Showing posts with label Indian Muslim. Show all posts
Showing posts with label Indian Muslim. Show all posts

औरंगज़ेब आलमगीर — ख़्वाजा गरीब नवाज़ की चौखट पर हाज़िरी




वो लम्हा जब मुग़ल बादशाह औरंगज़ेब ने झुककर ख़्वाजा गरीब नवाज़ की चौखट को सलाम किया — इतिहास भी सन्न रह गया! 
भारतीय इतिहास में मुग़ल बादशाह औरंगज़ेब आलमगीर का ज़िक्र हमेशा ताक़त, हुकूमत और जंगों के साथ किया जाता है।
लेकिन इतिहास में एक ऐसा लम्हा भी दर्ज है, जिसने दुनिया को बताया कि बादशाहत बड़ी ज़रूर है, मगर दरगाहों के दर पर सब बराबर हैं। 
साल 1679 से 1681 के बीच राजस्थान में फौजी मुहिम के दौरान
औरंगज़ेब आलमगीर ने अजमेर शरीफ़ में ख़्वाजा गरीब नवाज़ मोइनुद्दीन चिश्ती रहमतुल्लाह अलैह की दरगाह पर हाज़िरी दी।
यह सिर्फ़ एक यात्रा नहीं थी —
अहद, अकीदत और तस्लीम का इज़हार था।
वो ऐतिहासिक क्षण
बादशाह अपने कुछ चुनिंदा दरबारियों और अपने दो बेटों बहादुर शाह और आज़म शाह के साथ दरगाह शरीफ़ पहुँचे।
कहते हैं कि उस वक़्त दरगाह का माहौल ऐसा था कि
ताज और तख़्त की चमक भी सूफियाओं के नूर के सामने फीकी पड़ गई।  मोहब्बत और अकीदत का सबूत
हाज़िरी के दौरान औरंगज़ेब की ओर से दरगाह के ख़ादिमों को
बेशुमार अतिया (दान/नज़राना) दिया गया।
दान चाहे छोटा हो या बड़ा —
मक़सद हमेशा एक ही होता है: अकीदत का इज़हार।
यह वाक़िया सिर्फ़ एक बादशाह का दरगाह जाना नहीं था,
बल्कि इस बात का सुबूत भी था कि
अलिया-ए-अल्लाह की चौखट पर हर शक्स बराबर है — चाहे वो ताजपोश बादशाह ही क्यों न हो। 
 सोचने वाली बात
इतिहास लड़ाइयों और फ़तहों से नहीं —
दिलों के झुकने से भी लिखा जाता है।
आज भी जब कोई श्रद्धालु अजमेर शरीफ़ पहुँचता है,
तो वह उसी अकीदत और मोहब्बत की रवायत को आगे बढ़ाता है
जो सदियों पहले बादशाहों ने निभाई।





Diwan-i-Khas in Agra Fort







Diwan-i-Khas in Agra Fort, Photograph circa 1890, India. A digitally restored photograph from the period by Photoglobe Co.
Built by Shah Jahan, this Hall of Private Audience hosted Mughal emperors' meetings. The famous Peacock Throne was once kept here, before Aurangzeb took it to Delhi. In the scene, Europeans leave the hall, natives work in gardens, highlighting its grand scale. The rosy sky was an imaginative addition by the printers, as this print is based on a black & white photograph. #History #India #Agra

टीपू सुल्तान



Tipu Sultan was not just Tiger of Mysore but Sher-e Hind (شیر ھند) 'Tiger of Hind'
One day's life of a lion is preferable to hundred years of a jackal - Tipu Sultan
شیر کی ایک دن کی زندگی گیدڑ کی سو سالہ زندگی سے بہتر ہے۔ ٹیپو سلطان
शेर की एक दिन की ज़िदगी गीदड़ की सौ साल की ज़िंदगी से बेहतर है ۔ टीपू सुल्तान






Abu'l-Fazl presenting Akbarnama to Akbar 1596 -1640







Artist: Govardhan
In the year 1589,Emperor Akbar ordered the penning of India's Mughal history as well as biographies of the rulers of this dynasty. The person who was entrusted with this task was Abul Fazl Allami. He commenced work and was able to complete two volumes by the year 1602. In the third volume, he has followed Akbar until a year before his death in 1604.
Before entrusting Abul Fazl with this task, Akbar had endeavored to establish a department to record events in 1589. Fourteen people were employed here to carefully record the events of Akbar's life. He also wanted the older courtiers to collect events from earlier years. All these recorded events of this era were at Abul Fazl Allami's disposal.
Therefore, he has used three sources to compile Akbarnama: Evidence, Reports and Documents.
Since Persian was the official language of Akbar's court, Abul Fazl used to write in the Persian language, and also wrote Akbarnama in Persian.

Baburi Masjid







A 19th-century photograph of Baburi Masjid by a British photographer Samuel Bourne. According to Catherine Blanshard Asher, the mosque was originally built by Mughal commander Mir Baqi on the orders of the founder of the Mughal Empire, Babur in 1528-29 in Ayodhya (present-day Uttar Pradesh, India).


December 6 marks the 31st year of its demolition.

