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Ashfaqulla Khan







Remembering Martyr #AshfaqullaKhan as a legend for the very famous Kakori train robbery. He was a missionary with clear thinking, courage, and patriotism who stood against the British empire in India for India’s struggle for Independence.
Ashfaqulla Khan was inspired by patriotic personality of Pandit Ram Prasad Bismil. In 1924, under the guidance and leadership of Ram Prasad Bismil, Ashfaqulla Khan and his companions decided to establish their separate revolutionary organisation to fight against British rule in India. The Hindustan Republican Association (HRA) was formed in 1924 that focussed on the armed revolutions against the British Raj in India.
Ashfaqulla Khan and Ram Prasad Bismil worked and lived together during the struggle for India’s freedom despite their different religions.
A night before hanging Ashfaqulla Khan recited these lines written by him to Ram Prasad Bismil.

“किये थे काम हमने भी जो कुछ भी हमसे बन पाए,
ये बातें तब की हैं आज़ाद थे और था शबाब अपना;
मगर अब तो जो कुछ भी हैं उम्मीदें बस वो तुमसे हैं,
जबां तुम हो, लबे-बाम आ चुका है आफताब अपना।
जाऊंगा खाली हाथ मगर ये दर्द साथ ही जायेगा,
जाने किस दिन हिन्दोस्तान आज़ाद वतन कहलायेगा? बिस्मिल हिन्दू हैं कहते हैं “फिर आऊंगा, फिर आऊंगा,फिर आकर के ऐ भारत मां तुझको आज़ाद कराऊंगा”।
जी करता है मैं भी कह दूँ पर मजहब से बंध जाता हूँ,
मैं मुसलमान हूं पुनर्जन्म की बात नहीं कर पाता हूं;
हां खुदा अगर मिल गया कहीं अपनी झोली फैला दूंगा,
और जन्नत के बदले उससे एक पुनर्जन्म ही माँगूंगा।”

Such were our legends, great freedom fighters. 
To honour the sacrifices of Shaheed Ashfaqulla Khan in India’s struggle for independence, the government of Uttar Pradesh declared the construction of a 121-acre zoological garden named after Khan in January 2020. The cost of the project was Rs. 234 crores, which was granted by the state government.

बरसों बरस सजेंगे शहीदों के मजारों पे मेले...


 
बरसों बरस सजेंगे शहीदों के मजारों पे मेले...


