Sunday, January 15, 2023

अंग्रेज़ो के खिलाफ पहली आवाज़ उठाने वाले मुस्लमान








संघ मुख्यालय व उनसे जुड़े संघटन कार्यालयों में भारतिया मुस्लिम क्रांतीकारियों की न तस्वीर न उनका कोई गुणगान ! खुद राष्ट्रवादी दूसरे को देशद्रौही कहने से या उंगली उठाने से चार उंगली उन पर ही उठेंगी :
देश के लिए मुसलमानो की शहादत और आज के छदम राष्ट्रवादी कल के वो परिवार की बगावत भूल चुकी है, अगर हां भूल चुकी है तो इस न्यूज़ को पढ़ें, और खासतौर से "गिरिराज सिंह, योगी, साध्वी, बाबा राम देव, जैसे फालतू लोगो को बताएं i देश के लिए मुसलमानो की कुर्बानियों को !
भारत को ब्रिटिश हुकूमत से आज़ादी दिलाने में अनगिनत मुस्लिम स्वतंत्रा सेनानियो ने अपनी जान की क़ुरबानी दी। परन्तु जब-कभी भारत के स्वतंत्रता आंदोलन की बात होती है तो मुस्लिम समुदय से सिर्फ एक ही नाम सामने अत हैं। जहाँ देखो वहीं दिखाई देता है। लेकिन उसके अलावा किसी का नाम नज़र नहीं आता हैं। उस नाम से आप भी अच्छी तरह वाकिफ हैं, जी हाँ वह और कोई नहीं ‘अशफ़ाक़ उल्लाह खान’ का नाम दिखाई देता हैं। तो मुद्दा यह हैं कि क्या सिर्फ अशफ़ाक़ उल्लाह खान भारत के स्वतंत्रता आंदोलन में शामिल थे। बल्कि अगर अस्ल तारिख का गहन अध्यन किया जाये, तो आप देखेगे 1498 की शुरुआत से लेकर 1947 तक मुसलमानो ने विदेशी आक्रमणकारियो से जंग लड़ते हुए अपनी जानो को शहीद करते हुए सब कुछ क़ुरबान कर दिया।
आइए जानते हैं
फतवा राष्ट्रप्रेम का
मौलाना हुसैन अहमद मदनी (रह.) ने अंग्रेजी हुकुमत के खिलाफ जब फतवा दिया. कि अंग्रेजों की फौज में भर्ती होना हराम है। अंग्रेजी हुकुमत ने मौलाना के खिलाफ मुकदमा दायर किया. सुनवाई में अंग्रेज जज ने पूछा -” क्या आपने फतवा दिया है कि अंग्रेजी फ़ौज में भर्ती होना हराम है ?”
मौलाना ने जवाब दिया – ” हाँ फतवा दिया है.
और सुनो यही फतवा इस अदालत में अभी भी दे रहा हूं
और याद रखो…आगे भी जिंदगी भर यही फतवा देता रहूंगा..”””
जज ने कहा -” मौलाना ..इसका अंजाम जानते हो ..सख्त सज़ा होगी..।
मौलाना – ” फतवा देना मेरा काम…और सज़ा देना तेरा काम ..तू सज़ा दे…।
जज गुस्से में आ गया -” तो इसकी सज़ा फांसी है।
मौलाना मुस्कुराने लगे और झोले से कपडा निकाल कर मेज पर रख दिया….
जज ने कहा ये क्या है..?
मौलाना ने फरमाया- “ये कफ़न का कपडा है …मैं देवबंद से कफ़न साथ में लेकर आया था।”
” लेकिन कफन का कपडा तो यहाँ भी मिल जाता..”
” हाँ ..कफ़न का कपडा यहाँ मिल तो जाता.. लेकिन …
जिस अंग्रेज की सारी उम्र मुखालफत की..उसका कफ़न पहन के कब्र में जाना मेरे जमीर को गंवारा नहीं। ”
( फतवे और इस घटना के असर में ..हजारों लोग फौज की नौकरी छोड़ कर जंगे आज़ादी में शामिल हुए )
इसके बाद सिलशिला शुरू हो गया
शाह अब्दुल अज़ीज़ रह ० का अंग्रेज़ो के खिलाफ फतवा
1772 मे शाह अब्दुल अज़ीज़ रह ० ने अंग्रेज़ो के खिलाफ जेहाद का फतवा दे दिया ( हमारे देश का इतिहास 1857 की मंगल पांडे की क्रांति को आज़ादी की पहली क्रांति मन जाता हैं) जबकि सचाई यह है कि शाह अब्दुल अज़ीज़ रह ० 85 साल पहले आज़ादी की क्रांति की लो हिन्दुस्तानीयो के दिलों मे जला चुके थे. इस जेहाद के ज़रिये उन्होंने कहा के अंग्रेज़ो को देश से निकालो और आज़ादी हासिल करो.
यह फतवे का नतीजा था कि मुस्लमानो के अन्दर एक शऊर पैदा होना शुरू हो गया के अंग्रेज़ लोग फकत अपनी तिजारत ही नहीं चमकाना चाहते बल्कि अपनी तहज़ीब को भी यहां पर ठूसना चाहते है.
हैदर अली और टीपू सुल्तान की वीरता
