जलियांवाला बाग



जलियांवाला बाग का वही संकरा प्रवेश द्वार, जहाँ से 13 अप्रैल 1919 को जनरल डायर अपने सैनिकों के साथ अंदर गया था। उस दिन बैसाखी के अवसर पर हज़ारों निहत्थे लोग एक शांतिपूर्ण सभा के लिए यहाँ एकत्र हुए थे। बिना किसी चेतावनी के जनरल डायर ने सैनिकों को भीड़ पर गोलियाँ चलाने का आदेश दे दिया। लोग जान बचाने के लिए इधर-उधर भागे, लेकिन संकरे रास्ते और ऊँची दीवारों के कारण बाहर नहीं निकल सके। कई लोग अपनी जान बचाने के लिए शहीदी कुएँ में कूद गए।
यह घटना भारत के स्वतंत्रता संग्राम के सबसे दर्दनाक और निर्णायक अध्यायों में से एक मानी जाती है। आज भी यह प्रवेश द्वार उस अमानवीय नरसंहार की मूक गवाही देता है।



Mahatma Gandhi After Breaking His Five-Day Fast, New Delhi, January 1948




This rare photograph captures Mahatma Gandhi being carried from Birla House after ending his five-day fast for communal harmony in New Delhi. The fast, undertaken from 13–18 January 1948, sought to restore peace between Hindus, Muslims, and Sikhs in the aftermath of Partition.
Though physically frail after the fast, Mahatma Gandhi was unable to walk unaided and was carried before a gathering of supporters. Just twelve days later, on 30 January 1948, he was assassinated at the same location—Birla House—making this one of the final public moments of his life.
Restored and colorized.





“राजर्षी शाहू महाराज जयंती” 2026

Kolhapur Sansthan : 26th June 1874, 

राजर्षी शाहू महाराज जयंती निमित्त विनम्र अभिवादन 
समता, शिक्षण आणि सामाजिक न्यायाचा दीप आजही प्रेरणा देत राहील.


Shahu Maharaj was a progressive, democratic ruler renowned for championing equality, education, and the rights of marginalized communities his reign saw the most Progressive reign People of Kolhapur would have ever asked for.

















 

तोफखाना - मलिक-ए-मैदान




तोफ वजन 55 टन, लांबी 14.6 फूट आणि डायमीटर 4.9 फूट. तिच्या ओढण्यासाठी 10 हत्ती, 400 बैल आणि शेकडो माणसांची ताकद लागत होती. (फारसी शब्द-अर्थ: मैदानाचा राजा)
आज जरी ती तोफ आदिलशाहीची म्हणून ओळखली जात असली तरी या तोफेचा जन्म मूळ निजामशाहीमध्ये झाला. १५४९ साली बुर्हान निजामशहा याच्या तोफखान्यातील तुर्की अधिकारी चलबी रुमीखान दखनीयाने ही तोफ अहमदनगर येथे बनवली. रुमीखान हा मूळचा तुर्कस्तानचा होता. मलिक-ए-मैदान तोफेच्या निर्मितीच्या वेळी, म्हणजेच सोळाव्या शतकात, ती जगातील सर्वात मोठी शस्त्रे मानली जात होती.
तोफेचा धमाका एवढा मोठा होता की बत्ती देणारा सैनिक मरण्याची शक्यता असल्याने शेजारीच एक पाण्याचा हौद बांधलेला आहे. बत्ती दिली की सैनिकाने लगेच हौदात उडी मारून पाण्यात बुडी मारून बसायचे!
विजयनगरजवळील रक्कस-तंगडी येथे झालेल्या युद्धात या तोफेचा पहिल्यांदा वापर करण्यात आला होता. या तोफेचा आवाज एवढा प्रचंड होता की विजयनगरच्या राज्याचे सैन्य आवाज ऐकूनच पळून गेले होते.
युद्ध संपल्यानंतर या तोफेला तेथून 80 किमी दूर असलेल्या पुरंदरच्या किल्ल्यात ठेवण्यात आले होते. पुरंदरच्या किल्ल्यातून इ.स. 1632 मध्ये एका मराठा सरदाराने या तोफेला कर्नाटकातील विजापूर येथे स्थापित केले होते.




Hasegawa Hasemi Field Wooden 4x5 45 Large Format Film Camera 1972


 