हसन खां मेवाती




इतिहास ये भी है
मेवाती बुजदिल नहीं होते ये ज़बान के बड़े पक्के होते हैं जान दे देते हैं लेकिन साथ नहीं छोड़ते।
बाबर ने जब हसन खां मेवाती को निमंत्रण भेजा की तुम राणा सांगा के खिलाफ हमारा साथ दो तो राजा हसन खां मेवाती ने कहा था कि मैं अपनी मातृभूमि के साथ गद्दारी नहीं कर सकता मैं तुम्हारे लिए अपने वतन के भाई राणा सांगा का साथ नहीं छोडूंगा । ये सुनकर बाबर आग बबूला हो गया उसने खंडवा के मैदान में राणा सांगा के खिलाफ़ भयंकर युद्ध शुरू कर दिया।
राजा हसन खां मेवाती को जैसे ही ख़बर लगी वो भी अपने लाव-लश्कर और 1,200 सैनिकों को साथ लेकर राणा सांगा की मदद के लिए पहुँच गए
जँहा भयंकर युद्ध छिड़ गया । इस युद्ध मे दुर्भाग्यवश राजा हसन खां मेवाती के घोड़े का पैर मुड़ गया जिससे घोड़ा गिर गया और राजा हसन खां मेवाती ने ज़मीन पर आकर मोर्चा संभाल लिया राजा हसन खां मेवाती व उनके बेटे नाहर खान
ने राणा सांगा के साथ किया हुआ वादा अपनी खून की अंतिम बूंद तक निभिया 15 मार्च 1527 का कन्वाह के मैदान में पिता और पुत्र अपनी मातृभूमि के लिए शहीद हो गए।
#मेवात

Khuda Baksh Khan







A Bibliophile, a collector of rare manuscripts; initially established a Private Library in 1880. Which later in the year 1891 opened for public. He acquired 1400 rare manuscripts from his father Mohammad Bakhsh; and later added 2600 to make it one of the rarest collection of Persian, Arabic and Urdu manuscripts in the world. The library was declared an institution of National importance by the Government of India in 1969.
Impressed with his rich collection, at one occasion The British Library offered him very handsome amount to buy his collection. Which he refused by saying that “I am a poor man. The money that has been offered is a Princely fortune. But how can I ever part for money with that to which my father and I have dedicated our lives.”
He later said about book collection; “The art of collection is one that soars above and defies the provisions of the penal code.
There are three classes of blind men- those who are bereft of sight; those who (lend) valuable books even to a friend; and those who return such volumes, once they have passed into their possession”
Below is a real photograph of Khuda Bakhsh Khan
(Founder of Khuda Bakhsh Oriental Public Library - Patna Bihar, India.)


