अनाइमंगलम बौद्ध ताम्र-पत्र (जिन्हें 'लीडेन प्लेट्स' भी कहा जाता है) 11वीं सदी में चोल साम्राज्य द्वारा बौद्ध धर्म को दिए गए धार्मिक सम्मान और शाही संरक्षण का सबसे महत्वपूर्ण ऐतिहासिक सबूत हैं।
चोल राजाओं ने बौद्ध भिक्षुओं और उनके मठों की मदद के लिए काफी दान दिया। इन ताम्र-पत्रों से जुड़ी मुख्य बौद्ध बातें और महत्वपूर्ण विवरण इस प्रकार हैं:
1. चूड़ामणि विहार को ज़मीन दान करने का शाही आदेश: इन प्लेटों पर दर्ज मुख्य आदेश के अनुसार, सम्राट राजराज चोल प्रथम ने 'अनाइमंगलम' गाँव से मिलने वाला सारा राजस्व 'चूड़ामणि विहार' के रखरखाव के लिए दान कर दिया था। यह एक शानदार बौद्ध मठ था जो उस समय तमिलनाडु के तटीय शहर नागपट्टिनम में बन रहा था।
विहार का निर्माण: इस बौद्ध मठ को जावा (आज का इंडोनेशिया) के श्रीविजय साम्राज्य के शैलेंद्र वंश के राजा श्री मार विजयोतुंगवर्मन ने अपने पिता 'चूड़ामणि वर्मन' की याद में बनवाया था।
2. टैक्स-फ्री बौद्ध ज़मीन ('पल्लीच्छंदम'): चोल प्रशासन में, इस खास तरह के टैक्स-फ्री ज़मीन के दान को 'पल्लीच्छंदम' कहा जाता था। इस दान के कारण, अनाइमंगलम गाँव से इकट्ठा होने वाला सारा टैक्स राजस्व और अनाज सीधे बौद्ध भिक्षुओं और मठ के भोजन, कपड़ों और रखरखाव के लिए इस्तेमाल किया जाता था।
3. प्राचीन समुद्री और कूटनीतिक संबंध: ये ताम्र-पत्र दिखाते हैं कि एक हज़ार साल पहले दक्षिण भारत (चोल साम्राज्य) और दक्षिण-पूर्व एशिया (इंडोनेशिया/मलेशिया) के बीच गहरे व्यापारिक, सांस्कृतिक और कूटनीतिक संबंध थे। बौद्ध धर्म इन दोनों ताकतों को जोड़ने वाली एक मज़बूत सांस्कृतिक कड़ी था।
4. बनावट और भाषा: वज़न और आकार: इन 24 ताम्र-पत्रों का कुल वज़न लगभग 30 किलोग्राम है। ये एक भारी कांसे के छल्ले से एक साथ जुड़े हुए हैं, जिस पर चोल शाही निशान (बाघ, मछली और धनुष के प्रतीक) बने हैं। दो भाषाओं में विवरण: पहले पाँच पन्ने संस्कृत (बौद्ध हाइब्रिड संस्कृत) में हैं और उनमें चोल राजाओं की वंशावली बताई गई है। अगले 16 पन्ने तमिल लिपि में हैं और उनमें अनाइमंगलम गाँव की सीमाओं और बौद्ध मठ को दिए गए दान के बारे में पूरी कानूनी जानकारी दी गई है।
5. भारत वापसी (ताज़ा अपडेट): यह बेशकीमती ऐतिहासिक चीज़ 18वीं सदी में डच (नीदरलैंड) उपनिवेशवादियों द्वारा भारत से ले जाई गई थी और सदियों तक वहाँ लीडेन यूनिवर्सिटी में सुरक्षित रखी गई थी। मई 2026 में, एक ऐतिहासिक राजनयिक समझौते के तहत इसे आधिकारिक तौर पर भारत सरकार को वापस सौंप दिया गया।
भारत सरकार और नीदरलैंड की सरकार का आभार सांस्कृतिक और ऐतिहासिक आदान-प्रदान जारी रहना चाहिए।
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