हैदर अली और बाद में उनके बेटे टीपू सुल्तान ने ब्रिटिश इस्ट इंडिया कंपनी के प्रारम्भिक खतरे को समझा और उसका विरोध किया.
टीपू सुल्तान भारत के इतिहास में एक ऐसा योद्धा भी था जिसकी दिमागी सूझबूझ और बहादुरी ने कई बार अंग्रेजों को घुटने टेकने पर मजबूर कर दिया. अपनी वीरता के कारण ही वह ‘शेर-ए-मैसूर’ कहलाए.
अंग्रेजों से लोहा मनवाने वाले बादशाह टीपू सुल्तान ने ही देश में अंग्रेजो के ज़ुल्म और सितम के खिलाफ बिगुल बजाय था, और जान की बाज़ी लगा दी मगर अंग्रेजों से समझौता नहीं किया. टीपू अपनी आखिरी साँस तक अंग्रेजो से लड़ते-लड़ते शहीद हो गए. टीपू की बहादुरी को देखते हुए पूर्व राष्ट्रपति डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम ने उन्हें विश्व का सबसे पहला राकेट आविष्कारक बताया था.
बहादुर शाह ज़फ़र
बहादुर शाह ज़फ़र (1775-1862) भारत में मुग़ल साम्राज्य के आखिरी शहंशाह थे और उर्दू भाषा के माने हुए शायर थे. उन्होंने 1857 का प्रथम भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में भारतीय सिपाहियों का नेतृत्व किया. इस जंग में हार के बाद अंग्रेजों ने उन्हें बर्मा (अब म्यांमार) भेज दिया जहाँ उनकी मृत्यु हुई.
1857 का भारतीय विद्रोह, जिसे प्रथम भारतीय स्वतंत्रता संग्राम, सिपाही विद्रोह और भारतीय विद्रोह के नाम से भी जाना जाता है ब्रितानी शासन के विरुद्ध एक सशस्त्र विद्रोह था. यह विद्रोह दो वर्षों तक भारत के विभिन्न क्षेत्रों में चला. इस विद्रोह का आरंभ छावनी क्षेत्रों में छोटी झड़पों तथा आगजनी से हुआ था परन्तु जनवरी मास तक इसने एक बड़ा रुप ले लिया. विद्रोह का अन्त भारत में ईस्ट इंडिया कम्पनी के शासन की समाप्ति के साथ हुआ और पूरे भारत पर ब्रिटेनी ताज का प्रत्यक्ष शासन आरंभ हो गया जो अगले 10 वर्षों तक चला.
ग़दर आंदोलन
गदर शब्द का अर्थ है विद्रोह, इसका मुख्य उद्देश्य भारत में क्रान्ति लाना था. जिसके लिए अंग्रेज़ी नियंत्रण से भारत को स्वतंत्र करना आवश्यक था.गदर पार्टी का हैड क्वार्टर सैन फ्रांसिस्को में स्थापित किया गया, भोपाल के बरकतुल्लाह ग़दर पार्टी के संस्थापकों में से एक थे जिसने ब्रिटिश विरोधी संगठनों से नेटवर्क बनाया था.
ग़दर पार्टी के सैयद शाह रहमत ने फ्रांस में एक भूमिगत क्रांतिकारी रूप में काम किया और 1915 में असफल गदर (विद्रोह) में उनकी भूमिका के लिए उन्हें फांसी की सजा दी गई. फैजाबाद (उत्तर प्रदेश) के अली अहमद सिद्दीकी ने जौनपुर के सैयद मुज़तबा हुसैन के साथ मलाया और बर्मा में भारतीय विद्रोह की योजना बनाई और 1917 में उन्हें फांसी पर लटका दिया गया था.
खुदाई खिदमतगार मूवमेंट
लाल कुर्ती आन्दोलन भारत में पश्चिमोत्तर सीमान्त प्रान्त में ख़ान अब्दुल ग़फ़्फ़ार ख़ान द्वारा भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के समर्थन में खुदाई ख़िदमतगार के नाम से चलाया गया जो की एक ऐतिहासिक आन्दोलन था. विद्रोह के आरोप में उनकी पहली गिरफ्तारी 3 वर्ष के लिए हुई थी.
उसके बाद उन्हें यातनाओं की झेलने की आदत सी पड़ गई. जेल से बाहर आकर उन्होंने पठानों को राष्ट्रीय आन्दोलन से जोड़ने के लिए ‘ख़ुदाई ख़िदमतग़ार’ नामक संस्था की स्थापना की और अपने आन्दोलनों को और भी तेज़ कर दिया.
अलीगढ़ आन्दोलन
सर सैय्यद अहमद खां ने अलीगढ़ मुस्लिम आन्दोलन का नेतृत्व किया. वे अपने सार्वजनिक जीवन के प्रारम्भिक काल में राजभक्त होने के साथ-साथ कट्टर राष्ट्रवादी थे. उन्होंने हमेशा हिन्दू-मुस्लिम एकता के विचारों का समर्थन किया.
