13 अप्रैल 1919 की दोपहर, सिख, गुरखा और सिंधी फौजियों ने फायर खोल दिया। सामने आम लोग थे। कुलन 1650 गोलियां दागी गयी। 379 लोग मरे, हजार से ऊपर घायल हुए।
बाग की जमीन खून से लाल हो गयी।
आदेश कर्नल रेनिगनल्ड एड्वर्ड हैरी डायर का था।
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इंक्वायरी हुई, जांच कमीशन बैठा।
इतिहास कहता है कि मामला सत्यपाल और सैफुदीन किचलू की गिरफ्तारी से भड़का। दोनों उसी गांधी के फालोवर्स थे जो देश भर में बगावत फैला रहा था।
ऐसे हर शख्स को गिरफ्तार किया जाना था। देश भर में नियंत्रण स्थापित हो गया था, मगर बंगाल और पंजाब की हिम्मत न टूटती थी।
तो मार्शल ला लगाया गया।
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डायर मार्शल लॉ प्रशासक थे।
दमन का चक्र चला। 144 लगाई, कर्फ्यु लगाया। पुलिस की लाठी बराबर नजदीक कोई आये, तो कोड़े मारने के आदेश थे। थोड़ा मामला शांत हुआ।
लेकिन जल्द ही दो अंग्रेजो की लाश मिली।
इस क्रिया की प्रतिक्रिया डायर को करनी ही थी।
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और खबर मिली -मोहम्मद बशीर मीटिंग बुला रहा है कन्हैया लाल उसका साथ दे रहा है। वे शहर में हड़ताल करेंगे, रैली निकलेंगे। ब्लडी कांग्रेस पीपल..
इनको शबक शिखाना मांगटा..
तो जब जांच के दौरान, हंटर कमीशन ने पूछा- लोगों को बाग में आने से रोकने के लिए, वहां फौजी पहरा क्यों नहीं लगा दिया ??
डायर सीना ठोक कर बोला -मैंने इन सबको मारने की ठान ली थी। तो उन्हें आने दिया। आखिर बाग में जमा सारे लोग, निषेधाज्ञा का उल्लंघन कर रहे थे।
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कहने का मतलब था कि जनता ने सरकार से प्रदर्शन की अनुमति नही ली थी। मैदान बुक नही कराया था। राजा के खिलाफ, सरकार विरोधी नारे लगा रहे थे।
वे सरकार के खिलाफ "पॉलीटिक्स" कर रहे थे। काला कानून, रौलेट एक्ट वापस लेने की मांग कर रहे थे। ये एक्ट तो देश मे अमन और व्यवस्था बचाने के लिए बनाया गया था। इसकी मुखालफत, गद्दारी थी, बगावत थी।
बगावत बर्दाश्त नही होगी।
गद्दारी बर्दाश्त नही होगी।
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मीटिंग सुबह 11 बजे से थी। साढ़े बारह बजे, पर ऊपर से सर्वे करने को हवाई जहाज गुजरा। पायलट ने डायर को बताया- कोई छह हजार लोग हैं।
अब डायर ने फ़ौज इकट्ठी की।
जब गाड़ियों में मशीनगनें लद रही थी- बाग में सरकार के खिलाफ प्रस्ताव पढ़ा जा रहा था। हिंदी में, उर्दू में, पंजाबी में, अंग्रेजी में। भीड़ बढ़ती जा रही थी।
कि एकमात्र रास्ते पर डायर की फौज आ खड़ी हुई।
जलियावाला बाग, अब मौत का दड़बा बन चुका था।
"फायर" - डायर चीखा!!
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190 साल के इतिहास में, ब्रिटिश सरकार के हाथ यह एक नरसंहार हुआ। इतिहास बताता है कि जलियावाला बाग में गोली चलाने वाले हाथ, हिंदुस्तानी थे।
9 वी गोरखा राइफल, 54 वी सिख रेजिमेंट,
और 59 वी सिंध राइफल..
बहरहाल हंटर कमीशन की रिपोर्ट के बाद डायर को नौकरी से बर्खास्त कर दिया गया। ब्रिटेन में "बुचर ऑफ अमृतसर" के नाम से जाना जाता था।
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लेकिन नाम तो बदनाम का भी होता है। एक तबका था इंगलैंड में, जिसने डायर का सम्मान किया।
26000 पाउंड का चन्दा करके गिफ्ट दिया गया। बस यूं समझिए कि हत्यारों की, दंगाइयों की जैसी फैन फॉलोविंग आज भारत मे है
तब डायर की फॉलोविंग, इंग्लैंड में थी।
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पर वह ज्यादा जिया नही।
आठ साल बाद, तपेदिक, हार्ट स्ट्रोक लकवे से उसकी मौत 23 जुलाई 1927 को हो गई। हालांकि व्हाट्सप वाली वीरगाथाये कहती है, कि उधमसिंह ने डायर को मौत के घाट उतारकर हिंदुस्तान का बदला ले लिया।
यह गलत है, क्योकि वो दूसरा डायर था - माइकल ओ'डायर, जो हत्याकांड के वक्त पंजाब का गवर्नर था।
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एक सौ सात साल हो चुके।
देश फिर इंसान से बड़ा, और उसकी मलिकार बनी सरकार, खुदा हो चुकी है। अफसर नेता बुलडोजर पर सवार होकर घूम रहे है। गुंडे न्याय दे रहे हैं, जज पूजा पाठ में लीन हैं।
और इसी देश के कई कोनों में कोई सत्यपाल, कोई किचलू और बशीर, एक बार फिर साथ- साथ बैठे हैं। वे सम्विधान की फटी हुई प्रस्तावना पढ़ रहे हैं।
डायर का इंतजार हो रहा हैं।
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