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तोफखाना - मलिक-ए-मैदान
तोफ वजन 55 टन, लांबी 14.6 फूट आणि डायमीटर 4.9 फूट. तिच्या ओढण्यासाठी 10 हत्ती, 400 बैल आणि शेकडो माणसांची ताकद लागत होती. (फारसी शब्द-अर्थ: मैदानाचा राजा)
आज जरी ती तोफ आदिलशाहीची म्हणून ओळखली जात असली तरी या तोफेचा जन्म मूळ निजामशाहीमध्ये झाला. १५४९ साली बुर्हान निजामशहा याच्या तोफखान्यातील तुर्की अधिकारी चलबी रुमीखान दखनीयाने ही तोफ अहमदनगर येथे बनवली. रुमीखान हा मूळचा तुर्कस्तानचा होता. मलिक-ए-मैदान तोफेच्या निर्मितीच्या वेळी, म्हणजेच सोळाव्या शतकात, ती जगातील सर्वात मोठी शस्त्रे मानली जात होती.
तोफेचा धमाका एवढा मोठा होता की बत्ती देणारा सैनिक मरण्याची शक्यता असल्याने शेजारीच एक पाण्याचा हौद बांधलेला आहे. बत्ती दिली की सैनिकाने लगेच हौदात उडी मारून पाण्यात बुडी मारून बसायचे!
विजयनगरजवळील रक्कस-तंगडी येथे झालेल्या युद्धात या तोफेचा पहिल्यांदा वापर करण्यात आला होता. या तोफेचा आवाज एवढा प्रचंड होता की विजयनगरच्या राज्याचे सैन्य आवाज ऐकूनच पळून गेले होते.
युद्ध संपल्यानंतर या तोफेला तेथून 80 किमी दूर असलेल्या पुरंदरच्या किल्ल्यात ठेवण्यात आले होते. पुरंदरच्या किल्ल्यातून इ.स. 1632 मध्ये एका मराठा सरदाराने या तोफेला कर्नाटकातील विजापूर येथे स्थापित केले होते.
अनाइमंगलम बौद्ध ताम्र-पत्र
अनाइमंगलम बौद्ध ताम्र-पत्र (जिन्हें 'लीडेन प्लेट्स' भी कहा जाता है) 11वीं सदी में चोल साम्राज्य द्वारा बौद्ध धर्म को दिए गए धार्मिक सम्मान और शाही संरक्षण का सबसे महत्वपूर्ण ऐतिहासिक सबूत हैं।
चोल राजाओं ने बौद्ध भिक्षुओं और उनके मठों की मदद के लिए काफी दान दिया। इन ताम्र-पत्रों से जुड़ी मुख्य बौद्ध बातें और महत्वपूर्ण विवरण इस प्रकार हैं:
1. चूड़ामणि विहार को ज़मीन दान करने का शाही आदेश: इन प्लेटों पर दर्ज मुख्य आदेश के अनुसार, सम्राट राजराज चोल प्रथम ने 'अनाइमंगलम' गाँव से मिलने वाला सारा राजस्व 'चूड़ामणि विहार' के रखरखाव के लिए दान कर दिया था। यह एक शानदार बौद्ध मठ था जो उस समय तमिलनाडु के तटीय शहर नागपट्टिनम में बन रहा था।
विहार का निर्माण: इस बौद्ध मठ को जावा (आज का इंडोनेशिया) के श्रीविजय साम्राज्य के शैलेंद्र वंश के राजा श्री मार विजयोतुंगवर्मन ने अपने पिता 'चूड़ामणि वर्मन' की याद में बनवाया था।
2. टैक्स-फ्री बौद्ध ज़मीन ('पल्लीच्छंदम'): चोल प्रशासन में, इस खास तरह के टैक्स-फ्री ज़मीन के दान को 'पल्लीच्छंदम' कहा जाता था। इस दान के कारण, अनाइमंगलम गाँव से इकट्ठा होने वाला सारा टैक्स राजस्व और अनाज सीधे बौद्ध भिक्षुओं और मठ के भोजन, कपड़ों और रखरखाव के लिए इस्तेमाल किया जाता था।
3. प्राचीन समुद्री और कूटनीतिक संबंध: ये ताम्र-पत्र दिखाते हैं कि एक हज़ार साल पहले दक्षिण भारत (चोल साम्राज्य) और दक्षिण-पूर्व एशिया (इंडोनेशिया/मलेशिया) के बीच गहरे व्यापारिक, सांस्कृतिक और कूटनीतिक संबंध थे। बौद्ध धर्म इन दोनों ताकतों को जोड़ने वाली एक मज़बूत सांस्कृतिक कड़ी था।