1884 ई. में पंजाब भ्रमण के अवसर पर हिन्दू-मुस्लिम एकता पर बल देते हुए सर सैय्यद अहमद खाँ ने कहा था कि, हमें (हिन्दू और मुसलमानों को) एक मन एक प्राण हो जाना चाहिए और मिल-जुलकर कार्य करना चाहिए.
यदि हम संयुक्त है, तो एक-दूसरे के लिए बहुत अधिक सहायक हो सकते हैं। यदि नहीं तो एक का दूसरे के विरूद्ध प्रभाव दोनों का ही पूर्णतः पतन और विनाश कर देगा. इसी प्रकार के विचार उन्होंने केन्द्रीय व्यवस्थापिका सभा में भाषण देते समय व्यक्त किये. एक अन्य अवसर पर उन्होंने कहा था कि, हिन्दू एवं मुसल्मान शब्द को केवल धार्मिक विभेद को व्यक्त करते हैं, परन्तु दोनों ही एक ही राष्ट्र हिन्दुस्तान के निवासी हैं.
सर सैय्यद अहमद ख़ाँ द्वारा संचालित ‘अलीगढ़ आन्दोलन’ में उनके अतिरिक्त इस आन्दोलन के अन्य प्रमुख नेता थे.
नजीरअहमद
चिरागअली
अल्ताफहुसैन
मौलाना शिबली नोमानी
यह तो अभी चुनिंदा लोगो के नाम हमने आपको बातये हैं. ऐसे सैकड़ो मुसलमान थे जिन्होंने भारत की आज़ादी की लड़ाई में अपने जीवन को कुर्बान कर देश को आज़ाद कराया. इतना ही नहीं मुस्लिम महिलाओ में बेगम हजरत महल, अस्घरी बेगम, बाई अम्मा ने ब्रिटिश के खिलाफ स्वतंत्रता के संघर्ष में योगदान दिया है. पर अफ़सोस भारत के स्वतंत्रता आंदोलन में इतने मुस्लमानो के शहीद होने के बाद भी हमको मुस्लमानो के योगदान के बारे में नहीं बताया जाता.
अंग्रेज़ो के खिलाफ पहली आवाज़ उठाने वाले मुस्लमान
नवाब सिराजुद्दौला
शेरे-मैसूर टीपू सुल्तान
हज़रत शाह वलीउल्लाह मुहद्दिस देहलवी
हज़रत शाह अब्दुल अज़ीज़ मुहद्दिस देहलवी
हज़रात सयेद अहमद शहीद
हज़रात मौलाना विलायत अली सदिकपुरी
अब ज़फर सिराजुद्दीन मुहम्मद बहादुर शाह ज़फर
अल्लामा फज़ले हक़ खैराबादी
शहज़ादा फ़िरोज़ शाह
मोलवी मुहम्मद बाकिर शहीद
बेगम हज़रत महल
मौलाना अहमदुल्लाह शाह
नवाब खान बहादुर खान
अजीज़न बाई
मोलवी लियाक़त अली अल्लाहाबाद
हज़रत हाजी इमदादुल्लाह मुहाजिर मकई
हज़रत मौलाना मुहम्मद क़ासिम ननोतवी
मौलाना रहमतुल्लाह कैरानवी
शेखुल हिन्द हज़रत मौलाना महमूद हसन
हज़रत मौलाना उबैदुल्लाह सिंधी
हज़रत मौलाना रशीद अहमद गंगोही
हज़रत मौलाना अनवर शाह कश्मीरी
मौलाना बरकतुल्लाह भोपाली
हज़रत मौलाना किफायतुल्लाह
सुभानुल हिन्द मौलाना अहमद सईद देहलवी
हज़रत मौलाना हुसैन अहमद मदनी
सईदुल अहरार मौलाना मुहम्मद अली जोहर
मौलाना हसरत मोहनी
मौलाना आरिफ हिसवि
मौलाना अबुल कलम आज़ाद
हज़रत मौलाना हबीबुर्रहमान लुधयानवी
सैफुद्दीन कचालू
मसीहुल मुल्क हाकिम अजमल खान
मौलाना मज़हरुल हक़
मौलाना ज़फर अली खान
अल्लामा इनायतुल्लाह खान मशरिक़ी
डॉ.मुख़्तार अहमद अंसारी
जनरल शाहनवाज़ खान
हज़रत मौलाना सयेद मुहम्मद मियान
मौलाना मुहम्मद हिफ्जुर्रहमान स्योहारवी
हज़रत मौलाना अब्दुल बरी फिरंगीमहली
खान अब्दुल गफ्फार खान
मुफ़्ती अतीक़ुर्रहमान उस्मानी
डॉ.सयेद महमूद
खान अब्दुस्समद खान अचकजाई
रफ़ी अहमद किदवई
युसूफ मेहर अली
अशफ़ाक़ उल्लाह खान
बैरिस्टर आसिफ अली
हज़रत मौलाना अताउल्लाह शाह बुखारी
अब्दुल क़य्यूम अंसारी
"अपील"
अपने उन तमाम हिंदू मुस्लिम सिख इसाई राष्ट्रवादी साथियों से जिनके पूर्वजों के त्याग त्पसस्या और बलिदान से देश आज़ाद हुआ और आपकी खामौशी आपकी बुज़दिली साबित कर रहीं है ! और उन मुस्लिम भाइयो–बहनो से जहाँ जहाँ तक मेरा यह लेख पहुँचे खुदारा अपने बच्चो को इसलामी तारीख पढाओ,उलामा–ए–दीन के कारनामे सुनाओ|जो चीज इस मुल्क के इतिहास से गायब कर दी गई है उसे तुम खुद अपने बच्चे–बच्चियो को बताओ,ये वक़्त की सबसे बड़ी ज़रूरत है |
~ Md Sher Ali