@History of Indian subcontinent

अंग्रेज़ो के खिलाफ पहली आवाज़ उठाने वाले मुस्लमान








संघ मुख्यालय व उनसे जुड़े संघटन कार्यालयों में भारतिया मुस्लिम क्रांतीकारियों की न तस्वीर न उनका कोई गुणगान ! खुद राष्ट्रवादी दूसरे को देशद्रौही कहने से या उंगली उठाने से चार उंगली उन पर ही उठेंगी :
देश के लिए मुसलमानो की शहादत और आज के छदम राष्ट्रवादी कल के वो परिवार की बगावत भूल चुकी है, अगर हां भूल चुकी है तो इस न्यूज़ को पढ़ें, और खासतौर से "गिरिराज सिंह, योगी, साध्वी, बाबा राम देव, जैसे फालतू लोगो को बताएं i देश के लिए मुसलमानो की कुर्बानियों को !
भारत को ब्रिटिश हुकूमत से आज़ादी दिलाने में अनगिनत मुस्लिम स्वतंत्रा सेनानियो ने अपनी जान की क़ुरबानी दी। परन्तु जब-कभी भारत के स्वतंत्रता आंदोलन की बात होती है तो मुस्लिम समुदय से सिर्फ एक ही नाम सामने अत हैं। जहाँ देखो वहीं दिखाई देता है। लेकिन उसके अलावा किसी का नाम नज़र नहीं आता हैं। उस नाम से आप भी अच्छी तरह वाकिफ हैं, जी हाँ वह और कोई नहीं ‘अशफ़ाक़ उल्लाह खान’ का नाम दिखाई देता हैं। तो मुद्दा यह हैं कि क्या सिर्फ अशफ़ाक़ उल्लाह खान भारत के स्वतंत्रता आंदोलन में शामिल थे। बल्कि अगर अस्ल तारिख का गहन अध्यन किया जाये, तो आप देखेगे 1498 की शुरुआत से लेकर 1947 तक मुसलमानो ने विदेशी आक्रमणकारियो से जंग लड़ते हुए अपनी जानो को शहीद करते हुए सब कुछ क़ुरबान कर दिया।
आइए जानते हैं
फतवा राष्ट्रप्रेम का
मौलाना हुसैन अहमद मदनी (रह.) ने अंग्रेजी हुकुमत के खिलाफ जब फतवा दिया. कि अंग्रेजों की फौज में भर्ती होना हराम है। अंग्रेजी हुकुमत ने मौलाना के खिलाफ मुकदमा दायर किया. सुनवाई में अंग्रेज जज ने पूछा -” क्या आपने फतवा दिया है कि अंग्रेजी फ़ौज में भर्ती होना हराम है ?”
मौलाना ने जवाब दिया – ” हाँ फतवा दिया है.
और सुनो यही फतवा इस अदालत में अभी भी दे रहा हूं
और याद रखो…आगे भी जिंदगी भर यही फतवा देता रहूंगा..”””
जज ने कहा -” मौलाना ..इसका अंजाम जानते हो ..सख्त सज़ा होगी..।
मौलाना – ” फतवा देना मेरा काम…और सज़ा देना तेरा काम ..तू सज़ा दे…।
जज गुस्से में आ गया -” तो इसकी सज़ा फांसी है।
मौलाना मुस्कुराने लगे और झोले से कपडा निकाल कर मेज पर रख दिया….
जज ने कहा ये क्या है..?
मौलाना ने फरमाया- “ये कफ़न का कपडा है …मैं देवबंद से कफ़न साथ में लेकर आया था।”
” लेकिन कफन का कपडा तो यहाँ भी मिल जाता..”
” हाँ ..कफ़न का कपडा यहाँ मिल तो जाता.. लेकिन …
जिस अंग्रेज की सारी उम्र मुखालफत की..उसका कफ़न पहन के कब्र में जाना मेरे जमीर को गंवारा नहीं। ”
( फतवे और इस घटना के असर में ..हजारों लोग फौज की नौकरी छोड़ कर जंगे आज़ादी में शामिल हुए )
इसके बाद सिलशिला शुरू हो गया
शाह अब्दुल अज़ीज़ रह ० का अंग्रेज़ो के खिलाफ फतवा
1772 मे शाह अब्दुल अज़ीज़ रह ० ने अंग्रेज़ो के खिलाफ जेहाद का फतवा दे दिया ( हमारे देश का इतिहास 1857 की मंगल पांडे की क्रांति को आज़ादी की पहली क्रांति मन जाता हैं) जबकि सचाई यह है कि शाह अब्दुल अज़ीज़ रह ० 85 साल पहले आज़ादी की क्रांति की लो हिन्दुस्तानीयो के दिलों मे जला चुके थे. इस जेहाद के ज़रिये उन्होंने कहा के अंग्रेज़ो को देश से निकालो और आज़ादी हासिल करो.
यह फतवे का नतीजा था कि मुस्लमानो के अन्दर एक शऊर पैदा होना शुरू हो गया के अंग्रेज़ लोग फकत अपनी तिजारत ही नहीं चमकाना चाहते बल्कि अपनी तहज़ीब को भी यहां पर ठूसना चाहते है.
हैदर अली और टीपू सुल्तान की वीरता
हैदर अली और बाद में उनके बेटे टीपू सुल्तान ने ब्रिटिश इस्ट इंडिया कंपनी के प्रारम्भिक खतरे को समझा और उसका विरोध किया.
टीपू सुल्तान भारत के इतिहास में एक ऐसा योद्धा भी था जिसकी दिमागी सूझबूझ और बहादुरी ने कई बार अंग्रेजों को घुटने टेकने पर मजबूर कर दिया. अपनी वीरता के कारण ही वह ‘शेर-ए-मैसूर’ कहलाए.
अंग्रेजों से लोहा मनवाने वाले बादशाह टीपू सुल्तान ने ही देश में अंग्रेजो के ज़ुल्म और सितम के खिलाफ बिगुल बजाय था, और जान की बाज़ी लगा दी मगर अंग्रेजों से समझौता नहीं किया. टीपू अपनी आखिरी साँस तक अंग्रेजो से लड़ते-लड़ते शहीद हो गए. टीपू की बहादुरी को देखते हुए पूर्व राष्ट्रपति डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम ने उन्हें विश्व का सबसे पहला राकेट आविष्कारक बताया था.
बहादुर शाह ज़फ़र
बहादुर शाह ज़फ़र (1775-1862) भारत में मुग़ल साम्राज्य के आखिरी शहंशाह थे और उर्दू भाषा के माने हुए शायर थे. उन्होंने 1857 का प्रथम भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में भारतीय सिपाहियों का नेतृत्व किया. इस जंग में हार के बाद अंग्रेजों ने उन्हें बर्मा (अब म्यांमार) भेज दिया जहाँ उनकी मृत्यु हुई.
1857 का भारतीय विद्रोह, जिसे प्रथम भारतीय स्वतंत्रता संग्राम, सिपाही विद्रोह और भारतीय विद्रोह के नाम से भी जाना जाता है ब्रितानी शासन के विरुद्ध एक सशस्त्र विद्रोह था. यह विद्रोह दो वर्षों तक भारत के विभिन्न क्षेत्रों में चला. इस विद्रोह का आरंभ छावनी क्षेत्रों में छोटी झड़पों तथा आगजनी से हुआ था परन्तु जनवरी मास तक इसने एक बड़ा रुप ले लिया. विद्रोह का अन्त भारत में ईस्ट इंडिया कम्पनी के शासन की समाप्ति के साथ हुआ और पूरे भारत पर ब्रिटेनी ताज का प्रत्यक्ष शासन आरंभ हो गया जो अगले 10 वर्षों तक चला.
