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अंग्रेजो को भगाने गांधीजी की क्या रणनीति थी ?




उदाहरण से समझे ।




एक विदेशी कंपनी है , उस में काम करनेवाले अधिकतर सारे कर्मचारी भारतीय है । उस कंपनी का सारा का सारा हुक्का पानी कंपनी के माल की बिक्री पर निर्भर रहता है । उस कंपनी में काम करनेवाले सारे भारतीय उस विदेशी कंपनी के सच्चे वफादार रहकर तनतोड मेहनत करके उस कंपनी को फायदा पहुंचाते है । अब कोई भारतीय मूल का समझदार आदमी उस झुलमी , तानाशाह , लोगो का खून चुसने वाली विदेशी कंपनी को भारत से भगाने की ठानता है , वो सबसे पहले स्वयं उस विदेशी कंपनी का माल नही खरीद के कंपनी का बहिष्कार करता है । यही बात वो सभी भारतीयों को समझाता है । धीरे धीरे वो कंपनी में काम कर रहे भारतीय कर्मचारीयो को कंपनी की नौकरी छोडने की सलाह देता है । यदि सब रणनीति के अनुसार हुआ तो कंपनी का हुक्का पानी बंद , तो कंपनी भी बंद ।

किंतु 34 करोड की जनसंख्या को समझाना इतना सरल नही होता ।




गांधीजी की इतनी सीधी सीधी बात भी हमारे कुछ भारतीय नही समझ सके ।




अंग्रेज हमारे देश में आए थे व्यापारी बनकर , हमारे ही राजा महाराजाओ से लोन लेकर हमारे ही भारतीयो को कर्मचारी बनाकर हमे गुलाम बनाया ।




गांधीजी की स्पष्ट रणनीति थी , अंग्रेजी वस्तुओ का बहिष्कार करे , स्वदेशी वस्तुओ का स्वीकार करे, सभी भारतीय अंग्रेजो की नौकरीया छोडे.....




इस मे से कुछ लोग गांधीजी की बात मान रहे थे कुछ लोग नही मान रहे थे । किसी को गांधीजी से अहम का टकराव था तो कुछ लोग ज़िन्दगी भर अंग्रेजो के वफादार बने रहना चाहते थे . . . . .




गांधीजी अपने विचार लोगो तक पहुंचाने लोगो को समझाने , मनाने समय लेते थे , जबकि हमारे क्रांतिकारी झटके में परिणाम चाहते थे ।




केवल 50 हजार अंग्रेज पूरे भारत पर राजाओ की तरह राज करते थे ।

सोचिए ऐसा क्यों

अंग्रेजो की इस कूटनीति से तो हिटलर भी हैरान था । क्योंकि हमारे राजाओ को भारतीय जनता की परवाह नही थी, वे अंग्रेजो के साथ मिलकर बेजुबान जानवरो का शिकार करने का मज़ा लेते थे , अय्याशी करते थे । हमारे ही भारतीय अंग्रेज सरकार में बडी मात्रा में नौकरीया करते थे , हमारे स्वतंत्रता सेनानीयो को मौत के घाट उतार देते थे ।




बदले में अगर हमने भी हथियार उठा लिया होता तो हमे ही हमारे भारतीय मूल के अंग्रेजी सिपाईयो को मारना पडता । हमारा सामना करने के लिए अंग्रेज दूसरे देशो से सिपाई बुलवाकर हम लोगो का खून बहाते । वैसे भी उस वक्त अंग्रेजो का भारत की तरह बहुत सारे देशो पर कब्जा था । ये क्रांति हमे कितनी सफलता दिलवाती ?




वैसे भी नेताजी सुभाषचंद्र बोस ने अंग्रेजो के खिलाफ जापान और हिटलर से सहायता तो ली थी , आखिर में नतिजा क्या आया ? अंग्रेजोने अपने सहयोगी देश की मदद से जापान और जर्मनी को दूसरे विश्व युद्ध में हराया और नेताजी के 30 हजार से भी ज्यादा सिपाईयो को बंदी बना दिया , फिर उन सिपाईयो का केस पंडित नेहरूजी ने लडा ।




रक्तरंजित क्रांति के लिए बहुत थोड़े से लोग तैयार होते थे , हथियारो का जुगाड करने बहुत सी अनीति अपनानी पडती थी ।

दूसरी ओर स्वदेशी चरखा चलाकर अंग्रेजी राज को खूल्ली चुनौती दी जाती थी , चरखे के कारण ब्रिटन के लंकाशायर और मैनचेस्टर शहर की कपडा मिलो में ताले लग गए थे ।

( दुःख की बात तो यह है की आज वही स्वदेशी के प्रतीक चरखे का मज़ाक उडाया जाता है ! ! )




क्रांतिकारीयो को कुचलने के लिए अंग्रेजो के पास गोलाबारुद था , फांसी के फंदे थे , मगर गांधी की आंखो में आंखे डालकर बात करे वैसा सत्यवादी नही था . . . .