अनाइमंगलम बौद्ध ताम्र-पत्र



अनाइमंगलम बौद्ध ताम्र-पत्र (जिन्हें 'लीडेन प्लेट्स' भी कहा जाता है) 11वीं सदी में चोल साम्राज्य द्वारा बौद्ध धर्म को दिए गए धार्मिक सम्मान और शाही संरक्षण का सबसे महत्वपूर्ण ऐतिहासिक सबूत हैं।
चोल राजाओं ने बौद्ध भिक्षुओं और उनके मठों की मदद के लिए काफी दान दिया। इन ताम्र-पत्रों से जुड़ी मुख्य बौद्ध बातें और महत्वपूर्ण विवरण इस प्रकार हैं:
1. चूड़ामणि विहार को ज़मीन दान करने का शाही आदेश: इन प्लेटों पर दर्ज मुख्य आदेश के अनुसार, सम्राट राजराज चोल प्रथम ने 'अनाइमंगलम' गाँव से मिलने वाला सारा राजस्व 'चूड़ामणि विहार' के रखरखाव के लिए दान कर दिया था। यह एक शानदार बौद्ध मठ था जो उस समय तमिलनाडु के तटीय शहर नागपट्टिनम में बन रहा था।
विहार का निर्माण: इस बौद्ध मठ को जावा (आज का इंडोनेशिया) के श्रीविजय साम्राज्य के शैलेंद्र वंश के राजा श्री मार विजयोतुंगवर्मन ने अपने पिता 'चूड़ामणि वर्मन' की याद में बनवाया था।
2. टैक्स-फ्री बौद्ध ज़मीन ('पल्लीच्छंदम'): चोल प्रशासन में, इस खास तरह के टैक्स-फ्री ज़मीन के दान को 'पल्लीच्छंदम' कहा जाता था। इस दान के कारण, अनाइमंगलम गाँव से इकट्ठा होने वाला सारा टैक्स राजस्व और अनाज सीधे बौद्ध भिक्षुओं और मठ के भोजन, कपड़ों और रखरखाव के लिए इस्तेमाल किया जाता था।
3. प्राचीन समुद्री और कूटनीतिक संबंध: ये ताम्र-पत्र दिखाते हैं कि एक हज़ार साल पहले दक्षिण भारत (चोल साम्राज्य) और दक्षिण-पूर्व एशिया (इंडोनेशिया/मलेशिया) के बीच गहरे व्यापारिक, सांस्कृतिक और कूटनीतिक संबंध थे। बौद्ध धर्म इन दोनों ताकतों को जोड़ने वाली एक मज़बूत सांस्कृतिक कड़ी था।
4. बनावट और भाषा: वज़न और आकार: इन 24 ताम्र-पत्रों का कुल वज़न लगभग 30 किलोग्राम है। ये एक भारी कांसे के छल्ले से एक साथ जुड़े हुए हैं, जिस पर चोल शाही निशान (बाघ, मछली और धनुष के प्रतीक) बने हैं। दो भाषाओं में विवरण: पहले पाँच पन्ने संस्कृत (बौद्ध हाइब्रिड संस्कृत) में हैं और उनमें चोल राजाओं की वंशावली बताई गई है। अगले 16 पन्ने तमिल लिपि में हैं और उनमें अनाइमंगलम गाँव की सीमाओं और बौद्ध मठ को दिए गए दान के बारे में पूरी कानूनी जानकारी दी गई है।
5. भारत वापसी (ताज़ा अपडेट): यह बेशकीमती ऐतिहासिक चीज़ 18वीं सदी में डच (नीदरलैंड) उपनिवेशवादियों द्वारा भारत से ले जाई गई थी और सदियों तक वहाँ लीडेन यूनिवर्सिटी में सुरक्षित रखी गई थी। मई 2026 में, एक ऐतिहासिक राजनयिक समझौते के तहत इसे आधिकारिक तौर पर भारत सरकार को वापस सौंप दिया गया।
भारत सरकार और नीदरलैंड की सरकार का आभार सांस्कृतिक और ऐतिहासिक आदान-प्रदान जारी रहना चाहिए।