जंगे आज़ादी के शहीद अशफ़ाक़ उल्लाह खान और पंडित रामप्रसाद बिस्मिल का आज बलिदान दिवस है, आज से 93 साल पहले महज़ सत्ताईस साल की उम्र में अंग्रेजों ने 19 दिसम्बर 1927 को अशफ़ाक़ उल्लाह खान और उनके गहरे दोस्त और क्रांतिकारी रामप्रसाद बिस्मिल को फांसी पर चढ़ा दिया था
22 अक्टूबर 1900 को शाहजहांपुर में (वर्तमान उत्तर प्रदेश में) जन्मे अशफ़ाक़ ने वतन को आज़ाद कराने के लिए काफी संघर्ष किया था, महान क्रांतिकारी राम प्रसाद बिस्मिल से उनकी गहरी दोस्ती थी, शायद दोनों में शायरी के एक से शौक़ ने दोनों की दोस्ती को मज़बूत बना दिया था, रामप्रसाद का तखल्लुस "बिस्मिल" था वहीँ अशफाक का "हसरत".
"सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है" जैसा दिलों में वलवला भर देने वाला तराना लिखने वाले बिस्मिल और उनके साथियों के दिलों में आज़ादी की जंग के लिए क्या ही वलवला रहा होगा, हम बस अंदाज़ा लगा सकते हैं.....
.... 9 अगस्त 1925 को अंग्रेज़ों के खिलाफ लड़ने के लिए हथियारों का इंतजाम करने के लिए अशफाक उल्ला खान और पंडित राम प्रसाद बिस्मिल के नेतृत्व में आठ अन्य क्रांतिकारियों ने लखनऊ के पास "काकोरी" नाम की जगह पर ट्रेन लूटी थी... इसे इतिहास में काकोरी कांड के नाम से याद किया जाता है... इसके बाद फिरंगी सरकार बुरी तरह इन लोगों के पीछे पड़ गई थी और आखिरकार 26 सितम्बर 1925 सितंबर को बिस्मिल और अशफाक को ब्रिटिश पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया था..... दोनों को अलग अलग जेलों मैं एक ही दिन यानी 19 दिसम्बर 1927 को फांसी दे दी गई.....
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"शहीदों की मज़ारों पर लगेंगे हर बरस मेले
वतन पर मरने वालों का यही बाक़ी निशाँ होगा"
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..... ये शेर जंगे आज़ादी के शहीद अशफ़ाक़ उल्लाह ख़ान ने लिखा था,
..... फेसबुक दोस्त मुहम्मद उमर अशरफ़ ने एक दिन बताया था कि वतन वालों का सितम देखिये शहीद के साथ, अशफ़ाक़ के नाम पर पुरे भारत मे एक सड़क, चौक , पार्क का नाम नही मिलता है।
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बेहद लहीम शहीम और खूबसूरत अशफ़ाक़ उल्लाह की हर एक तस्वीर में जिस तरह वो मर्दाना खूबसूरती की बेहतरीन मिसाल नज़र आया करते थे, उसी तरह उनकी आख़री तस्वीर में भी उनकी खूबसूरती में रत्ती भर फ़र्क नही दिख रहा, यूँ लगता है जैसे कोई मासूम सा शख़्स सुकून की नींद में सोते हुए मुस्कुरा रहा हो.... शहीद अशफ़ाक़ उल्लाह ख़ान साहब की आख़िरी तस्वीर देखिये
हम ख़ून की किस्ते तो कई दे चुके लेकिन ,
ए ख़ाक ए वतन क़र्ज़ अदा क्यों नहीं होता ।

शख्सियत



जेल से रिहा होने के बाद मोहानी के पास रोजी-रोटी का कोई साधन नही था। गुजर-बसर के लिए उन्होंने स्वदेशी कपड़ों का व्यापार करने का निर्णय लिया। अलीगढ़ के मिस्टन रोड पर ‘खिलाफत स्टोर लिमिटेड’ कायम किया। जिसमें उन्होंने अर्से तक स्वदेस निर्मित कपड़े खरीद-फरोख्त करते रहे। हसरत मोहानी हिन्दुस्तान के वह पहले व्यक्ति थे जिन्होंने स्वदेशी कपड़ों का व्यापार किया और जनता को उसके इस्तेमाल का फायदा समझाएं।

"Happy Independence Day"





"Saare jahan se accha, Hindostan humara,
Hum Bulbulen hain Iski, yeh Gulsitaan hamara
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Ghurbat me ho agar hum, Rehta hai dil Watan me,
Samjho wahi humen bhi, Dil hain jahaan humara
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Parvat woh sabse uncha, Humsaaya Aasman ka,
Woh santari humara, Woh pasban humara
.
Godi me khelti hain, Iski hazaron nadiya,
Gulshan hai jinke dum se, Rashk-e-janan humara
.
Aye ab, raud, ganga, Woh din hai yaad tujhko,
Utara tere kinare, jab kaarwan humara
.
Maz'hab nahi Sikhaata Aapas me bair rakhna,
Hindi hai hum, Watan hai Hindostan humara
.
Yunano Misro-roma, Sab mil gaye jahan se,
Ab tak magar hai baaqi, Naamo Nishaan humara
.
Kuchh baat hai ke hasti, milti nahi humari,
Sadiyon raha hai dushman, daur-e-zamaan humara
.
IQBAL koi meharam, apna nahi jahan me,
Maalum kya kisi ko, Darde Nihaan humara
.
Saare jahan se acchha Hindostan humara
Hum Bulbulen hain Iski, yeh Gulsitaan humara."

" I Love ( ) My India