ग़दर आंदोलन
गदर शब्द का अर्थ है विद्रोह, इसका मुख्य उद्देश्य भारत में क्रान्ति लाना था. जिसके लिए अंग्रेज़ी नियंत्रण से भारत को स्वतंत्र करना आवश्यक था.गदर पार्टी का हैड क्वार्टर सैन फ्रांसिस्को में स्थापित किया गया, भोपाल के बरकतुल्लाह ग़दर पार्टी के संस्थापकों में से एक थे जिसने ब्रिटिश विरोधी संगठनों से नेटवर्क बनाया था.
ग़दर पार्टी के सैयद शाह रहमत ने फ्रांस में एक भूमिगत क्रांतिकारी रूप में काम किया और 1915 में असफल गदर (विद्रोह) में उनकी भूमिका के लिए उन्हें फांसी की सजा दी गई. फैजाबाद (उत्तर प्रदेश) के अली अहमद सिद्दीकी ने जौनपुर के सैयद मुज़तबा हुसैन के साथ मलाया और बर्मा में भारतीय विद्रोह की योजना बनाई और 1917 में उन्हें फांसी पर लटका दिया गया था.
खुदाई खिदमतगार मूवमेंट
लाल कुर्ती आन्दोलन भारत में पश्चिमोत्तर सीमान्त प्रान्त में ख़ान अब्दुल ग़फ़्फ़ार ख़ान द्वारा भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के समर्थन में खुदाई ख़िदमतगार के नाम से चलाया गया जो की एक ऐतिहासिक आन्दोलन था. विद्रोह के आरोप में उनकी पहली गिरफ्तारी 3 वर्ष के लिए हुई थी.
उसके बाद उन्हें यातनाओं की झेलने की आदत सी पड़ गई. जेल से बाहर आकर उन्होंने पठानों को राष्ट्रीय आन्दोलन से जोड़ने के लिए ‘ख़ुदाई ख़िदमतग़ार’ नामक संस्था की स्थापना की और अपने आन्दोलनों को और भी तेज़ कर दिया.
अलीगढ़ आन्दोलन
सर सैय्यद अहमद खां ने अलीगढ़ मुस्लिम आन्दोलन का नेतृत्व किया. वे अपने सार्वजनिक जीवन के प्रारम्भिक काल में राजभक्त होने के साथ-साथ कट्टर राष्ट्रवादी थे. उन्होंने हमेशा हिन्दू-मुस्लिम एकता के विचारों का समर्थन किया.
1884 ई. में पंजाब भ्रमण के अवसर पर हिन्दू-मुस्लिम एकता पर बल देते हुए सर सैय्यद अहमद खाँ ने कहा था कि, हमें (हिन्दू और मुसलमानों को) एक मन एक प्राण हो जाना चाहिए और मिल-जुलकर कार्य करना चाहिए.
यदि हम संयुक्त है, तो एक-दूसरे के लिए बहुत अधिक सहायक हो सकते हैं। यदि नहीं तो एक का दूसरे के विरूद्ध प्रभाव दोनों का ही पूर्णतः पतन और विनाश कर देगा. इसी प्रकार के विचार उन्होंने केन्द्रीय व्यवस्थापिका सभा में भाषण देते समय व्यक्त किये. एक अन्य अवसर पर उन्होंने कहा था कि, हिन्दू एवं मुसल्मान शब्द को केवल धार्मिक विभेद को व्यक्त करते हैं, परन्तु दोनों ही एक ही राष्ट्र हिन्दुस्तान के निवासी हैं.
सर सैय्यद अहमद ख़ाँ द्वारा संचालित ‘अलीगढ़ आन्दोलन’ में उनके अतिरिक्त इस आन्दोलन के अन्य प्रमुख नेता थे.
नजीरअहमद
चिरागअली
अल्ताफहुसैन
मौलाना शिबली नोमानी
यह तो अभी चुनिंदा लोगो के नाम हमने आपको बातये हैं. ऐसे सैकड़ो मुसलमान थे जिन्होंने भारत की आज़ादी की लड़ाई में अपने जीवन को कुर्बान कर देश को आज़ाद कराया. इतना ही नहीं मुस्लिम महिलाओ में बेगम हजरत महल, अस्घरी बेगम, बाई अम्मा ने ब्रिटिश के खिलाफ स्वतंत्रता के संघर्ष में योगदान दिया है. पर अफ़सोस भारत के स्वतंत्रता आंदोलन में इतने मुस्लमानो के शहीद होने के बाद भी हमको मुस्लमानो के योगदान के बारे में नहीं बताया जाता.
अंग्रेज़ो के खिलाफ पहली आवाज़ उठाने वाले मुस्लमान
नवाब सिराजुद्दौला
शेरे-मैसूर टीपू सुल्तान
हज़रत शाह वलीउल्लाह मुहद्दिस देहलवी
हज़रत शाह अब्दुल अज़ीज़ मुहद्दिस देहलवी
हज़रात सयेद अहमद शहीद
हज़रात मौलाना विलायत अली सदिकपुरी
अब ज़फर सिराजुद्दीन मुहम्मद बहादुर शाह ज़फर
अल्लामा फज़ले हक़ खैराबादी
शहज़ादा फ़िरोज़ शाह
मोलवी मुहम्मद बाकिर शहीद
बेगम हज़रत महल
मौलाना अहमदुल्लाह शाह
नवाब खान बहादुर खान
अजीज़न बाई
मोलवी लियाक़त अली अल्लाहाबाद
हज़रत हाजी इमदादुल्लाह मुहाजिर मकई
हज़रत मौलाना मुहम्मद क़ासिम ननोतवी
मौलाना रहमतुल्लाह कैरानवी
शेखुल हिन्द हज़रत मौलाना महमूद हसन
हज़रत मौलाना उबैदुल्लाह सिंधी
हज़रत मौलाना रशीद अहमद गंगोही
हज़रत मौलाना अनवर शाह कश्मीरी
मौलाना बरकतुल्लाह भोपाली
हज़रत मौलाना किफायतुल्लाह
सुभानुल हिन्द मौलाना अहमद सईद देहलवी
हज़रत मौलाना हुसैन अहमद मदनी
सईदुल अहरार मौलाना मुहम्मद अली जोहर
मौलाना हसरत मोहनी
मौलाना आरिफ हिसवि
मौलाना अबुल कलम आज़ाद
हज़रत मौलाना हबीबुर्रहमान लुधयानवी
सैफुद्दीन कचालू
मसीहुल मुल्क हाकिम अजमल खान
मौलाना मज़हरुल हक़
मौलाना ज़फर अली खान
अल्लामा इनायतुल्लाह खान मशरिक़ी
डॉ.मुख़्तार अहमद अंसारी
जनरल शाहनवाज़ खान
हज़रत मौलाना सयेद मुहम्मद मियान
मौलाना मुहम्मद हिफ्जुर्रहमान स्योहारवी
हज़रत मौलाना अब्दुल बरी फिरंगीमहली
खान अब्दुल गफ्फार खान
मुफ़्ती अतीक़ुर्रहमान उस्मानी
डॉ.सयेद महमूद
खान अब्दुस्समद खान अचकजाई
रफ़ी अहमद किदवई
युसूफ मेहर अली
अशफ़ाक़ उल्लाह खान
बैरिस्टर आसिफ अली
हज़रत मौलाना अताउल्लाह शाह बुखारी
अब्दुल क़य्यूम अंसारी
"अपील"
अपने उन तमाम हिंदू मुस्लिम सिख इसाई राष्ट्रवादी साथियों से जिनके पूर्वजों के त्याग त्पसस्या और बलिदान से देश आज़ाद हुआ और आपकी खामौशी आपकी बुज़दिली साबित कर रहीं है ! और उन मुस्लिम भाइयो–बहनो से जहाँ जहाँ तक मेरा यह लेख पहुँचे खुदारा अपने बच्चो को इसलामी तारीख पढाओ,उलामा–ए–दीन के कारनामे सुनाओ|जो चीज इस मुल्क के इतिहास से गायब कर दी गई है उसे तुम खुद अपने बच्चे–बच्चियो को बताओ,ये वक़्त की सबसे बड़ी ज़रूरत है |
~ Md Sher Ali