अकोला जिल्ह्यातील मूर्तीजापूर तालुक्यात असलेल्या माना (Mana) या ऐतिहासिक गावातील श्री रामकृष्ण मंदिर आणि तेथील विशेष कृष्ण मूर्ती अत्यंत प्रसिद्ध आहेत. या क्षेत्राबद्दलची महत्त्वाची आणि रंजक माहिती खालीलप्रमाणे आहे:
​१. माना गावचा इतिहास आणि आख्यायिका
​प्राचीन पार्श्वभूमी: लोकआख्यायिकेनुसार, राजा बब्रूवाहन याने वसवलेले 'माणिपूर' म्हणजेच आजचे 'माना' गाव होय. हे गाव उमा नदीच्या तीरावर वसलेले आहे.
​महान संतांचे पाय: या ऐतिहासिक गावाला राष्ट्रसंत तुकडोजी महाराज, संत गाडगेबाबा, संत पाचलेगावकर आणि शिवशाहीर बाबासाहेब पुरंदरे यांसारख्या थोर व्यक्तिमत्त्वांनी भेटी दिल्या आहेत.
​२. श्रीकृष्ण आणि श्रीराम मूर्तींचे अनोखे वैशिष्ट्य
​मुकुटांऐवजी फेटा: या मंदिराचे सर्वात मोठे आणि आगळेवेगळे वैशिष्ट्य म्हणजे येथील श्रीकृष्ण आणि श्रीराम यांच्या मूर्तींवर पारंपरिक मुकुटांऐवजी पारंपरिक पगडी परिधान कारण्यात आलेले आहेत. अशा प्रकारची पगडी घातलेली रूपे खूप दुर्मिळ मानली जातात.
​कोरीव काम: काळ्या पाषाणातील या मूर्तींवर अत्यंत सुंदर आणि बारीक कोरीवकाम पाहायला मिळते. १९३५ च्या सुमारास येथील गढीजवळ प्रभू रामचंद्रांची मूर्ती सापडली होती, अशी माहिती मिळते.
३. ​मूर्तींचा शोध आणि इतिहास
​या मंदिरात असलेल्या मुख्य मूर्ती जमिनीतून उत्खननादरम्यान वेगवेगळ्या काळात सापडलेल्या आहेत:
​श्रीराम मूर्ती (१९३५): गावातील एका जुन्या गढीवजा किल्ल्याजवळ ३ जुलै १९३५ रोजी प्रभू रामचंद्रांची अत्यंत देखणी मूर्ती सापडली.
​श्रीकृष्ण मूर्ती (१९५१): ८ मे १९५१ रोजी गावातील एका शेतकऱ्याला शेत नांगरताना ही विलोभनीय श्रीकृष्णाची मूर्ती सापडली.
​४. मंदिराची रचना आणि इतर देवस्थाने
​गावाच्या मध्यवर्ती भागात सर्वबाजूंनी तटबंदी असलेले हे मंदिर वसलेले आहे. ​मंदिराच्या मुख्य गर्भगृहात श्रीकृष्ण मूर्तीसोबतच डावीकडे संगमरवरी वज्रपीठावर श्रीरामाची मूर्ती आहे. ​याच परिसरात डावीकडे अखंड काळ्या पाषाणातील विष्णूची भव्य मूर्ती आहे, ज्यांच्या हातात शंख, चक्र आणि गदा कोरलेली आहे. याशिवाय संत गजानन महाराज, गणेशजी आणि संत ज्ञानेश्वर-तुकाराम महाराजांच्या पादुका येथे आहेत.
​५. साजरे केले जाणारे उत्सव
​मंदिरात दररोज काकडआरती, हरिपाठ आणि आरतीचे नियम पाळले जातात. ​रामनवमी आणि गोकुळाष्टमी (कृष्णजन्माष्टमी) हे येथील मुख्य उत्सव आहेत. रामनवमीच्या निमित्ताने येथे ७ दिवसांचा भव्य भागवत सप्ताह आयोजित केला जातो, ज्यासाठी विदर्भातून अनेक भाविक येतात.
६. माना गावचे पुरातत्वीय महत्त्व
​प्राचीन अवशेष: माना हे गाव केवळ या मंदिरापुरते मर्यादित नसून, पुरातत्व विभागाच्या दृष्टीनेही महत्त्वाचे आहे. येथे अनेक प्राचीन विहिरी, बारव (पायऱ्यांच्या विहिरी) आणि जुन्या काळातील गढीचे अवशेष पाहायला मिळतात.
​सांस्कृतिक वारसा: इतिहासकारांच्या मते, हे गाव प्राचीन व्यापारी मार्गावर असल्याने या भागाला पूर्वी मोठी व्यापारी आणि सांस्कृतिक प्रतिष्ठा होती.
विशेष नोंद: ऐतिहासिक दृष्ट्या हे गाव अत्यंत समृद्ध असून, काही काळापूर्वी येथे उत्खनन करताना २२ वे जैन तीर्थंकर भगवान नेमिनाथ यांची देखील एक प्राचीन मूर्ती सापडली आहे.
​७. भौगोलिक स्थान आणि कसे पोहोचावे?
​रेल्वे मार्ग: माना हे स्वतः एक रेल्वे स्टेशन आहे, जे हावडा-नागपूर-मुंबई मुख्य रेल्वे मार्गावर (बडनेरा ते भुसावळ दरम्यान) येते. अनेक पॅसेंजर आणि मेमू ट्रेन्स येथे थांबतात.
​रस्ता मार्ग: हे गाव अकोला-अमरावती राष्ट्रीय महामार्गापासून (NH-53) अगदी जवळ आहे.
​अकोल्यापासून अंतर: साधारण ३० ते ३५ किमी.
​मूर्तीजापूरपासून अंतर: साधारण १५ किमी.
​जवळचे विमानतळ: नागपूर (साधारण २२० किमी) किंवा अमरावती (बेलोरा विमानतळ).






इस ऐतिहासिक तस्वीर में बोधिसत्व अवलोकितेश्वर की मूर्ति के पास बैठे शोधकर्ता ब्रिटिश-अमेरिकी पुरातत्वविद् डॉ. डेविड ब्रेनार्ड स्पूनर हैं। यह तस्वीर 1915-16 में नालंदा महाविहार में हुई खुदाई के दौरान ली गई थी। डॉ. स्पूनर ने नालंदा विश्वविद्यालय के प्राचीन खंडहरों की व्यवस्थित और वैज्ञानिक खुदाई शुरू करने में अहम भूमिका निभाई थी।
 मूर्ति अवलोकितेश्वर बुद्ध की है और इसे वर्तमान बिहार राज्य के प्राचीन नालंदा की खुदाई के दौरान खोजा गया था। यह ऐतिहासिक मूर्ति अभी कोलकाता के भारतीय संग्रहालय में सुरक्षित रखी गई है और वहाँ प्रदर्शित की गई है।