Sunday, October 23, 2022

सावरकर, गांधी आणि इतिहासाचा विपर्याय 'भटकभवानी" या पुस्तकातून




© समीना दलवाई
दादरच्या मॅजेस्टिक बुक स्टॉलमध्ये पुस्तकं चाळत होते. काऊंटरवर गेले तेव्हा कोणी गृहस्थ सावरकरांच्या पुस्तकांबद्दल भक्तिभावाने विचारणा करीत होते. टेबलावर बसलेले काका 'तथाकथित सावरकर' अशा नावाच्या नवीन पुस्तकाची माहिती देऊ लागले.
ते म्हणाले, “आजकालच्या या पिढीला माहीतच नाही सावरकर काय आहेत ते. इतक्या प्रकारच्या गोष्टी लिहिल्या गेल्या आहेत की ते जहाजावरून पळालेच नाहीत वगैरे. खरा इतिहास राहणारच नाही मग.'
मला राहवेना. मी विचारलं, "गांधींच्या खुनात नव्हते का ते?" दुकानात शांतता पसरली.
कोणी तरी विचारलं, "मॅडम तुमचं काय मत आहे?"
मी म्हटलं, “मी फोटो तर पाहिलाय बुवा, खुनाच्या खटल्या वेळी आरोपींत बसलेल्या सावरकरांचा. गोपाळ गोडसेच्या 'गांधीहत्या आणि मी' या पुस्तकात उल्लेखही आहेच त्यांचा. हा इतिहास सांगायचा नाही का आजच्या पिढीला ?"
मॅजेस्टिकमधल्या काकांना सावरकरांचं 'सहा सोनेरी पाने' हे पुस्तक माहीत होतंच. या पुस्तकात सावरकर मुस्लिम स्त्रीवर बलात्कार करणं हे कसं योग्य आहे याची कारणमीमांसा देतात. शिवाजी महाराजांना सद्गुण विकृती होती म्हणतात. कारण कल्याणच्या सुभेदाराची सून ताब्यात आली होती तिला त्यांनी परत पाठविलं.
“त्या काळात सावरकरांची अशी धारणा होती. त्याला टू नेशन थिअरी म्हणतात. " मॅजेस्टिक काकांनी भलावण केली.
"मग सावरकर आणि जिन्ना हे दोघे भाऊ भाऊच की!" मी उद्गारले. यावर ते भलतेच चपापले. कमाल आहे नाही? दोघांनाही दोन धर्म आणि दोन देश ही संकल्पना प्रिय. हिंसाचाराचा वापर मान्य. मग आपल्याला जिन्ना अप्रिय अन् सावरकर प्रिय, असं का ?
आजकाल बऱ्याच प्रौढांची अशी तक्रार असते की, नव्या पिढीला इतिहास ठाऊक नाही. खरेच आहे म्हणा. आमच्या शालेय पाठ्यपुस्तकांत नथुराम गोडसेचा उल्लेख 'माथेफिरू तरुण' एवढाच होता. हिंदुत्ववादाचं विष अंगात भिनलेला एक सुशिक्षित उच्चवर्णीय पुणेरी मराठी तरुण असा कधीच नव्हता. नव्या पिढीला इतिहास शिकवायला निघालेल्या कोणी यावर टीका केलेली दिसली नाही.
खोटा इतिहास आपण तूर्तास बाजूला ठेवू. अस्वस्थ करणारी बाब ही की, राष्ट्रपित्याचे खुनी आमचे हिरो. का मारलं पुण्याच्या ब्राह्मणांनी इतक्या वयस्क नेत्याला? असे किती काळ जगले असते गांधीजी अजून?
हिंदुत्ववाद्यांना केवळ गांधी हा माणूस मारायचा नव्हता, त्यांची विचारप्रणाली
मारायची होती. का ओळखतं जग गांधींना ? काही वर्षांपूर्वी लंडनमध्ये राहात असताना मी एका चिकनच्या दुकानात
शिरले. चिकन कापणारा अल्जेरीयन आहे हे कळल्यावर मी म्हणाले, " तुमचा तर स्वातंत्र्यदिन आहे ना आता जुलैमध्ये ? किती वर्षे लढून मिळविला तुम्ही."
तो भलताच खुश झाला.
मी भारतीय आहे हे कळल्यावर म्हणाला, “पण आमची क्रांती रक्तरंजित, तुमची शांतीपूर्ण. तुमच्याकडे गांधी होते ना!'
त्या अल्जेरीयन माणसाला रक्ताची किंमत माहीत होती. फ्रान्सकडून स्वातंत्र्य मिळवण्यासाठी या आफ्रिकन देशाने १९५४ ते १९६२ या आठ वर्षांत रक्तरंजित यादवी पाहिलेली आहे. त्याच्या दृष्टीने भारतीय फारच नशीबवान. त्यांना गांधींसारखा नेता लाभला. ज्याने परकीय सत्तेकडून देश परत घेतला आणि तोही प्रेमाने, शांतीने, अहिंसेने !
ज्या एका भारतीयाला सारं जग मानतं, ज्याच्यासाठी नेल्सन मंडेला ३० वर्षांनी तुरुंगातून सुटल्यावर स्वदेशी जाण्याऐवजी आधी भारतभेटीला आले, त्याला मारण्याचा कट भारतातच रचला जावा आणि आम्ही भारतीयांनी मारेकऱ्यांबद्दल आदराने बोलावं ! इतिहासाचा याहून विपर्यास तो काय ?
© दीपक कसाळे fb वॉल