मौलवी अलाउद्दीन हैदर





मौलवी अलाउद्दीन हैदर स्वतंत्रता-संग्राम 1857 के क्रांतिकारी थे।


हैदर का जन्म 1824 ई• में तेलंगाना राज्य के नलगोंडा ज़िले में हुआ था।
उन्होंने इसलामी तौर तरीकों से शिक्षा ग्रहण की।
शिक्षा की समाप्ति के पश्चात वह हैदराबाद की मक्का मस्जिद के इमाम बन गए।
1857 के गदर के दौरान ब्रिटिश प्रशासन द्वारा ज़मीदार चेदा खान को गिरफ्तार कर हैदराबाद रेजीडेंसी भवन में बंद कर दिया गया। जिससे हैदराबाद की जनता उग्र हो गयी।
#तुर्रम_खां एवं मौलवी अलाउद्दीन मिलकर हैदराबाद रेजीडेंसी भवन पर हमला करने की योजना बनाने लगे। जिसको उन्होंने तय समय पर अंजाम दिया गया।
17 जुलाई 1857 को नमाज़ के बाद मौलवी अलाउद्दीन ने अपने दोस्त तुर्रम खां एवं अन्य लोगों के साथ मिलकर हैदराबाद रेजीडेंसी भवन पर धावा बोल दिया।
हमले के जुर्म में मौलवी अलाउद्दीन को गिरफ्तार कर अंडमान निकोबार ( सेलुलर जेल ) काले पानी की सज़ा सुनाई गई।
वह लगभग 30 वर्षों तक सेलुलर जेल में रहे और वही पर उनकी मृत्यु हो गई।
#MuslimFreedomfighterOfIndia,
#MuslimFreedomFightera

कुर्बानी



महाराष्ट्राची लोकसंख्या ११ कोटी. त्यात १ कोटी ३० लाख मुस्लिम. आपण १ कोटीच गृहीत धरू. पाच सदस्यीय कुटुंब गृहीत धरले तरी किमान २० लाख मुस्लिम कुटुंब महाराष्ट्रात राहतात. त्यापैकी केवळ १०% कुटुंबीयांची आर्थिक क्षमता कुर्बानी करण्याइतकी असल्याचे गृहीत धरले तरी किमान २ लाख मुस्लिम कुटुंबीयांनी आज कुर्बानी केली. तरीही महाराष्ट्रात एकाही अभ्यासकाला, समाज संस्थेला, सामाजिक संघटनेला २ लाख लोकांनी कुर्बानी का केली, हे जाणून घेण्याची गरज वाटली नाही. एखादा समाज कुर्बानी का करतो, त्यामागचे कारण काय आहे? तत्वज्ञान काय आहे? इतिहास काय आहे? भूमिका काय आहे? हे जाणून घेण्याची उत्सुकता नाही, की जिज्ञासा नाही की आतुरता नाही. मात्र तुम्ही कुर्बानी बंद करा म्हणून दूषणे द्यायला सारे मोकळे आहेत.
आता आजच्या कुर्बानी मागची आर्थिक उलाढाल समजून घ्या. मुस्लिमांनी कुर्बानीसाठी आणलेली ही २ लाख बोकडं आली कोठून? अर्थातच शेतीसोबत जोडधंदा करणाऱ्या शेतकऱ्यांकडून, धनगरांकडून आणि काही भटक्या विमुक्त जाती जमातींकडून. मुस्लिमांनी ही बोकडं लुटली, जिंकली की लुबाडून आणली. नव्हे त्यांनी खरेदी केली. या खरेदीचा पैसा कोणाच्या खिशात गेला? सोनाराच्या, मारवाडीच्या, बामनाच्या, मदरशाच्या की मस्जिदीच्या? नव्हे तो पैसा वर्षाकाठी काहीतरी हातात यावं म्हणून पायपीट करून गुरे राखणाऱ्याच्या खिशात गेला. किती गेला? प्रत्येक बोकडाचे किमान १० हजार जरी गृहीत धरले तरी किमान २०० कोटी रुपये त्यांच्या खिशात गेले. ज्यांच्या खिशात गेले, त्यांचा धर्म काय? हिंदू. कोणते हिंदू? मागास, भटके, विमुक्त दारिद्री रेषेखालील हिंदू.
मुस्लिम समाज त्यांच्या दोनपैकी एकाही सणात घर, गाडी, दागदागिने अथवा इलेक्ट्रॉनिक सारख्या महागड्या वस्तूवर खर्च करीत नाही. समस्त भारतीय सणांत पैसे खालून वरच्या बाजूला प्रवाहित होतो. लोक बंगले घेतात, घरे घेतात, गाड्या घेतात, दागदागिने घेतात, इलेक्ट्रॉनिक्स घेतात. पैसा खालून वरच्या दिशेने प्रवाहित होतो. मात्र मुस्लिमांचे दोन्ही सण पैशाच्या प्रवाहित दिशा बदलतात. या सणांच्या वेळी पैसा वरून खाली प्रवाहित होऊ लागतो. समाजातील गरीब, उपेक्षित, वंचित आणि नाही रे वर्गाच्या हातात पैसा जाऊ लागतो. भांडवली वर्गाचे मुस्लिमांच्या सणांशी असलेले शत्रुत्व या धर्तीवर समजून घ्या.
मुजाहिद शेख (इस्लामचे अभ्यासक औरंगाबाद )