भारत के विभिन्न स्थानों पर स्थापित सम्राट अशोक के स्तंभ



भारत के विभिन्न स्थानों पर स्थापित सम्राट अशोक के स्तंभों (Ashokan Pillars) और उनके शीर्ष पर बनी हुई शिलाओं (capitals) को दर्शाता है। इन स्तंभों को मौर्य सम्राट अशोक ने तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व में बनवाया था। इन स्तंभों के शीर्ष पर अलग-अलग जानवरों की मूर्तियाँ बनाई गई थीं, जो बौद्ध धर्म के प्रतीकों को दर्शाती हैं।
प्रमुख स्थान और शिलाएं:
सारणाथ (Sarnath)- चार शेरों की मूर्ति (Lion Capital) — यह सबसे प्रसिद्ध है और भारत का राष्ट्रीय प्रतीक भी है। यह स्तंभ बौद्ध धर्म के "धर्मचक्र प्रवर्तन" की याद में बनाया गया था।
सांची (Sanchi) - यहाँ का स्तंभ शेर के आकार में है। यह बौद्ध धर्म के प्रचार से जुड़ा है।
सांकीसा (Sankissa)- यहाँ हाथी की आकृति वाला स्तंभ है। यह बुद्ध के पृथ्वी पर आगमन का प्रतीक है।
लौरिया नंदनगढ़ (Lauria Nandangarh)- यहाँ भी शेर की आकृति वाला स्तंभ है।
रामपुरवा (Rampurva)- यहाँ बैल (Bull) और ऊँट के समान दिखने वाले जानवर की आकृतियाँ मिली हैं। यह स्तंभ नेपाल और बिहार की सीमा के पास स्थित है।
वैशाली (Vaishali)- यहाँ एक शेर की मूर्ति है।
दक्षिण भारत (शायद अमरावती या अन्य क्षेत्र)- यहाँ भी शेर की आकृति वाला स्तंभ है, जो बौद्ध धर्म के दक्षिण भारत में फैलाव का संकेत है।
विशेषताएँ:-
सभी मूर्तियाँ एक ही पत्थर से बनाई गई थीं और उच्च गुणवत्ता वाली पॉलिश की गई थीं। ये स्तंभ बौद्ध धर्म के मूल सिद्धांतों और सम्राट अशोक के धम्म (धर्म) को फैलाने के लिए बनाए गए थे।
इन पर ब्राह्मी लिपि में लेख भी पाए जाते हैं।



