जलियांवाला बाग का वही संकरा प्रवेश द्वार, जहाँ से 13 अप्रैल 1919 को जनरल डायर अपने सैनिकों के साथ अंदर गया था। उस दिन बैसाखी के अवसर पर हज़ारों निहत्थे लोग एक शांतिपूर्ण सभा के लिए यहाँ एकत्र हुए थे। बिना किसी चेतावनी के जनरल डायर ने सैनिकों को भीड़ पर गोलियाँ चलाने का आदेश दे दिया। लोग जान बचाने के लिए इधर-उधर भागे, लेकिन संकरे रास्ते और ऊँची दीवारों के कारण बाहर नहीं निकल सके। कई लोग अपनी जान बचाने के लिए शहीदी कुएँ में कूद गए।
यह घटना भारत के स्वतंत्रता संग्राम के सबसे दर्दनाक और निर्णायक अध्यायों में से एक मानी जाती है। आज भी यह प्रवेश द्वार उस अमानवीय नरसंहार की मूक गवाही देता है।
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