If Bravery Had A Face.


When Muslim girl arrives at PES College, She's been heckled by rental goons and several 'students' wearing #saffronshawls #KarnatakaHijabRow

बुलंद अख़लाक : उदात्त चारित्र्य



एक निस्सिम स्त्री भक्त (आबिदा) आपले भक्तीचे सामान अर्थात हातात जपमाळ (तसबी) आणि काखेत नमाजची चटई (मुसल्ला) घेवून परमेश्वराचा धावा करत काबागृहापर्यंत पोहोचली. परमेश्वराला म्हणाली, ''तुझी कृपा झाली तर एखादा भिकारीही शहेनशहा होवू शकतो आणि एखाद्या अनाथालाही प्रेषित बनवू शकतोस. मलाही कांही कृपाप्रसाद दे''. अल्लाह म्हणाला, "अगं वेडे, माझ्याकडे एकत्व, एकता आणि ऐक्य (वहदत) याशिवाय कांहीच नाही. तुला कांही जीवनाचे शहाणपण, भौतिक, सांसारिक आस, जगण्याची कला, युक्ती (शिकवण) हवी असेल तर मुहम्मद (स.) पैगंबरांकडे मदिना शहरी जा. आणि त्यांचेकडूनच जे काय हवे असेल ते घे. ते तुला संदेश व मार्ग दाखवतील." ही गोष्ट सांगण्याचे प्रायोजन म्हणजे इस्लाममधील परमेश्वराची संकल्पना व भूमिका काय आहे आणि त्याचबरोबर जीवनातील पैगंबरांचे मोठेपण काय आहे हे  आपण समजू शकतो. एकमेवाद्वितीय परमेश्वराने या अफाट विश्वाला एका विशिष्ट गती आणि नियमामध्ये बद्ध केले आहे. कांही शाश्वत आणि नैसर्गिक गोष्टींचे वचन दिलेले आहे. हे सगळे माणसाला मुक्तपणे बहाल केले आहे. त्याला स्वातंत्र्य व स्वायतत्ता दिली आहे. परमेश्वर सर्वांचे जीवन नियंत्रित करीत नाही. याउपर माणसाने या विश्वात कसे जगावे हे त्याचेवरच अवलंबून आहे. जीवन अनमोल आहे. त्याने आपले जीवन निश्चत हेतू, उद्देश व ध्येयाने जगावे. या वैश्विक व नैसर्गिक जीवनाशी तादात्म्य पावत जीवन जगण्याचे मार्गदर्शन व पैगाम देणारे मुहम्मद (स.) पैगंबर हे होत. त्यांचे उदात्त जीवन हेच आपल्या समोर आदर्श जीवनशैलीचे उदाहरण आहे. म्हणूनच कुराण मध्ये याचा विशेष उल्लेख आहे. "बेशक आपके आख़लाक बुलंद हैं।" ( कु. ६८:४ ).


आपण जाणतोच की पैगंबरांच्या आगमनापूर्वीचा काळ अज्ञान, अंधकार, स्वार्थ, हिंसा, चमत्कार, बुवाबाजी, भ्रष्टाचार, भेदभाव आदींनी ग्रासलेला व दुभंगलेला समाज होता. मद्य, ललना, दुर्गण आणि लढाई यामध्ये आकंठ बुडालेला होता.  समाज अज्ञानमुलक व नैतिकदृष्ट्या अगदी अध:पतीत होता. पैगंबरांनी यासर्व गोष्टींमध्ये क्रांतीकारक बदल घडवून समग्र समाज परिवर्तन घडवून आणले. पैगंबरांनी जीवनाचे मर्म जाणले. माणसाला जगण्यासाठी सन्मान, शांती व सुरक्षितता हवी. प्रत्येक व्यक्ती एक माणूस म्हणून उच्च व श्रेष्ठ दर्जापर्यंत पोहोचला पाहिजे तरच सर्वार्थाने एक उन्नत समाज उदयाला येईल. पैगंबरांचना समाजामध्ये जे कांही बदल घडवायचे होते ते स्वतःच बदल बनले. स्वतःचे जीवन उच्च नैतिकता व उदात्त चारित्र्याने ( बुलंद अख़लाक ) जगले. एक स्वत:चा आदर्श समाजासमोर ठेवला.