4. बनावट और भाषा: वज़न और आकार: इन 24 ताम्र-पत्रों का कुल वज़न लगभग 30 किलोग्राम है। ये एक भारी कांसे के छल्ले से एक साथ जुड़े हुए हैं, जिस पर चोल शाही निशान (बाघ, मछली और धनुष के प्रतीक) बने हैं। दो भाषाओं में विवरण: पहले पाँच पन्ने संस्कृत (बौद्ध हाइब्रिड संस्कृत) में हैं और उनमें चोल राजाओं की वंशावली बताई गई है। अगले 16 पन्ने तमिल लिपि में हैं और उनमें अनाइमंगलम गाँव की सीमाओं और बौद्ध मठ को दिए गए दान के बारे में पूरी कानूनी जानकारी दी गई है।
5. भारत वापसी (ताज़ा अपडेट): यह बेशकीमती ऐतिहासिक चीज़ 18वीं सदी में डच (नीदरलैंड) उपनिवेशवादियों द्वारा भारत से ले जाई गई थी और सदियों तक वहाँ लीडेन यूनिवर्सिटी में सुरक्षित रखी गई थी। मई 2026 में, एक ऐतिहासिक राजनयिक समझौते के तहत इसे आधिकारिक तौर पर भारत सरकार को वापस सौंप दिया गया।
भारत सरकार और नीदरलैंड की सरकार का आभार सांस्कृतिक और ऐतिहासिक आदान-प्रदान जारी रहना चाहिए।
इस ऐतिहासिक तस्वीर में बोधिसत्व अवलोकितेश्वर की मूर्ति के पास बैठे शोधकर्ता ब्रिटिश-अमेरिकी पुरातत्वविद् डॉ. डेविड ब्रेनार्ड स्पूनर हैं। यह तस्वीर 1915-16 में नालंदा महाविहार में हुई खुदाई के दौरान ली गई थी। डॉ. स्पूनर ने नालंदा विश्वविद्यालय के प्राचीन खंडहरों की व्यवस्थित और वैज्ञानिक खुदाई शुरू करने में अहम भूमिका निभाई थी।
मूर्ति अवलोकितेश्वर बुद्ध की है और इसे वर्तमान बिहार राज्य के प्राचीन नालंदा की खुदाई के दौरान खोजा गया था। यह ऐतिहासिक मूर्ति अभी कोलकाता के भारतीय संग्रहालय में सुरक्षित रखी गई है और वहाँ प्रदर्शित की गई है।
भारत के विभिन्न स्थानों पर स्थापित सम्राट अशोक के स्तंभ
भारत के विभिन्न स्थानों पर स्थापित सम्राट अशोक के स्तंभों (Ashokan Pillars) और उनके शीर्ष पर बनी हुई शिलाओं (capitals) को दर्शाता है। इन स्तंभों को मौर्य सम्राट अशोक ने तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व में बनवाया था। इन स्तंभों के शीर्ष पर अलग-अलग जानवरों की मूर्तियाँ बनाई गई थीं, जो बौद्ध धर्म के प्रतीकों को दर्शाती हैं।
प्रमुख स्थान और शिलाएं:
सारणाथ (Sarnath)- चार शेरों की मूर्ति (Lion Capital) — यह सबसे प्रसिद्ध है और भारत का राष्ट्रीय प्रतीक भी है। यह स्तंभ बौद्ध धर्म के "धर्मचक्र प्रवर्तन" की याद में बनाया गया था।
सांची (Sanchi) - यहाँ का स्तंभ शेर के आकार में है। यह बौद्ध धर्म के प्रचार से जुड़ा है।
सांकीसा (Sankissa)- यहाँ हाथी की आकृति वाला स्तंभ है। यह बुद्ध के पृथ्वी पर आगमन का प्रतीक है।
लौरिया नंदनगढ़ (Lauria Nandangarh)- यहाँ भी शेर की आकृति वाला स्तंभ है।
रामपुरवा (Rampurva)- यहाँ बैल (Bull) और ऊँट के समान दिखने वाले जानवर की आकृतियाँ मिली हैं। यह स्तंभ नेपाल और बिहार की सीमा के पास स्थित है।
वैशाली (Vaishali)- यहाँ एक शेर की मूर्ति है।
दक्षिण भारत (शायद अमरावती या अन्य क्षेत्र)- यहाँ भी शेर की आकृति वाला स्तंभ है, जो बौद्ध धर्म के दक्षिण भारत में फैलाव का संकेत है।
विशेषताएँ:-
सभी मूर्तियाँ एक ही पत्थर से बनाई गई थीं और उच्च गुणवत्ता वाली पॉलिश की गई थीं। ये स्तंभ बौद्ध धर्म के मूल सिद्धांतों और सम्राट अशोक के धम्म (धर्म) को फैलाने के लिए बनाए गए थे।
इन पर ब्राह्मी लिपि में लेख भी पाए जाते हैं।
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