Wednesday, January 14, 2026

मौलाना अबुल कलाम आज़ाद के तारीख़ी अल्फ़ाज़







ये तारीख़ी अल्फ़ाज़ हैं मौलाना अबुल कलाम आज़ाद के, जिसे उन्होंने 1947 में बकरीद के मौके पर दिल्ली की जामा मस्जिद में कहा था। उन्होंने आज़ादी मिलने पर मुसलमानों को उस वक़्त ख़िताब किया। लेकिन उनकी ये बातें पढ़कर ऐसा लगता है जैसे अभी के लिए ही कही गयी थीं।
उन्होंने कहा था की देखो ये मस्जिद की मीनारें तुमसे उचक कर सवाल कर रही हैं कि तुमने अपनी तारीख के सफ़हात को कहां गुम कर दिया है? अभी कल की बात है कि यही जमुना के किनारे तुम्हारे काफ़िलों ने वज़ू किया था, और आज तुम हो कि तुम्हें यहां रहते हुए खौफ़ महसूस होता है, हालांकि देल्ही तुम्हारे खून की सींची हुई है।

अज़ीज़ों! अपने अंदर एक बुनियादी तब्दीली पैदा करो, जिस तरह आज से कुछ अरसे पहले तुम्हारे जोश-ओ-ख़रोश बेजा थे, उसी तरह से आज ये तुम्हारा खौफ़ बेजा है, मुसलमान और बुज़दिली या मुसलमान और इश्तआल एक जगह जमा नहीं हो सकते। सच्चे मुसलमान को कोई ताक़त हिला नहीं सकती है। और न कोई खौफ़ डरा सकता है।

आओ अहद करो कि ये मुल्क हमारा है, हम इसी के लिए हैं और उसकी तक़दीर के बुनियादी फैसले हमारी आवाज़ के बगैर अधूरे ही रहेंगे।

आज तुम ज़लज़लों से डरते हो? कभी तुम ख़ुद एक ज़लज़ला थे, आज अंधेरे से कांपते हो, क्या याद नहीं रहा कि तुम्हारा वजूद ख़ुद एक उजाला था, ये बादलों के पानी की सील क्या है कि तुमने भीग जाने के डर से अपने पायंचे चढ़ा लिए हैं, वो तुम्हारे ही इस्लाफ़ थे जो समुंदरों में उतर गए थे, पहाड़ियों की छातियों को रौंद डाला था, आंधियां आईं तो उनसे कह दिया कि तुम्हारा रास्ता ये नहीं है, ये ईमान से भटकने की ही बात है जो शहंशाहों के गिरेबानों से खेलने वाले आज खुद अपने ही गिरेबान के तार बेच रहे हैं, और ख़ुदा से उस दर्जे तक गाफ़िल हो गये हैं कि जैसे उसपर कभी ईमान ही नहीं था।

अज़ीज़ों मेरे पास कोई नया नुस्ख़ा नहीं है। वही 1400 बरस पहले का नुस्ख़ा है, वो नुस्ख़ा जिसको इस क़ायनात के सबसे बड़े मोहसिन (मोहम्मद सल्ललाहु अलैहि वसल्लम) लेकर आये थे। और वो नुस्ख़ा है क़ुरान का ये ऐलान, 'बददिल न होना, और न गम करना, अगर तुम मोमिन (नेक, ईमानदार) हो, तो तुम ही ग़ालिब होगे'