आजची सामाजिक परिस्थितीही अतिशय विदारक व ढासळलेली आपण पहातो. माणसाचा स्वार्थ पराकोटीला पोहोचला आहे. स्वतःच्या  फायद्यासाठी दुसऱ्याला, समाजाला आणि निसर्गाला ओरबाडणे सुरु आहे. भांडवली, कार्पोरेट आर्थिक व्यवस्था सैतानी स्वरूपात पुढे येते आहे. जात, धर्म, वंश, राष्ट्र, लिंग अशा अनेक गोष्टींतून भेदाभेद निर्माण केला जात आहे. राजकारण म्हणजे तर 'जिसकी लाठी उसकी भैंस' असेच म्हणावे लागेल. उच्च, नीच, गरीब, श्रीमंत अशी विषमता तर वाढतच आहे. लोकशाही, स्वातंत्र्याचा संकोच सुरु आहे. धार्मिक कट्टरवाद, दांडगाई आणि दडपशाहीने अस्थैर्य व अराजक निर्माण झाले आहे. भ्रष्टाचार, हिंसा, बलात्कार, हत्या, बुवाबाजी, चमत्कार, जुगार, सट्टेबाजी, पैशाचा पाऊस, व्यसनाधिनता अशा वाईट गोष्टींनी समाज पोखरला आहे. एवढेच नव्हे तर ज्या समाजात भृणहत्या, बालहत्या व नरबळी दिला जातो त्या समाजाची दशा लक्षात येते.


अशा या ढासळलेल्या, दुभंगलेल्या आणि अध:पतीत समाजात उच्च व श्रेष्ठ दर्जाची वैश्विक मुल्ये रुजवत बदल व परिवर्तन घडवणे गरजेचे आहे. आणि समाजाला सांस्कृतिक दृष्ट्या उच्य स्थानापर्यंत नेणे जरुरीचे आहे. अर्थातच अशा समाजातील प्रत्येक माणूस उच्य नैतिकता व उदात्त चारित्र्य संपन्न असला पाहिजे. नेमके हेच ध्येय व उद्देश घेवून इस्लाम आपल्या अनुयायांना व समाजाला उन्नत अवस्थेप्रत नेण्याचे कार्य करतो.


पैगंबर स्वतः निरक्षर होते. परंतू त्यांच्या जीवनसंघर्ष व चिंतनातून ज्ञानाचे महत्व लक्षात आले. त्यांनी ज्ञानाला प्रथमस्थानी आणले. त्यांचे कडे श्रेष्ठ गुण, उच्च नैतिकता आणि स्तुत्य सवयी होत्या. त्यांचे चारित्र्य निर्मळ, निष्कलंक व संशयातीत होते. त्यांच्या प्रामाणिक, खरेपणा व सचोटीने त्यांना तरुणपणीच 'अलअमीन' ( विश्वासू ) ही उपाधी मिळाली. पैगंबरांच्या तरुणपणी 'हिल्फ उल फजूल' नावाचे आघाडी संघटन स्थापन झाले होते. जे समाजातील दुर्बल व कमजोर लोकांवर होणाऱ्या शोषण, जुलूम, अन्याय, अत्याचार, हिंसा यापासून त्यांचे संरक्षण व सहाय्य करील. तसेच समाजातील पवित्र गोष्टींचा अनादर व बेकायदेशीर गोष्टींपासून अटकाव करील. या आघाडीमध्ये पैगंबर सामिल झाले होते. यातून ते चांगलेच प्रभावित झाले होते. पैगंबर म्हणजे गरीब, कमजोर, अनाथ, गुलाम यांचे सच्चे मित्र व रक्षकच होते. हाच तर इस्लाम व कुराणचा सार व अर्क आहे.


पैगंबर म्हणजे एक आदर्श वैश्विक व्यक्तिमत्व होते. त्यांचेजवळ श्रेष्ठ मानवी मुल्यांचा खजिनाच होता. त्यांचेजवळ सजगता, आत्मविश्वास, आशावाद, ठाम निश्चय असे. त्यांचे विचार आणि कृतीमध्ये कधीच फरक नव्हता. त्यांच्या कार्याची व्यापकता व स्वरूप लक्षात घेता ते एक आदर्श प्रेषित होते. त्यांचेवर सोपवलेले कार्य त्यांनी प्रामाणिकपणे पूर्ण केले. कोणतेही काम नाउमेदीने अर्धवट सोडले नाही. त्यांचे व्यक्तिमत्वात शारिरीक, मानसिक, नैतिक अशी कोणत्याही प्रकारची दुर्बलता नव्हती.

त्यांचेजवळ असलेली सहनशिलता व संयम वाखाणण्या सारखी होती. कारण जीवनामध्ये त्यांनी अनेक कठीण व दुर्धर प्रसंगांना तोंड दिले. पैगंबरां जवळ असलेली क्षमाशिलता म्हणजे एक उत्तम नमुनाच होय. त्यांना संपत्ती व सांसारिक साधन सामुग्री बाबत कोणतीही इच्छा नव्हती. आराम व सुखासिनतेची ही आस नव्हती. त्यांचे रहाणे, खाणे व पेहराव अतिशय साधा असे. कोणतेही काम कमी दर्जाचे नाही असे ते म्हणत. स्वतःचे काम स्वतः करीत. स्वतःचे कपडे शिवणे, चप्पल दुरुस्ती, घरकामात मदत, खड्डे काढणे, बांधकाम करणे असली कामे स्वतःच करीत.