Saturday, October 8, 2022

मौलवी अलाउद्दीन हैदर





मौलवी अलाउद्दीन हैदर स्वतंत्रता-संग्राम 1857 के क्रांतिकारी थे।


हैदर का जन्म 1824 ई• में तेलंगाना राज्य के नलगोंडा ज़िले में हुआ था।
उन्होंने इसलामी तौर तरीकों से शिक्षा ग्रहण की।
शिक्षा की समाप्ति के पश्चात वह हैदराबाद की मक्का मस्जिद के इमाम बन गए।
1857 के गदर के दौरान ब्रिटिश प्रशासन द्वारा ज़मीदार चेदा खान को गिरफ्तार कर हैदराबाद रेजीडेंसी भवन में बंद कर दिया गया। जिससे हैदराबाद की जनता उग्र हो गयी।
#तुर्रम_खां एवं मौलवी अलाउद्दीन मिलकर हैदराबाद रेजीडेंसी भवन पर हमला करने की योजना बनाने लगे। जिसको उन्होंने तय समय पर अंजाम दिया गया।
17 जुलाई 1857 को नमाज़ के बाद मौलवी अलाउद्दीन ने अपने दोस्त तुर्रम खां एवं अन्य लोगों के साथ मिलकर हैदराबाद रेजीडेंसी भवन पर धावा बोल दिया।
हमले के जुर्म में मौलवी अलाउद्दीन को गिरफ्तार कर अंडमान निकोबार ( सेलुलर जेल ) काले पानी की सज़ा सुनाई गई।
वह लगभग 30 वर्षों तक सेलुलर जेल में रहे और वही पर उनकी मृत्यु हो गई।
#MuslimFreedomfighterOfIndia,
#MuslimFreedomFightera

Saturday, July 16, 2022

भारत में बूचड़खाने









भारत में कुल 72 बूचड़खाने हैं जिसे लाइसेंस प्राप्त हैं जिसमें से अकेले यूपी में 38बूचड़खाने हैं..इसमें 4 बूचड़खाने ऐसे भी हैं जिसे सरकार खुद चलाती है..जोकि आगरा, सहारनपुर में है..वहीं दो अन्य प्रस्तावित बूचड़खाने लखनऊ और बरेली में है..अलीगढ़ में हिंद एग्रो आईएमपीपी पहला बूचड़खाना है जिसे1996 में शुरु किया गया था..यहां यह समझने वाली बात यह है कि खाड़ी के देशों में भैंस के मांस की काफी मांग है और भारत इसके लिए सबसे कारगर देश है..इसकी सबसे बड़ी वजह है कि यहां सस्ता मांस मिलता है और विक्रेताको इस बात का भरोसा मिलता है कि उसे हलाल मांस ही दिया जा रहा है..
भारत कुल मीट निर्यात में तीसरा..और बफैलो मीट निर्यात में दुनिया में पहला स्थान रखता है..भारत70 से ज्यादा देशों को फ्रोजन और फ्रेश चिल्ड मीट का एक्सपोर्ट करता है..इसमें करीब 97 फीसदी हिस्सा फ्रोजेन बफैलो मीट का होता है..बफैलो मीट के​ लिए भारत के प्रमुख ग्राहक देश वियतनाम,मलेशिया,इजिप्ट,इराक,सऊदीअरब,फिलीपींस, इंडोनेशिया, यूएई, अल्जीरिया और रूस हैं..देश में करीब 11 अत्याधुनिक मीट प्लांट हैं..जहां फ्रोजेन बफैलो मीट का उत्पादन किया जाता है..
# इसलिए शाकाहार और मांसाहार बाबत मूर्ख और डबल स्टैंडर्ड लोगों की बातों के चक्कर में आकर अपना समय बरबाद ना करें।