यदि रक्तरंजित से ही आजादी मिलनी होती तो वैसी आजादी हमे 1857 में ही मिल जाती . . . . . .

1857 में जितना जान - माल का नुकसान हमने अंग्रेजो का किया था उतना नुकसान तो अंग्रेजो को कभी नही हुआ।




1857 में क्या हिंदू , क्या मुसलमान , क्या सिख ? सभी मिलकर टूट पडे थे अंग्रेजो पर . . . .




1857 में जितने हथियार अंग्रेजो के पास थे उनसे कही ज्यादा हथियार हमारे राजा महाराजाओ के पास थे ।




फिर भी अंग्रेज भारत छोड़कर नही गए । वैसे भी 1857 का वो विद्रोह देशस्वातंत्रता हेतु नही बल्कि हिंदु मुसलमानो का अंग्रेजो द्वारा गाय और सुअर की चरबी चखवाकर धर्मभ्रष्ट के विरुद्ध किया गया विद्रोह था ।

अंग्रेज राजाओ के साम्राज्य हडप कर रहे थे , राजा अपने साम्राज्य को बचाने 1857 के सैनिक विद्रोह में शामिल हुए ।




19 वी सदी आते-आते हमारे ज्यादातर राजा अंग्रेजो के साथ मिल गए , सारे हथियार हमारे स्वातंत्रता सेनानी के खून से रंगने लगे । 1935 आते आते अंग्रेज भारत में हिंदू - मुस्लिम - सिख - दलित के बीच जमकर आग लगा चुके थे । ऐसी नफरत की आंधी में सबको शांति का पाठ पढाना मतलब अपनी जान गवाहना . . . . .




गांधीजी कोई एक जाती एक वर्ग के नेता नही थे । वे सबके हित के बारे में सोचते थे ।




देश की आजादी में बहुत सारा बलिदान है , उन बलिदानो को शत् शत् नमन भी करते हैं ।

आजादी हिंसा से तो कतेह नही आई । ब्रिटन दोनों विश्व युद्ध विजेता देश था , भारत की हिंसात्मक बगावत कुचलना उनके बांये हाथ का खेल था । किंतु गांधीजी ने कभी ये नही कहा की आजादी मैंने दीलवाई । वे तो देश आजाद होने के बाद भी बुड्ढापे में लोगो के बीच नफरत की आग बुझाने का काम करते रहे ।




भगतसिंह , चंद्रशेखर आजाद , नेताजी सुभाषचंद्र बोस के विचार भले ही अहिंसा से अलग थे किंतु वे लोगो में देशभक्ति की भावना गांधीजी के कारण जागी । वे लोगो ने अपने प्राणो की आहुति दी मगर गांधी के विरुद्ध एक शब्द नही कहा ।




दूसरी ओर आजकल का नौजवान देश के लिए अपने नाखून कटवाने जीतना भी बलिदान नही देता वो आज गांधी जैसे महात्मा को गालीया देता रहता है ।
देश का दुर्भाग्य . . . . .

सामाजिक विद्वता, महात्मा गांधी.

 



जिम्मेदारी का पद संभालने के लिए जितनी आवश्यकता अंग्रेजी भाषा के ज्ञान की अथवा दूसरी बड़ी विद्वता की होती है, उससे कहीं अधिक आवश्यकता सच्चाई, शांति, सहनशीलता, दृढ़ता, समय सूचकता, साहस और व्यवहारिक बुद्धि की होती है। जिस मनुष्य में इन सुंदर गुणों का अभाव हो उसमें उत्तम कोटि की विद्वता हो तो भी सामाजिक कार्य में उसका कोई मूल्य नहीं है ।




इलाहाबाद से प्रतापगढ़ जाने वाली कैमल कार्ट ये डबल डेकर है। हिन्दोस्तान में इस तरह की सवारी 18वी सेंचुरी के आखिर तक लंबे सफर के लिए इस्तेमाल की जाती थी।
#mughal_saltanat