त्यांच्या जीवनाचे अतिशय बारकावे उपलब्ध आहेत. त्यांची उक्ती, कृती, प्रवचने व शिकवण यांच्या सर्व नोंदी आहेत. त्यांचे जीवनात कोणतेही गूढ, गुपीत किंवा रहस्ये नाहीत. त्यांनी जी तत्वे व शिकवण दिली त्याचेच आचरण स्वतः केले.


पैगंबरांनी अतिशय साधे सोपे परंतू तर्कबुद्धी संगत व व्यवहार्य तत्वज्ञान सांगितले. सर्वश्रेष्ठ उत्कृष्टता व महत्तम परिपूर्णता त्यामध्ये होती. देवादिकांचा बाजार संपवून सत्य, अस्सल, खरा व शुद्ध एकेश्वराचा मार्ग दाखवला. पैगंबरांनी सर्वोत्तम धार्मिक, अध्यात्मिक, नैतिक व भौतिक विचारांच्या योगदानाने संपूर्ण मानवजातीचे आमुलाग्र उन्नयन, प्रगती व सुधारणा घडवून आणली. पैगंबरांनी एक उदात्त नैतिक जीवन व चारित्र्य याचा आदर्श आपल्या समोर ठेवला.


- शफीक देसाई.


संपर्क - ९४२१२०३६३२.

बरसों बरस सजेंगे शहीदों के मजारों पे मेले...


 
बरसों बरस सजेंगे शहीदों के मजारों पे मेले...


जंगे आज़ादी के शहीद अशफ़ाक़ उल्लाह खान और पंडित रामप्रसाद बिस्मिल का आज बलिदान दिवस है, आज से 93 साल पहले महज़ सत्ताईस साल की उम्र में अंग्रेजों ने 19 दिसम्बर 1927 को अशफ़ाक़ उल्लाह खान और उनके गहरे दोस्त और क्रांतिकारी रामप्रसाद बिस्मिल को फांसी पर चढ़ा दिया था
22 अक्टूबर 1900 को शाहजहांपुर में (वर्तमान उत्तर प्रदेश में) जन्मे अशफ़ाक़ ने वतन को आज़ाद कराने के लिए काफी संघर्ष किया था, महान क्रांतिकारी राम प्रसाद बिस्मिल से उनकी गहरी दोस्ती थी, शायद दोनों में शायरी के एक से शौक़ ने दोनों की दोस्ती को मज़बूत बना दिया था, रामप्रसाद का तखल्लुस "बिस्मिल" था वहीँ अशफाक का "हसरत".
"सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है" जैसा दिलों में वलवला भर देने वाला तराना लिखने वाले बिस्मिल और उनके साथियों के दिलों में आज़ादी की जंग के लिए क्या ही वलवला रहा होगा, हम बस अंदाज़ा लगा सकते हैं.....
.... 9 अगस्त 1925 को अंग्रेज़ों के खिलाफ लड़ने के लिए हथियारों का इंतजाम करने के लिए अशफाक उल्ला खान और पंडित राम प्रसाद बिस्मिल के नेतृत्व में आठ अन्य क्रांतिकारियों ने लखनऊ के पास "काकोरी" नाम की जगह पर ट्रेन लूटी थी... इसे इतिहास में काकोरी कांड के नाम से याद किया जाता है... इसके बाद फिरंगी सरकार बुरी तरह इन लोगों के पीछे पड़ गई थी और आखिरकार 26 सितम्बर 1925 सितंबर को बिस्मिल और अशफाक को ब्रिटिश पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया था..... दोनों को अलग अलग जेलों मैं एक ही दिन यानी 19 दिसम्बर 1927 को फांसी दे दी गई.....
.
"शहीदों की मज़ारों पर लगेंगे हर बरस मेले
वतन पर मरने वालों का यही बाक़ी निशाँ होगा"
.
..... ये शेर जंगे आज़ादी के शहीद अशफ़ाक़ उल्लाह ख़ान ने लिखा था,
..... फेसबुक दोस्त मुहम्मद उमर अशरफ़ ने एक दिन बताया था कि वतन वालों का सितम देखिये शहीद के साथ, अशफ़ाक़ के नाम पर पुरे भारत मे एक सड़क, चौक , पार्क का नाम नही मिलता है।
.
बेहद लहीम शहीम और खूबसूरत अशफ़ाक़ उल्लाह की हर एक तस्वीर में जिस तरह वो मर्दाना खूबसूरती की बेहतरीन मिसाल नज़र आया करते थे, उसी तरह उनकी आख़री तस्वीर में भी उनकी खूबसूरती में रत्ती भर फ़र्क नही दिख रहा, यूँ लगता है जैसे कोई मासूम सा शख़्स सुकून की नींद में सोते हुए मुस्कुरा रहा हो.... शहीद अशफ़ाक़ उल्लाह ख़ान साहब की आख़िरी तस्वीर देखिये
हम ख़ून की किस्ते तो कई दे चुके लेकिन ,
ए ख़ाक ए वतन क़र्ज़ अदा क्यों नहीं होता ।

शख्सियत



जेल से रिहा होने के बाद मोहानी के पास रोजी-रोटी का कोई साधन नही था। गुजर-बसर के लिए उन्होंने स्वदेशी कपड़ों का व्यापार करने का निर्णय लिया। अलीगढ़ के मिस्टन रोड पर ‘खिलाफत स्टोर लिमिटेड’ कायम किया। जिसमें उन्होंने अर्से तक स्वदेस निर्मित कपड़े खरीद-फरोख्त करते रहे। हसरत मोहानी हिन्दुस्तान के वह पहले व्यक्ति थे जिन्होंने स्वदेशी कपड़ों का व्यापार किया और जनता को उसके इस्तेमाल का फायदा समझाएं।