Monday, July 11, 2022

कुर्बानी



महाराष्ट्राची लोकसंख्या ११ कोटी. त्यात १ कोटी ३० लाख मुस्लिम. आपण १ कोटीच गृहीत धरू. पाच सदस्यीय कुटुंब गृहीत धरले तरी किमान २० लाख मुस्लिम कुटुंब महाराष्ट्रात राहतात. त्यापैकी केवळ १०% कुटुंबीयांची आर्थिक क्षमता कुर्बानी करण्याइतकी असल्याचे गृहीत धरले तरी किमान २ लाख मुस्लिम कुटुंबीयांनी आज कुर्बानी केली. तरीही महाराष्ट्रात एकाही अभ्यासकाला, समाज संस्थेला, सामाजिक संघटनेला २ लाख लोकांनी कुर्बानी का केली, हे जाणून घेण्याची गरज वाटली नाही. एखादा समाज कुर्बानी का करतो, त्यामागचे कारण काय आहे? तत्वज्ञान काय आहे? इतिहास काय आहे? भूमिका काय आहे? हे जाणून घेण्याची उत्सुकता नाही, की जिज्ञासा नाही की आतुरता नाही. मात्र तुम्ही कुर्बानी बंद करा म्हणून दूषणे द्यायला सारे मोकळे आहेत.
आता आजच्या कुर्बानी मागची आर्थिक उलाढाल समजून घ्या. मुस्लिमांनी कुर्बानीसाठी आणलेली ही २ लाख बोकडं आली कोठून? अर्थातच शेतीसोबत जोडधंदा करणाऱ्या शेतकऱ्यांकडून, धनगरांकडून आणि काही भटक्या विमुक्त जाती जमातींकडून. मुस्लिमांनी ही बोकडं लुटली, जिंकली की लुबाडून आणली. नव्हे त्यांनी खरेदी केली. या खरेदीचा पैसा कोणाच्या खिशात गेला? सोनाराच्या, मारवाडीच्या, बामनाच्या, मदरशाच्या की मस्जिदीच्या? नव्हे तो पैसा वर्षाकाठी काहीतरी हातात यावं म्हणून पायपीट करून गुरे राखणाऱ्याच्या खिशात गेला. किती गेला? प्रत्येक बोकडाचे किमान १० हजार जरी गृहीत धरले तरी किमान २०० कोटी रुपये त्यांच्या खिशात गेले. ज्यांच्या खिशात गेले, त्यांचा धर्म काय? हिंदू. कोणते हिंदू? मागास, भटके, विमुक्त दारिद्री रेषेखालील हिंदू.
मुस्लिम समाज त्यांच्या दोनपैकी एकाही सणात घर, गाडी, दागदागिने अथवा इलेक्ट्रॉनिक सारख्या महागड्या वस्तूवर खर्च करीत नाही. समस्त भारतीय सणांत पैसे खालून वरच्या बाजूला प्रवाहित होतो. लोक बंगले घेतात, घरे घेतात, गाड्या घेतात, दागदागिने घेतात, इलेक्ट्रॉनिक्स घेतात. पैसा खालून वरच्या दिशेने प्रवाहित होतो. मात्र मुस्लिमांचे दोन्ही सण पैशाच्या प्रवाहित दिशा बदलतात. या सणांच्या वेळी पैसा वरून खाली प्रवाहित होऊ लागतो. समाजातील गरीब, उपेक्षित, वंचित आणि नाही रे वर्गाच्या हातात पैसा जाऊ लागतो. भांडवली वर्गाचे मुस्लिमांच्या सणांशी असलेले शत्रुत्व या धर्तीवर समजून घ्या.
मुजाहिद शेख (इस्लामचे अभ्यासक औरंगाबाद )

Wednesday, May 11, 2022

The first freedom struggle of India








The first freedom struggle of India, launched in 1857, has essentially become synonymous with figures like Mangal Pandey, Nana Saheb, Tatya Tope, Rani Laxmibai, and Veer Kunwar Singh.
However, being a widespread movement of massive proportions, many of its heroes have been lost in oblivion. One such prominent leader of the 1857 Mutiny was Maulavi Liyaquat Ali, hailing from Allahabad, UP.
During the Revolt, Maulavi Liyaquat Ali led the movement in Allahabad and managed to keep the British forces at bay from June 6, 1857 to June 16, 1857.
Maulavi Liyaquat Ali was an eminent Islamic scholar, and was also highly respected. After being fired from his job, he returned to his village, visiting Delhi, Bhopal, and Tonk and met Sayyid Ahmad Shaheedi who was waging a guerrilla war against British.
This probably pushed the Maulavi towards armed struggle. In his village, he opened a madrasa for children. Meanwhile, he began organising local peasants in their struggle against the persecution of the Company Bahadur and his loyal native rulers, especially in rural areas. Popular with small zamindars, talukdars and common people in Allahabad, Mirzapur and Pratapgarh, he soon emerged as a local hero in Rohilkhand, Awadh and Kanpur.
His influence soon extended to the Panda community, the Pragwal Brahmins, and Muslim majority villages also.
As a result of his efforts, the people of Allahabad were at the forefront in 1857.

Tuesday, May 10, 2022

सवाल..