कोरोना



आर्काइव | कोरोना की दूसरी लहर में उत्तर प्रदेश में स्वास्थ्य ढांचा चरमरा गया. लेकिन आदित्यनाथ ने अधिकारियों से कहा कि जो लोग ‘‘अफवाहें’’ फैला रहे हैं और सोशल मीडिया पर दुष्प्रचार के जरिए ‘‘वातावरण खराब कर रहे हैं’’ उनके खिलाफ राष्ट्रीय सुरक्षा कानून के अंतर्गत कार्रवाई की जाए और उनकी संपत्ति भी जब्त की जाए. 2021 के शुरूआती महीनों में स्वास्थ्य के मामले में कमजोर इन्फ्रास्ट्रक्चर वाला उत्तर प्रदेश किसी भी हालत में कोविड-19 की दूसरी लहर से निपटने के लिए तैयार नहीं था. समूचे राज्य में ऑक्सीजन, वेंटीलेटर्स और आईसीयू में बिस्तर की गंभीर कमी थी. इस लहर का आना तय माना जा रहा था लेकिन महामारी के इस आसन्न संकट से निबटने के लिए राज्य को तैयार करने की बजाय आदित्यनाथ का पूरा ध्यान मुख्य रूप से अप्रैल में होने वाले पंचायत चुनाव पर टिका था. सामान्यतः राजनीतिक पार्टियों की प्राथमिकता सूची में पंचायत चुनाव का कुछ खास स्थान नहीं होता. लेकिन यह चुनाव 2022 के विधानसभा चुनावों से पहले के एक वर्ष से भी कम समय में होने जा रहा था इसलिए इसका प्रबंधन करना जरूरी लगा. जिस तरह आदित्यनाथ ने पंचायत चुनाव के नतीजों को बीजेपी के पक्ष में करने का प्रयास किया उससे यह बात स्पष्ट हो जाती है.
इन्हीं कारणों से विपक्षी पार्टियां भी पूरी ताकत के साथ इसमें लग गईं. चुनाव प्रचार के दौरान सोशल डिस्टेंसिंग का तनिक भी ध्यान नहीं दिया गया. अभी यह अभियान अपने चरम पर था कि तभी अप्रैल के दूसरे हफ्ते में उत्तर प्रदेश में कोरोना के मामलों में बेतहाशा वृद्धि हुई और अप्रैल के अंत तक हालात बेकाबू होने लगे.
आदित्यनाथ ने दूसरी लहर से निबटने में जो ढिलाई दिखाई उससे न केवल वास्तविकता पर उनकी कमजोर पकड़ का पता चलता है बल्कि यह भी आभास मिलता है कि सच्चाई से उनकी सरकार का किस तरह का बैर था. मरीजों के बढ़ने और अस्पतालों में ऑक्सीजन सिलेंडरों के न होने की खबरें जब सुर्खियां बनने लगीं तो उनके कार्यालय ने ट्वीट किया कि राज्य में ऑक्सीजन या वेंटीलेटर और बेड की कोई कमी नहीं है. उन्होंने अपने अधिकारियों से कहा कि जो लोग ‘‘अफवाहें’’ फैला रहे हैं और सोशल मीडिया पर दुष्प्रचार के जरिए ‘‘वातावरण खराब कर रहे हैं’’ उनके खिलाफ राष्ट्रीय सुरक्षा कानून के अंतर्गत कार्रवाई की जाए और उनकी संपत्ति भी जब्त की जाए.
उनकी धमकियों और तथ्यों को झुठलाने का कोई असर नहीं पड़ा. जब गंगा में तैरते शवों को लोगों ने देखा तो उनकी ये धमकियां एक क्रूर मजाक बनकर रह गयीं. आदित्यनाथ का यह व्यवहार पूरी तरह सभ्य राजनीतिक तौरतरीकों के विपरीत था और इससे उत्तर प्रदेश में जो कुछ हो रहा था उसकी एक दर्दनाक तस्वीर उभरकर आयी.
दैनिक भास्कर के संपादक ओम गौड़ ने न्यूयार्क टाइम्स में एक मार्मिक टिप्पणी लिखी- ‘‘अगर मौसम ने जाहिर नहीं किया होता तो शायद हम इस हादसे को कभी जान नहीं पाते. मई के शुरूआती दिनों में बारिश की वजह से गंगा का पानी बढ़ गया जिससे लाशें नदी की सतह पर आ गयीं और तटों तक बिखर गयीं. पानी की वजह से घाट की रेत खिसक गई और वहां दफनाई गई लाशें नजर आने लगीं. इस बारिश ने ग्रामीण स्वास्थ्य व्यवस्था को मजबूत करने या टीके की पर्याप्त सप्लाई सुनिश्चित करने या इन सारी खामियों की जिम्मेदारी लेने में सरकार की जबर्दस्त विफलता को तार-तार कर दिया.’’
8 नवंबर को रामपुर की एक सार्वजनिक सभा को संबोधित करते हुए आदित्यनाथ ने कोविड-19 संकट के समय अपनी सरकार के प्रबंधन के लिए खुद को बधाई दी और कहा कि यह ‘‘दुनिया में सर्वोत्तम” था.





लखनऊ में आज से शुरू हुई थी एक लंबी घेराबंदी ।



 लखनऊ की रेज़ीडेंसी बहुत लंबे वक़्त के लिए घिरने जा रही थी,इसका अंदाज़ किसी को नही था । अंग्रेज़ो के ख़िलाफ़ 1857 का बिगुल बज चुका था । उठना अब लखनऊ को था,तो वह 30 मई थी,जब लखनऊ में छावनियों में हमारे सिपाहियों ने बग़ावत का बिगुल बजा दिया । चौलक्खी कोठी और तारावली कोठी से लगाम कसने लगी । हुक्म जारी होने लगे कि इन बिरतानियों को लखनऊ से बाहर करो । सिपाही और अवाम जोश में बढ़ चली ।
एक जद्दोजहद शुरू हुई । बिरतानियों ने कभी नही सोचा था कि कोई उनके यूनियन जैक को भी ज़मींदोज़ करेगा । लखनऊ में बेगम हज़रत महल के नेतृत्व में बिरतानियों का परचम जो रेज़ीडेंसी पर लहरा रहा था,पत्थर मार मार कर ज़मीन पर गिरा दिया गया । लखनऊ में हर तरफ बेगम और मौलवी अहमदुल्ला शाह के सिपाहियों ने कब्ज़े शुरू कर दिये ।
अंग्रेज़ रेज़ीडेंसी में क़ैद हो गए । इस भयंकर गर्म दिनों में हमारे पुरखे सीमित संसाधनों से कम्पनी के लोगों से भिड़ गए । दुनिया ने देखा कि नवाबों ने जिस शहर को पलकों पर बैठाया था,वह आतिश बनकर बिरतानियों पर बरस पड़ा । कितने ही बिरतानी फौजी और अफ़सर हलाक़ हो गए । बिरतानी औरते और बच्चे,जिन्हें हमारे बुज़ुर्गों ने मारने से परहेज़ किया,वह रेज़ीडेंसी में क़ैद हो गए ।
1857 में आगे क्या हुआ,उसका अंजाम क्या रहा । ज़ाहिर है गद्दारों से भरे महल,नीव तो कमज़ोर करते ही है । मगर एक बात तो याद रखने वाली है । हमारे बुज़ुर्गों ने बिरतानियों को थाल में सजाकर सत्ता नही दी । बल्कि किसी थाल में उनके सर थे तो किसी में उनका खून,वह लड़े और बहुत शानदार लड़े ।
आज वही 30 मई है । जब लखनऊ ने बिरतानियों की चालों को समझकर उन्हें एक एक करके तोड़ना शुरू किया । लखनऊ की हर इमारत इस बात की गवाह है । लखनऊ का चप्पा चप्पा हमारे बुज़ुर्गों के पांव की निशानदेही करता है । कैसे वह जूझे,लड़े और जीते भी,जी हाँ वह जीते थे,महीनों बिरतानी क़ैद रहे । रेज़ीडेंसी की तबाही इसकी गवाह है ।
आज बेगम हज़रत महल,मौलवी अहमदुल्ला शाह,उदादेवी,नाना साहब,तात्या टोपे,मंगल पांडे और महान बादशाह बहादुर शाह ज़फ़र समेत हमारे हर बुज़ुर्ग को याद करने का दिन है । जिन्होंने गुलामी का तौक़ पहनने से इनकार किया और सर उठाकर लड़ पड़े । हर सिपाही,हर उसको नमन जिसने आज के रोज़ बजने वाले बिगुल में अपने कदम आगे बढ़ाए ।
30 मई लखनऊ में उस तारीख़ की शुरआत है, जिसने बिरतानियों को अंदर तक हिला दिया । छावनियों की बग़ावत ने उनके पांव के नीचे की ज़मीन खींच ली । आजका दिन उन सबको याद करने का दिन है...आज ही से लखनऊ ने 1857 के एक केंद्र बनने की तरफ अपने कदम बढ़ा दिए थे








