जाचे अन्न कोंदट वातावरणामुळे तुरुंगातील कायद्यांना टी.बी. सारख्या आजार जडले जात असत. तुरुंगातील हालअपेष्टामुळे भारतीय कैदी तुरुंगातून बाहेर पडल्यावर त्याची तब्येत ही कमजोर आणि एखाद्या आजाराने जडलेली असायची.
ब्रिटिश जेलर सर जाठर हा अत्यंत कठोर आणि उग्र स्वभावाचा म्हणून ओळखला जात होता .हेडगेवार यांनी त्यांच्याशी सौहार्दपुर्ण संबंध निर्माण केले. इतर कायद्याचे जेलमधील हाल अपेष्टामुळे वजन कमी झालेले असायचे मात्र हेडगेवार यांची वजन 11 किलोने वाढलेले होते.
1925 ला डॉक्टर केशव बळीराम हेडगेवार यांनी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघाची स्थापना केली
हेडगेवार यांनी आपल्या संघ कार्यकर्त्याला स्वातंत्र्य आंदोलनापासून दूर राहण्यास सांगितले स्वतः मात्र सहभागी झाले ते आरएसएस चे प्रमुख म्हणून नाही तर प्रमुख पद दुसऱ्याला देऊन केवळ हेडगेवार म्हणून आंदोलनात भाग घेऊन जेलमध्ये गेले.
हेडगेवार यांचा दुसऱ्यांदा जेलमध्ये जाण्याचा उद्देश हा होता की काँग्रेसचे कार्यकर्ते हे आपल्या आरएसएस मध्ये सहभागी करून घेण्याचा त्यांचा उद्देश होता. एकही काँग्रेस कार्यकर्ता हेडगेवार यांच्या नादाला लागला नाही.
दोन ऑक्टोबर 2025 रोजी आर एस एस ला 100 वर्षे झाले पंतप्रधान मोदी आणि मुख्यमंत्री फडणवीस यांनी आरएसएस आणि हेडगेवार वर लेख लिहिले कुणाच्याही लेखांमध्ये हेडगेवार यांनी खिलाफत चळवळीत भाग घेतला हे लिहू शकले नाही.
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघाचा मुख्य गाभा हा इतर धर्मियांचा द्वेष करणे हा आहे. मुस्लिम द्वेषातून आर एस एस भाजप सत्य पर्यंत पोहोचलेले आहेत .त्यामुळे त्यांचा खरा इतिहास ते कधीही स्वतःहून सांगणार नाहीत.
जय हिंद जय भारत जय संविधान जय काँग्रेस .
हरिभाऊ सोळंके.
सादोळा ता माजलगाव जि बीड