 

.हिन्दू भाई का एक सवाल की खुदाई में 4 या 5 हजार साल पुरानी मस्जिदें क्यों नहीं निकलती सिर्फ मंदिर और मूर्तियां ही क्यों निकलती है
जवाब... मेरे भाई अल्लाह ने ये बात 1400 साल पहले ही लिख दी
क़ुरआन का अध्ययन करने पर पता चलता है कि अल्लाह पाक ने उन्ही क़ौमों और बस्तियों को हलाक व तबाह किया है जो पूरी तरह बुतपरस्ती मूर्ती पूजक और कुफ्र में शामिल हाल थी और अपने वक़्त के पैग़म्बर की बात ठुकरा देती थीं।
इनमें से कुछ पर उनके दुश्मन उन पर मुसल्लत कर दिये गये तथा कुछ की बस्तियों ज़मीन में धंसा दी गई और कुछ पर आंधियों, तूफ़ानों और पत्थरों की बारिश बरसा कर उनकी बस्तियों को इस सतह ज़मीन से मिटा दिया गया।
अब आज अगर खुदाई में ज़मीन में दफ़न हो चुकी सभ्यताओं के अवशेषों में सिर्फ़ मूर्तियां और मंदिर ही बरामद होते हैं तो इसमें आश्चर्य कैसा? क़ुरआन तो पहले ही बता रहा है कि इनको मिटाया ही इसलिये गया था कि यह लोग भी इसी ग़लतफ़हमियों में मुब्तिला थे कि पूर्वजों और पुरखों से चली आ रही अपनी परंपरा ही सत्य है। जैसा कि इस सवाल से भी प्रतिध्वनित होता है।
चार छह हज़ार साल पहले मस्जिद बनती थी इसके सुबूत के लिये हमें ज़मीन खोदने की ज़रूरत नहीं पड़ती है। काबा और बैतूल-मक़्दिस ज़मीन के ऊपर मौजूद हैं जिनकी हिस्ट्री पढ़ लीजिए तो आपको पता चल जाएगा कि इनका इतिहास सिर्फ़ चौदह सौ साल पुराना नहीं है। बाक़ी अगर आप मस्जिद की उस शक्ल को पुरातत्व में तलाश रहे हैं जो आज नज़र आती है, तो वह आपको इसलिए नहीं मिलेगी कि जमाअत के साथ सामूहिक रुप से नमाज़ पढ़ने का हुक्म चौदह सौ साल पुराना ही है। तथा मस्जिदों का यह गुंबद और मीनार वाली स्थापत्य कला तो और बाद में वजूद में आई है। इसलिये दीन-ए-क़य्यिम (इस्लाम) की प्राचीनता उसके पूजागृहों की स्थापत्य कला के अवशेषों में नहीं बल्कि उस पैग़ाम में ढ़ूढिये जिसका वह अलमबरदार है।
May be an image of text that says 'एक गैर मुस्लिम का सवाल और जवाब विश्व में कहीं पर भी खुदाई में चार पांच हजार साल पुरानी मस्जिद नहीं निकलती मंदिर ही निकलते हैं ऐसा क्यूं??'



Saturday, April 30, 2022

गावातल हरवलेले अंगण(खळा)





मी शोधतेय हरवलेले अंगण
मला वाटतं शोधत असाल तुम्ही पण !
कुणी शोधून देईल का विचारलंही
जर नसेल तर कसे शोधणार आपण !
आधी कसं मोठं अंगण होत घरासमोर
शेणानं सावरलेलं छान दिसत असे दिवसभर
स्वागत करीत असे ते येणा-या जाणा-यांचे
तेच अंगण होते प्रतिक आमच्या श्रीमंतीचे !
आता कुठं हरवले हो हे अंगण
सावरायचं ही विसरले सारे जण
अंगणासाठी आम्ही जागा कुठं सोडली
एक एक इंच जागा घरासाठी व्यापली !
आली आता शहरात फ्लॅट संस्कृती
अंगण गेलं म्हणून आली असेल विकृती
चार इंच जागेत काढतात खोटी रांगोळी
गावाच्या अंगणात काढत होतो किती मोठी !
आता शोध करू नका अंगणाचा
शोध करू नका हरवलेल्या मनाचा
अंगण होते तोपर्यंत होता आनंद दारात
सावरलेल्या अंगणातुन तो येत असे घरात !