1857 की क्रांति के दौरान लखनऊ स्थित प्रेसिडेंसी की मस्जिद को काफ़ी नुक़सान पहुँचा था।


 

दख्खनचा काळापहाड — मलिक अंबर



इतिहास हा फक्त राजे-महाराजांचा नसतो…
तो त्या असामान्य व्यक्तींचाही असतो, ज्यांनी प्रतिकूल परिस्थितीवर मात करून आपल्या कर्तृत्वाने इतिहासावर अमिट ठसा उमटवला.असाच एक विलक्षण इतिहासपुरुष म्हणजे मलिक अंबर!
इ.स. १५४८ च्या सुमारास आफ्रिकेतील इथिओपिया प्रदेशात आरोमा जमातीत जन्मलेलं एक बालक…
गरिबी, दुष्काळ आणि युद्धजन्य परिस्थितीमुळे गुलाम म्हणून विकलं जाते “चापू” नावाचा तो मुलगा पुढे दख्खनच्या इतिहासातील सर्वात प्रभावशाली व्यक्तिमत्त्वांपैकी एक बनेल, याची कल्पनाही कुणाला नव्हती.
बालपणापासूनच त्याने अपमान, गुलामी, बेड्या आणि माणसांच्या बाजाराचा क्रूर चेहरा अनुभवला.एका देशातून दुसऱ्या देशात गुलाम म्हणून फिरताना त्याने जग आणि जगदारी जवळून पाहिली.
बगदाद येथे मीर कासिम अल बगदादी याने त्याला विकत घेतले.तेथे इस्लाम धर्माची दीक्षा घेऊन त्याने “अंबर” हे नाव धारण केले.
इस्लामने त्याला केवळ नवं नाव दिलं नाही…
तर ईमान, संयम, न्याय आणि अन्यायाविरुद्ध उभं राहण्याची ताकद दिली.अल्लाहवरील श्रद्धा आणि स्वतःच्या कर्तृत्वाच्या जोरावर तो पुढे निजामशाहीतील प्रभावशाली मुत्सद्दी, सेनानी आणि वजीर बनला.
त्या काळात मुघल साम्राज्य दख्खन जिंकण्यासाठी सतत प्रयत्न करत होते.अकबर आणि पुढे जहांगीर यांची दक्षिण जिंकण्याची महत्त्वाकांक्षा प्रचंड होती.
पण ज्या मुघल सामर्थ्याला संपूर्ण उत्तर भारत रोखू शकला नाही, त्या साम्राज्याला दख्खनमध्ये अनेक वर्षे रोखून धरणारा योद्धा म्हणजे मलिक अंबर!
गुलाम म्हणून आयुष्य सुरू केलेल्या या माणसाने स्वतःच्या पराक्रमावर सहा हजार घोडेस्वारांचे सैन्य उभे केले.मराठा सरदारांचे हलके घोडदळ, वेगवान हालचाली, डोंगरदऱ्यांचा अभ्यास आणि छापामार तंत्र यांचा वापर करून त्यांनी “गनिमी कावा” अधिक प्रभावी केला.
पुढे हाच लढाऊ वारसा छत्रपती शिवाजी महाराजांच्या स्वराज्य लढ्यात अधिक प्रगल्भ स्वरूपात दिसून येतो.
मलिक अंबर यांच्या सैन्यात अनेक मराठा सरदार कार्यरत होते.शहाजीराजे भोसले आणि मलिक अंबर यांचे राजकीय व लष्करी संबंध निकटचे होते. काही लोकपरंपरा आणि अभ्यासकांच्या लिखाणात जिजाऊ-शहाजीराजे विवाहात मलिक अंबर यांच्या भूमिकेचा उल्लेख आढळतो; मात्र याबाबत ठोस समकालीन ऐतिहासिक पुरावे मर्यादित आहेत.
मलिक अंबर हे फक्त रणांगणातील योद्धे नव्हते…
ते एक कुशल प्रशासक, अर्थतज्ज्ञ आणि लोककल्याणकारी शासकही होते.त्यांनी महसूल व्यवस्थेत सुधारणा केल्या, जमिनीचे मोजमाप करून करपद्धती अधिक संघटित केली.शेतकऱ्यांच्या हिताचा विचार केला.
औरंगाबाद परिसरातील “नहर-ए-अंबरी” ही पाणीपुरवठा योजना त्यांच्या दूरदृष्टीची साक्ष देते.त्या काळातील ही एक अत्यंत प्रगत जलव्यवस्था मानली जाते.खडकी हे शहर वसवून त्यांनी त्याचा विकास केला. पुढे त्याच शहराला औरंगाबाद म्हणून ओळख मिळाली. आणि सध्या छत्रपती संभाजीनगर म्हणून हे शहर दिमाखात उभे आहे.
इतिहासात अनेक राजे झाले…
पण गुलाम म्हणून विकला गेलेला एक आफ्रिकन तरुण आपल्या बुद्धिमत्ता, पराक्रम, मुत्सद्देगिरी आणि नेतृत्वाच्या बळावर दख्खनचा “काळापहाड” बनतो, ही घटना जगाच्या इतिहासात अद्वितीय आहे.
मलिक अंबर आपल्याला शिकवतात
माणसाचा जन्म त्याला महान बनवत नाही…
तर त्याचा संघर्ष, स्वाभिमान आणि कर्तृत्व त्याला इतिहासात अजरामर बनवते!
त्या दख्खनच्या शूर योद्ध्याला, त्या बहुजननायकाला विनम्र अभिवादन!