आदिवासी




मैं धरती का पहला इंसान,
मैं किसी ॠषि की अवैध संतान नहीं हूँ!!
मुझे रामायण महाभारत की बोघकथाओं से कोई ताल्लुक नहीं।
मैं ही भारतभूमि का पहला पूर्वज हूँ!!
ना में आस्तिक हूँ,
ना में नास्तिक हूँ,
मैं वास्तविक हूँ!!
ना मैं गंवार हूं,
ना मैं अनपढ़ हूँ,
मैं आदिवासी हूं!!
प्रकृति की भाषा समझने वाला,
प्रकृति के नियम समझने वाला,
मैं अकेला इंसानी समूह हूँ!!
ना ही धर्म परिवर्तन के डर से पहाड़ों में छिपा हुआ हूं,
ना राज के डर से जंगल की शरण लिए हूं,
निस्वार्थ अपने दम पर आज़ादी बरकरार रख पाया हूँ,
ना मैंने मुगल _अंग्रेजों की चमचागिरी_गुलामगीरी की थी,
ना बहन बेटियों के उपहार देकर संरक्षण पाने का इतिहास हैं,
अरावली _विंध्याचल _सातपुड़ा से जंगल महल तक की पहाड़ियों पर मेरे पूर्वजों के निशान जिंदा हैं!!
मैं जन्म से ही स्वतंत्र रहने वाला इंसान हूँ,
मैं आदिवासी हूँ!!
ना मैं ब्राह्मण (पुजारी)
ना मैं क्षत्रिय (रक्षा)
ना मैं वैश्य (व्यवसाय)
ना मैं शूद्र (सेवक)
मैं एकमात्र ही चारों गुण रखने वाला आदिवासी हूँ,
मैं आदिवासी हूँ!!
ना मैं ईसाई हूँ,
ना मैं हिन्दू हूं,
ना मैं मुस्लिम हूं,
मैं प्रकृति मूलक आदिवासी हूं!!
ना मैं पाप-पुण्य, भाग्य_पुनर्जन्म का विश्वासी हूं,
ना पाखंड, कर्मकांड, अंधविश्वास का प्रचारक हूं,
ना मैं स्वर्ग-नर्क का अभिलाषी हूं,
मैं तो प्रकृति पुत्र हूँ,
मैं आदिवासी हूँ!


गोंडी संस्कृति संरक्षण संघ

Thursday, April 28, 2022



बिहार मे सबसे पहले क्रांति की शुरुवात 12 जून 1857 को होती है, जब देवघर ज़िले के रोहिणी नामक जगह पर अमानत अली, सलामत अली और शेख़ हारून बग़ावत कर अंग्रेज़ अफ़सर को मार देते हैं और इस जुर्म के लिए इन्हे 16 जून 1857 को आम के पेड़ पर लटकाकर फांसी दे दी जाती है. और इस तरह बिहार मे क्रांति की शुरुआत होती है… न दबाया ज़ेर ए ज़मीं उन्हें

न दिया किसी ने कफ़न उन्हें
न हुआ नसीब वतन उन्हें
न कहीं निशाने मज़ार है।



29 जून 2019 को देवघर जाना हुआ; मक़सद यही था के इन शहीदों के निशानात ढूंडा जाए; जानकारी इकट्ठी करने के बाद एक चीज़ जान कर अच्छा लगा के इन शहीदों को शहर ने याद रखा है, तीनो शहीदों की याद में शहर के बीच में एक स्मारक है! साथ ही रोहिणी में भी एक शहीद स्मारक है, और जेसीडिह - देवघर रोड पर एक द्वार इन शहीदों के नाम पर है!

Tuesday, April 26, 2022

मलिक अंबर


 अहमदनगरच्या निजामाचे प्रधानपद आणि लष्करप्रमुख असणाऱ्या मलिक अंबरने चिकलठाणा येथे झालेल्या लढाईत मुघलांचा पराभव केला.

त्यावेळेस मलिक अंबराला ही जागा अत्यंत आवडली. त्याने इथल्या खडकी गावाचा विकास करायचा ठरवलं आणि आजच्या औरंगाबाद शहराचा पहिला व्यवस्थित पाया घातला गेला. मलिक अंबराने शहरात रस्ते, पूल आणि कालव्याद्वारे (नहर) पाणीयोजना सुरू केली. त्याने नौखंडासारखे राजवाडेही बांधले. पोर्तुगीजांसाठी (त्याचा जंजिऱ्यांमुळे पोर्तुगीजांशी संबंध होता) चर्चही बांधले.

या खडकी शहरावर जहांगिर बादशहाने 1616 साली हल्ला केला आणि पुढची 20 वर्षे खडकी उभं राहाणार नाही अशी तजविज केली.

पण मलिक अंबराने 1621 साली पुन्हा खडकी उभं केलं. त्यानंतर खडकीवर पुन्हा हल्ला झाला मलिक अंबराने पुन्हा खडकी दुरुस्त केलं. पण 1626 साली मलिक अंबराचा मृत्यू झाला.

Tuesday, April 19, 2022

Fatima Al Fihri





or Fatima bint Muhammad Al-Fihriya Al-Qurashiya was an Arab woman who is credited with founding the oldest existing, continually operating, and first degree-awarding university in the world, The University of Al-Qarawiyyin at Fez in Morocco. She is also known as "Ummul Banīn".
Fatima used the money she inherited from her father to purchase a mosque that was built around 845 AD under the supervision of King Yahya ibn Muhammad. She then rebuilt it and bought the surrounding land, doubling its size. the construction project was supervised by Fatima herself. Established in the year 859, the University of al-Qarawiyyin was the first degree-granting educational institute in the world (as recognized by UNESCO and Guinness World Records). Students from all over the world traveled to study a wide range of subjects, ranging from natural sciences to languages to astronomy, and Fatima herself studied there too. it was considered one of the greatest centers of education at that time.