मुल्ला नसरुद्दीन आणि माजुद्दीन

 मुल्ला नसरुद्दीन आणि माजुद्दीन एकदा नदीच्या शांत काठावर गळ टाकून बसले होते.


मुल्ला नसरुद्दीन म्हणाला, माझ्या आजोबांची गोष्ट माहितीच असेल ना तुला? याच जागेवर ते गळ टाकून बसायचे. एक दिवशी एका मोठ्या जहाजाएवढ्या मोठ्या आकाराचा मासा लागला होता त्यांच्या गळाला. 


आपल्या छोट्याशा नदीत जहाजाएवढा मासा कसा आला असेल, याचा विचार करत माजुद्दीन थोडा वेळ गप्प राहिला. नंतर म्हणाला, अरे माझ्या आजोबांची गोष्ट ठाऊकाय ना तुला? तेही इथेच बसून गळ टाकायचे. एकदा त्यांच्या गळाला एक कंदील लागला होता. तो ना औरंगजेबाचा कंदील होता आणि आजोबांना सापडला, तेव्हाही तो पेटलेला होता, बोल.


मुल्ला थोडा वरमून म्हणाला, माजुभाई, तुम्ही तो कंदील थोडा अलीकडच्या काळात आणून विझवायला तयार असाल, तर मीही आमचा मासा मोठ्या सुरमईच्या आकारापर्यंत कमी करायला तयार आहे!!!


एकमेकांशी आपापल्या धर्माच्या श्रेष्ठत्वावरून झगडणारे लोक साधारण अशीच चर्चा करतात... आपले दावे फारच अतर्क्य आणि फेकाफेकीचे आहेत, याची त्यांनाही कल्पना असते... 


फक्त आधी दुसऱ्याने कमी फेकावे, मग आपणही कमी फेकू, अशी त्यांची अपेक्षा असते.

आझाद हिंद सेनेचे हे सैनिक निर्दोष मुक्त झाले.



दुसरं महायुद्ध संपल्यावर इंग्रजांनी आझाद हिंद सेनेच्या ७६०० सैनिकांवर खटले चालवायचं ठरवलं.
या सैनिकांचा बचाव करण्यासाठी नेहरूंनी ' आझाद हिंद सेना डिफेन्स कमिटी ' स्थापन केली ज्याचे अध्यक्ष भुलाभाई देसाई होते.
समितीमध्ये स्वतः नेहरू, के.एन. काटजू, तेज बहादूर सप्रु असे अनेक नामवंत वकील होते.
प्रेमकुमार सहगल, शाहनवाज खान आणि गुरुबक्षसिंग ढिल्लो यांच्या विरोधात रेड फोर्ट ट्रायल नावाने प्रसिद्ध खटला लाल किल्ला कोर्टात सुरू झाला.
अनेक वर्षे अडगळीत पडलेला वकिलीचा कोर्ट पुन्हा चढवून नेहरू स्वतः युक्तिवाद करायला वकील म्हणून उभे राहिले.
आझाद हिंद सेनेचे हे सैनिक निर्दोष मुक्त झाले.
हे सगळं सुभाषचंद्र बोस अपघातात मरण पावल्यावर झालं.

His name was Pradyumn Thakur.




He was 7 years old. Class 2 at Ryan International School in Gurugram, Haryana.
His father dropped him at the school gate at 7:55 am on September 8, 2017. At 8:08 am, he was found outside a washroom with his throat slit. He was rushed to hospital and declared dead on arrival.
The school did not call the police. His parents did.
Haryana Police arrived three and a half hours later.
They noticed blood stains on bus conductor Ashok Kumar. The same clothes he wore while carrying a bleeding 7 year old child to a car.
On September 10, the Police Commissioner held a press conference. He declared Ashok Kumar was the killer. He said Ashok had tried to sexually assault Pradyumn and murdered him.
The Chief Minister of Haryana congratulated the police for solving the case.
The Bar Association of Gurugram passed a resolution refusing to let any lawyer defend Ashok Kumar. The Supreme Court later disciplined them for this.
Pradyumn’s mother said from day one she believed Ashok was being framed.
CBI took over the case.
They found no forensic evidence against Ashok Kumar. No evidence of sexual assault. The gardener who was first at the scene said he saw no blood on Ashok before Ashok helped carry the child. The claimed semen sample did not exist. [Source: CBI chargesheet 2018]
In November 2017, CBI arrested the real accused. A 16 year old student at the same school. CBI said he confessed to killing Pradyumn to get his exams cancelled.
He chose his victim randomly.
Ashok Kumar was acquitted of all charges on February 28, 2018. [Source: Child Special Court Gurugram judgment February 28, 2018]
In January 2021, CBI charged four Gurugram Police officers with framing Ashok Kumar. Falsifying documents. Torture. Criminal conspiracy. [Source: CBI chargesheet January 2021]
Those four officers have not been convicted.
The Police Commissioner who declared Ashok guilty on television faced no consequences. The Chief Minister who congratulated police faced no consequences.
Pradyumn’s family is still waiting for justice for their son.
India deserves to remember these Stories.




आदित्यनाथका भड़काऊ भाषण

 आर्काइव | बात 27 जनवरी 2007 की है. शाम ढलने लगी थी. भारतीय जनता पार्टी के गोरखपुर के सांसद आदित्यनाथ अपने भगवा लबादे में एक भड़काऊ भाषण दे रहे थे और भीड़ में से लोग उत्साह में बीच-बीच में जय जयकार कर रहे थे. परवेज़ को इस बात की जानकारी थी कि अभी हाल के मुहर्रम के जुलूस के दौरान शहर में कहीं मुठभेड़ हो गई थी जिसमें एक हिंदू लड़का घायल हुआ था और बाद में उसकी मौत हो गई थी. इस घटना से काफी तनाव फैला हुआ था. उसने मुझे बताया कि ‘‘इस उत्तेजक वातावरण को देखकर मैं खुद को बचते-बचाते उस भीड़ में घुसा.’’ भीड़ में मुख्य रूप से हिंदू युवा वाहिनी के सदस्य थे. युवकों की इस वाहिनी का गठन आदित्यनाथ ने तकरीबन पांच साल पहले किया था. परवेज़ अपने साथ हमेशा एक कैमरा रखता था और उसने उस कैमरे की मदद से आदित्यनाथ के भाषण को रेकार्ड करना शुरू किया.

आदित्यनाथ ने जोशीले अंदाज में कहा, ‘‘एक हिंदू के खून के बदले आने वाले समय में हम प्रशासन से एफआईआर दर्ज नहीं कराएंगे बल्कि कम से कम 10 ऐसे लोगों की हत्या उससे करवाएंगे.’’ भीड़ ने उत्साह में तालियां बजाईं.
आदित्यनाथ का भाषण खत्म होते ही परवेज चुपचाप अपने घर लौट आया लेकिन शहर उबलने लगा था. सुनील सिंह ने मुझे बताया कि ‘‘आदित्यनाथ का भाषण खत्म होने से पहले ही जहां वह सभा हो रही थी उसके पास के एक होटल को लोगों ने लूट लिया और तहस-नहस कर दिया.’
उन दिनों सुनील सिंह हिंदू युवा वाहिनी का राज्य अध्यक्ष था और आदित्यनाथ का दाहिना हाथ था. इस मामले में वह भी एक आरोपी है. आदित्यनाथ के भाषण से एकदम पहले उसने ही भीड़ को संबोधित किया था. उसने मुझे बताया कि ‘‘वह होटल एक स्थानीय मुसलमान का था. वहां से दंगा शुरू हुआ जो धीरे-धीरे गोरखपुर के अन्य हिस्सों तक फैल गया.’’ इस दंगे में कम से कम दो लोग मारे गए और करोड़ों की संपत्ति जलकर स्वाहा हो गई.